झारखंड म्युनिसिपल चुनाव 2026: क्या शहरों में भी कमजोर पड़ रही है भाजपा की पकड़?

झारखंड के म्युनिसिपल चुनाव 2026 में कई शहरी इलाकों से झामुमो की बढ़त के संकेत मिल रहे हैं। गिरिडीह, राजधनवार और मानगो समेत कई सीटों पर भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना है। रांची और धनबाद में तस्वीर अभी साफ नहीं है, लेकिन शहरी सियासत का गणित बदलता दिख रहा है

Date:

Share post:

झारखंड से लौटकर: झारखंड का म्युनिसिपल चुनाव 2026 राज्य की राजनीति में अहम मोड़ साबित हो सकता है। अब तक आम धारणा रही है कि शहरी इलाकों में भारतीय जनता पार्टी की मजबूत पकड़ है और नगर निकाय चुनावों में उसे बढ़त मिलती है। लेकिन इस बार कई शहरों से आ रहे रुझान अलग कहानी बयान कर रहे हैं।

हालांकि चुनाव औपचारिक रूप से पार्टी बेसिस पर नहीं था, फिर भी ज़मीनी स्तर पर लगभग सभी प्रमुख दल खुले तौर पर मैदान में दिखे। ऐसे में नतीजों को दलों से अलग करके देखना मुश्किल होगा।

पार्टी बेसिस नहीं, फिर भी खुलकर मैदान में भाजपा-झामुमो

इस बार का चुनाव गैर-पार्टी आधार पर हुआ, लेकिन हकीकत यह रही कि झामुमो, भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों ने खुलकर अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार किया।

भाजपा समर्थित उम्मीदवारों के कार्यक्रमों में भगवा झंडे, नारों और वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी साफ दिखाई दी। दूसरी ओर झामुमो ने भी अपने संगठन और मंत्रियों के जरिए उम्मीदवारों को पूरा समर्थन दिया।

ऐसे में अगर भाजपा समर्थित उम्मीदवार हारते हैं, तो यह कहना मुश्किल होगा कि यह केवल ‘व्यक्तिगत’ हार है।

झारखंड में 48 शहरी निकायों में चुनाव हुए हैं। लगभग हर जगह झामुमो भाजपा को कड़ी टक्कर देती दिख रही है। यह टक्कर कई सीटों पर जीत में भी बदल सकती है।

गिरिडीह में सीधी टक्कर—प्रमिला मेहरा बनाम डॉ. शैलेंद्र चौधरी

गिरिडीह नगर निगम के मेयर चुनाव ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है। यहां झामुमो की प्रमिला मेहरा और भाजपा समर्थित डॉ. शैलेंद्र चौधरी के बीच सीधा मुकाबला है।

डॉ. चौधरी के समर्थन में भाजपा के वरिष्ठ नेता बाबूलाल मरांडी ने मीटिंग्स कीं। प्रचार में भगवा रंग और ‘जय श्री राम’ के नारे प्रमुखता से दिखे।

दूसरी ओर झामुमो ने प्रमिला मेहरा के लिए संगठनात्मक ताकत झोंक दी। स्थानीय स्तर पर मिल रहे संकेत बताते हैं कि मुकाबला कड़ा है और भाजपा के लिए राह आसान नहीं दिख रही।

राजधनवार में विनय संथालिया मजबूत, CPI(ML) समर्थित उम्मीदवार

राजधनवार सीट पर स्थिति और भी दिलचस्प है। यहां भाजपा के पूर्व सांसद रविंद्र राय ने वीडियो जारी कर विनय संथालिया को हराने की अपील की और पार्टी का नाम लेकर वोट देने की बात कही।

इसके बावजूद विनय संथालिया को मजबूत बताया जा रहा है।

अगर यहां भाजपा समर्थित रणनीति असर नहीं दिखा पाती, तो यह स्थानीय समीकरणों पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा।

चतरा, मानगो, मधुपुर, जुगसलाई—शहरी किले में सेंध के संकेत

चतरा से मिल रहे रुझान भी भाजपा के पक्ष में स्पष्ट नहीं हैं।

जमशेदपुर के मानगो में पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी मैदान में हैं और उन्हें कांग्रेस का समर्थन प्राप्त है, मजबूत स्थिति में बताई जा रही हैं। मधुपुर और जुगसलाई जैसे इलाकों में भी भाजपा के लिए जीत आसान नहीं दिख रही।

