झारखंड में बढ़ती भुखमरी और राहत की घोषणा लोगों से कोसो दूर

भले ही लॉकडाउन जल्द समाप्त हो जाए पर गरीबों के जीवन पर इसका दीर्घकालीन असर पड़ने वाला है। इस अवधि में लाखों परिवार अपने अस्तित्व के लिए सरकारी कल्याणकारी योजनाओं (विशेष रूप से जन वितरण प्रणाली, आंगनबाड़ी, मनरेगा और नकद हस्तांतरण योजनाओं) पर निर्भर रहेंगे

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गढ़वा ज़िले के भंडरिया प्रखंड के कुरून गाँव के लछु लोहरा कहते हैं “मेरी पत्नी खाए बिना मर गयी।” यह क्षेत्र विशेष रूप से कमजोर आदिम जनजाति और आदिवासी बहुल इलाका है, गढ़वा जिले में 2011 में हुए जनगणना के अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों की सँख्या 40 प्रतिशत है। इनमें से, 8611 परिवार विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह हैं। भंडरिया में 4 अप्रैल को 70 वर्षीय सोमरिया देवी की भूख से मौत हो गयी थी घर में अनाज न होने की वजह से तीन दिनों से खाना नहीं बना था।

हाल ही में लॉकडाउन 17 मई तक बढ़ा दिया गया है, लॉकडाउन के दौरान राज्य के विभिन्न इलाको से भूख से मौत की घटना व भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी है।

अप्रैल में सोमरिया देवी सहित बोकारो के गोमिया प्रखंड की शारीरिक तौर पर विकलांग मीणा मरांडी और रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड से उपासी देवी की भूख से मौत की घटना हुई। गौर करने की बात है इन परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं था।

लॉकडाउन के कारण बढ़ती भुखमरी केवल चंद परिवारों तक सीमित नहीं है। सामाजिक-आर्थिक रूप से कमज़ोर समुदायों जैसे मुशहर, भुइंया, दलित, आदिवासी, विशेष रूप से कमजोर जनजाति, दैनिक मज़दूरों एवं बेघर परिवारों में भुखमरी का संकट गहराता जा रहा है। मुख्यमंत्री निवास क्षेत्र दुमका जिले के शिकारीपाड़ा में राशन अभाव के असंतोष ने स्थानीय दर्जनों महिलाओं को ट्रक से अनाज लुटने के लिए मजबूर होना पड़ा, महिलाओं का कहना था रोजगार छीन गये हैं, बच्चे भूख से तड़प रहे हैं लेकिन अब तक सरकार से अनाज नहीं मिला।

लॉकडाउन में केंद्र व राज्य सरकारों ने राशन व भोजन सम्बंधित कई घोषणाएं की। पिछले एक महीने में घोषणाओं का सीमित दायरा और कार्यान्वयन में कमी उजागर हुआ है।

लॉकडाउन में राशन सम्बंधित राहत घोषणाएं

झारखंड सरकार ने लॉकडाउन के शुरुआत में राशन सम्बंधित दो मुख्य घोषणा की थी – सभी कार्डधारियों को अप्रैल-मई का अग्रिम अनाज दिया जाएगा एवं वैसे पात्र परिवार जिनका राशन कार्ड के लिए ऑनलाइन आवेदन लंबित है, उन्हें 10 किलो अनाज दिया जाएगा। कुछ दिनों बाद केंद्र सरकार ने घोषणा की अप्रैल से जून तक जन वितरण प्रणाली से जुड़े प्रति व्यक्ति को दुगना राशन दिया जाएगा (5 किलो के बजाए 10 किलो) एवं दुगने भाग का शुल्क नहीं लगेगा। साथ ही, 2018 में झारखंड में बनायीं गयी आकस्मिक खाद्यान कोष अंतर्गत प्रत्येक ग्राम पंचायत को 10,000 रु की राशी मिली हुई है जिससे वे ज़रूरतमंद और असहाय व्यक्तियों को तुरंत 10 किलो अनाज मुहैया करवा सके। इसके अलावा झारखंड सरकार ने लॉकडाउन के कुछ दिनों बाद दाल भात केंद्र का विस्तार व थानों एवं पंचायत स्तर पर सामुदायिक रसोई की स्थापना का निर्णय लिया।