यदि इन क्षेत्रों में भाजपा पिछड़ती है, तो ‘शहरी पार्टी’ की उसकी पहचान को चुनौती मिल सकती है।

रांची और धनबाद में तस्वीर धुंधली, सस्पेंस बरकरार

राजधानी रांची में अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। यहां झामुमो समर्थित उम्मीदवार आगे रहेंगे या भाजपा समर्थित, इस पर अंतिम तस्वीर सामने नहीं आई है।

इसी तरह धनबाद में भी मुकाबला बेहद कड़ा माना जा रहा है। दोनों प्रमुख दलों के समर्थक अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं, लेकिन जमीनी रुझान मिश्रित संकेत दे रहे हैं।

इन दोनों शहरों के नतीजे पूरे राज्य के राजनीतिक संदेश को प्रभावित कर सकते हैं।

टिकट चयन, असंतोष और UGC बिल—क्या भाजपा को भारी पड़ रहा समीकरण?

भाजपा के सामने इस बार संगठनात्मक असंतोष भी चुनौती बनता दिख रहा है। गिरिडीह जैसे उदाहरणों में अपेक्षाकृत नए चेहरों को प्राथमिकता दिए जाने से पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी सामने आई। कुछ स्थानों पर बागी उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से कोर वोट में बंटवारे की आशंका जताई जा रही है।

साथ ही UGC बिल को लेकर फॉरवर्ड कास्ट के एक हिस्से में नाराजगी की चर्चा है। बिल के बाद यह झारखंड में पहला बड़ा चुनाव है, इसलिए इसके प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर झामुमो ने अपेक्षाकृत जमीनी और पुराने कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी, जिससे उसका पारंपरिक वोटबैंक एकजुट दिखाई दे रहा है—ठीक वैसे ही जैसे पिछले विधानसभा चुनाव में देखने को मिला था।

अब 27 तारीख को घोषित होने वाले नतीजे यह तय करेंगे कि शहरी मतदाता किस दिशा में रुख कर रहे हैं—और क्या झारखंड की राजनीति में शहरों का समीकरण सचमुच बदल रहा है।

Shahnawaz Akhtar
Shahnawaz Akhtarhttp://shahnawazakhtar.com
Shahnawaz Akhtar is a senior journalist with over two decades of reporting experience across four Indian states and China. He is the Managing Editor and founder of eNewsroom India, an independent, Kolkata-based digital media platform. His work focuses on human-interest reporting, capturing lived realities, resilience, and voices often ignored by mainstream media

Related articles

Suspected Cattle Thieves or Victims of Mob Justice? Two Dead, Survivors Arrested in Siliguri

Two men were killed and three critically injured after a mob allegedly attacked five travellers in Siliguri over suspected cattle theft. Police arrested the three survivors and seven others in connection with the violence, while questions remain over what triggered the attack.

गांधी की पत्रकारिता और आज की वायरल दुनिया: मायने क्या रखता है—रीच या असर?

गांधी की पत्रकारिता और आज की वायरल दुनिया के बीच क्या बदला? eNewsroom Conclave में जवाहर सरकार, प्रतीक सिन्हा, राशिद किदवई, अरफा खानम शेरवानी समेत वक्ताओं ने स्वतंत्र मीडिया, एल्गोरिद्म और पत्रकारिता के बदलते सरोकारों पर चर्चा की

Gandhi Had Newspapers. We Have Algorithms. What Would He Make of Today’s Media?

Gandhi had newspapers; today’s journalists have algorithms. At the inaugural eNewsroom Conclave, journalists and public voices explored what happens when clicks, virality and Big Tech influence what people see, while independent media struggles to keep public-interest journalism alive.

Echoes of a Crisis: Why Biswajit Roy’s Tagore and Palestine Still Matter Today

Biswajit Roy’s Palestine, Arab-Jewish Relations and Rabindranath explores Tagore’s ideas on nationalism, imperialism, religion and coexistence. At a time of war and civilian suffering in Gaza, the book offers a deeply humanist lens through which to understand Palestine’s history and the crisis today