जमीनी स्तर पर राहत घोषणाओं का क्रियान्वन

राहत घोषणाओं और ज़मीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच का बड़ा फासला अत्यंत चिंताजनक है। राज्य में राहत योजनाओं की स्थिति को समझने के लिए अप्रैल के पहले सप्ताह में “भोजन का अधिकार अभियान” के द्वारा झारखंड के 19 जिलो के 50 प्रखंडो में फोन के माध्यम से सर्वेक्षण किया गया था। सवेक्षण में यह पता चला कि तब तक केवल 15 प्रखंडों में ही कार्डधारियों को दुगना राशन (अप्रैल और मई माह) मिलना शुरू हुआ था। 5 प्रखंडो में तो मार्च माह का राशन भी नहीं मिला था। सर्वेक्षण के अनुसार 50 प्रखंडो में से 42 प्रखंडो में दाल भात केंद्र चालू थे, इसके लिए सोरेन सरकार ने कम समय में अच्छी पहल की थी। हालाँकि उनमें से ज्यादातर कम उपयोग में थे। इसका एक मुख्य कारण था कि लॉकडाउन में लोग केन्द्रों तक पहुंच नहीं पा रहे थे, केंद्र के बारे में लोगो को जानकारी नहीं थी तथा कुछ केंद्र जरूरत वाले जगहों से दूर थे। प्रशासन को दाल भात केंद्र को लेकर व्यापक प्रचार करने जरूरत है व झुग्गी बस्तियों और दूर दराज के इलाकों में नये केंद्र खोलने चाहिए।

सर्वेक्षण में शामिल किए गए 50 प्रखंडों में 39 के स्थानीय थानों में सामुदायिक रसोई थी, जिनका मुख्य रूप से आस-पास के लोगो के द्वारा उपयोग हो रहा था। जिनका निवास स्थान थाने से दूर था, वे इसका लाभ नहीं ले पा रहे थे। पंचायतो में संचालित सामुदायिक रसोई में आस-पास के कुछ लोगों के अलावा अन्य गाँव के लोग, दुरी के कारण नहीं पहुंच पाते हैं।

लॉकडाउन झारखंड भूख से मौत भोजन का अधिकार खाद्य
चकरधरपूर, पश्चिम सिंघभूम के ग्रामीण जिनका राशन कार्ड नहीं है

सरकारी आंकड़े के अनुसार झारखंड में नये राशन कार्ड के लिए लगभग 7 लाख परिवारों का आवेदन लंबित है, घोषणा के 1 महीने बाद भी इसमें से अधिकांश परिवारों को 10 किलो अनाज नहीं मिल पाया था। इस सम्बन्ध में झारखंड उच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका में 27 अप्रैल को सरकार ने जवाब दिया कि केवल 35% परिवारों को ही 10 किलो अनाज दिया गया है।

घोषणा के कार्यान्वयन के प्रति सरकार की उदासीन रवैया इससे समझा जा सकता है घोषणा के 21 दिनों बाद राशी आवंटित की गयी थी। साथ ही, सरकारी आदेश में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया था कि ये परिवार अनाज कहाँ से लेंगे। इसके कारण अनेक परिवार राशन दूकान से पंचायत का चक्कर लगाते रहे।

लॉकडाउन में राशन कार्ड धारियों को भी अनाज लेने में समस्याओं का सामना करना पड़ा है। झारखंड की जन वितरण प्रणाली में कई समस्याएं पहले से ही रही हैं जो इस लॉकडाउन में व्यापक पैमाने पर सामने आए हैं।

झारखंड में जन वितरण प्रणाली की कुछ मूल समस्याएं

झारखंड में 40 लाख से ज्यादा लोग जन वितरण प्रणाली के लाभ से अभी भी छूटे हुए हैं। चूँकि 2011 के जनसँख्या (3 करोड़ 30 लाख) के अनुसार लगभग 80% 2 करोड़ 63 लाख लोगो को जविप्र में कवर किया गया था लेकिन वर्तमान अनुमानित जनसँख्या का 80% 3 करोड़ 4 लाख होता है।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रो में क्रमशः 86.5% और 60.2% लोगो को जविप्र के अंतर्गत कवर किया गया था।

राज्य में जन वितरण प्रणाली में डीलर द्वारा राशन घपला और कटौती जैसे भष्टाचार नयी बात नहीं है, अगस्त 2019 में डेहान संस्था द्वारा गढ़वा जिले के बिशुनपुरा प्रखंड में 143 राशन कार्डधारियों के सर्वे से पता चला था की डीलर 89% कार्डधारियों से हर माह एक से चार किलो तक की कटौती करते है व एक वर्ष में कम से कम 2 माह का पूरा राशन घपला होता है।

डाकिया योजना के तहत राज्य के विशेष रूप से कमजोर जनजाति समूहों को 35 किलो राशन बंद पैकेट में घर तक पहुचाना है, जिम्मेवारी प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी की होती है पर पलामू जिले के सदर प्रखंड स्थित विधुआ टोला के 35 परिवारों को सिर्फ अप्रैल माह का राशन देकर कार्ड में तीन माह (अप्रैल, मई और जून) तक का दर्ज किया गया था तथा 35 किलो के हक में 30 किलो ही राशन मिला था। टोले में अन्छु परहिया की कुछ वर्ष पहले मौत हुई थी फिर भी उनके नाम से अप्रैल 2020 तक राशन का उठाव हुआ था।

राज्य में भ्रष्ट डीलरो और अफसरों के विरुद्ध न के बराबर ही कारवाई हुई है और न ही जविप्र व्यवस्था में सुधार हुआ। डेहान सर्वे के अनुसार 4 डीलर राशन घपले के भ्रस्टाचार में शामिल थे लेकिन प्रखंड विकास पदाधिकारी, बिशुनपुरा को रिपोर्ट और शिकायत पत्र देने के बाद भी करवाई नहीं हुई थी। अप्रैल 2020 के पहले सप्ताह में इनमे से एक डीलर चमेली समूह को राशन की कालाबाजारी करते हुए पकड़ा गया था जिसके बाद डीलर प्राथमिकी दर्ज कर दुकान सील किया गया। मौजूदा संकट की स्थिति में राशन घपले के सम्बन्ध में पलामू जिले के सतबरवा में अनुमंडल पदाधिकारी के द्वारा चार जविप्र डीलरों पर कारवाई करते हुए दो डीलरों को जेल भेजा गया था।

भले ही लॉकडाउन जल्द समाप्त हो जाए पर गरीबों के जीवन पर इसका दीर्घकालीन असर पड़ने वाला है। इस अवधि में लाखों परिवार अपने अस्तित्व के लिए सरकारी कल्याणकारी योजनाओं (विशेष रूप से जन वितरण प्रणाली, आंगनबाड़ी, मनरेगा और नकद हस्तांतरण योजनाओं) पर निर्भर रहेंगे।

इस परिस्थिति में आपातकालीन सहायता के साथ दीर्घकालीन राहत योजनाओं की भी आवश्यकता है। जन वितरण प्रणाली का दायरा बढ़ाकर ग्रामीण क्षेत्र एवं शहरी बस्तियों में इसे सार्वभौमिक करने की ज़रूरत है। साथ ही, सभी कार्डधारियों को कम-से-कम अगले 6 महीने तक दुगना राशन दिया जाना चाहिए। हर गाँव में आंगनवाड़ी/विद्यालयों में सामुदायिक रसोई की स्थापना करनी चाहिए।

राशन वितरण की निगरानी के लिए जविप्र दुकानों पर सरकारी अधिकारी, पुलिस या अन्य गैर सरकारी निगरानी समिति को नियुक्त किया जाए ताकि लोगो को उनका पूरा हक़ मिले।

विशेष शिकायत निवारण व्यवस्था लागू की जाए ताकि शिकायतों का तेजी से समाधान हो सके और भ्रष्ट डीलरों और सरकारी अधिकारीयों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जा सके। अब देखना होगा झारखंड की हेमंत सरकार भोजन और काम के अधिकार कितना सुनिश्चित कर पाते हैं।

(लेख सम्बंधित मुद्दों पर सुझाव के लिए सिराज दत्ता और विपुल पैकरा को धन्यवाद)

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