कोलकाता: गांधी हमेशा अपने साथ कलम और कागज रखते थे।
पूर्व प्रसार भारती अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय संस्कृति सचिव जवाहर सरकार ने शनिवार को कोलकाता में आयोजित पहले eNewsroom Conclave में कहा कि जिस तरह आज लोग जब भी थोड़ा समय मिलता है, अपना फोन निकाल लेते हैं, उसी तरह गांधी भी समय मिलते ही लिखने बैठ जाते थे।
गांधी का पत्रकारिता से रिश्ता सिर्फ समय मिलने पर लिखने तक सीमित नहीं था। सरकार ने बताया कि गांधी का लिखा हुआ इतना विशाल था कि उसे डिजिटल रूप में सुरक्षित करने में करीब दो साल लगे।
उन्होंने कहा, “गांधी ने Indian Opinion, Young India, Navjivan और Harijan का संपादन और प्रकाशन किया। उनके अखबार केवल राजनीतिक विचारों को लोगों तक पहुंचाने का माध्यम नहीं थे। वह आम लोगों से संवाद करते थे, सामाजिक सुधार के मुद्दों पर चर्चा करते थे और सत्य, जिम्मेदारी और जनसेवा से जुड़े सवाल उठाते थे।”
एक सदी से अधिक समय बाद यही सवाल कोलकाता के नेशनल लाइब्रेरी स्थित भाषा भवन सभागार में हुई चर्चा के केंद्र में रहे। पत्रकारों, शिक्षाविदों, शिक्षकों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों ने “Gandhi the Journalist: Why India Needs His Media Vision Today” विषय पर चर्चा की।
चर्चा गांधी के दौर के अखबारों से निकलकर आज के एल्गोरिद्म, पत्रकारिता के विकेंद्रीकरण, कॉरपोरेट मीडिया के बढ़ते प्रभाव और वायरल होने की होड़ तक पहुंची।
इसके केंद्र में एक सवाल था—पत्रकारिता की समाज के प्रति जिम्मेदारी क्या है?
गांधी के पास अखबार थे, आज हमारे पास एल्गोरिद्म
Alt News के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने गांधी के दौर और आज के डिजिटल मीडिया के बीच का फर्क तकनीक से ज्यादा इस बात से जोड़ा कि खबर लोगों तक पहुंचती कैसे है और उस पहुंच को नियंत्रित कौन करता है।
सिन्हा ने कहा, “जब स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था, तब महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक और भगत सिंह जैसे कई स्वतंत्रता सेनानियों के अपने अखबार थे। उनके पास ऐसे लोग भी होते थे जो अखबार पाठकों तक पहुंचाते थे।”
आज डिजिटल मीडिया को पाठकों तक पहुंचने के लिए काफी हद तक दूसरे प्लेटफॉर्म पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे टेक कंपनियों के फैसलों का असर खबरों की पहुंच पर पड़ता है।
सिन्हा ने कहा, “डिजिटल न्यूज प्रोड्यूसर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बड़े टेक दिग्गजों, जैसे जुकरबर्ग और एलन मस्क के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिद्म किस तरह नियंत्रित होते हैं। इससे डिजिटल न्यूज प्रोड्यूसर्स के लिए अपने पाठकों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।”
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता निश्चित रूप से विकेंद्रीकृत हुई है। आज जंतर-मंतर पर दो युवा—एक स्मार्टफोन और दूसरा माइक लेकर—बिना किसी बड़े मीडिया संस्थान के सीधे मौके से रिपोर्ट कर सकते हैं।
लेकिन जिस तकनीक ने खबर बनाने को आसान और लोकतांत्रिक बनाया है, उसी ने खबरों के वितरण को कुछ हद तक केंद्रीकृत भी कर दिया है। पत्रकार तुरंत खबर प्रकाशित कर सकता है, लेकिन उसे कितने लोग देखेंगे, यह एल्गोरिद्म तय कर सकता है।
सिन्हा ने स्वतंत्र मीडिया संस्थानों से अपील की कि वे आपस में मिलकर काम करें और कुछ बड़े कारोबारियों के हाथों में मीडिया के बढ़ते केंद्रीकरण की चुनौती का सामना करें।
वायरल होने से ज्यादा जरूरी है सार्थक पत्रकारिता
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राशिद किदवई ने पत्रकारिता को सिर्फ आंकड़ों और ट्रैफिक से मापने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया।
उन्होंने कहा, “आज के दौर में खबर का सार्थक होना जरूरी है, सिर्फ वायरल होना नहीं। पत्रकारिता का मूल काम मुद्दों को उठाना और समस्याओं को सामने लाना है, ताकि समाज में बदलाव दिखाई दे। यही महात्मा गांधी की पत्रकारिता की सीख है।”
किदवई ने कहा कि मुख्यधारा के मीडिया में भी आज अच्छी पत्रकारिता हो रही है। उन्होंने The Indian Express की पत्रकार रितिका चोपड़ा की चुनावी मतदाता सूची से जुड़ी रिपोर्टिंग का उदाहरण दिया, जिसने लाखों मतदाताओं के नाम गायब होने के सवाल को सामने रखा।
उनका संदेश साफ था—पत्रकारिता को इस बात से नहीं मापा जाना चाहिए कि उसे कितने लोगों ने देखा, बल्कि इस बात से कि उसने समाज में क्या बदलाव पैदा किया।
जब मुख्यधारा पीछे हटती है, स्वतंत्र मीडिया आगे आता है
वरिष्ठ पत्रकार अरफा खानम शेरवानी, जो कार्यक्रम में ऑनलाइन जुड़ीं, ने स्वतंत्र मीडिया की भूमिका पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि आज कई ऐसे बड़े विरोध और जनआंदोलन हैं, जिन्हें मुख्यधारा के मीडिया में पर्याप्त जगह नहीं मिलती, जबकि स्वतंत्र मीडिया उन्हें लगातार सामने लाता है।
उन्होंने कहा, “आज वैकल्पिक मीडिया के सामने कई चुनौतियां हैं, लेकिन ऐसे मीडिया प्लेटफॉर्म की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।”
उन्होंने कहा कि अगर स्वतंत्र मीडिया लंबे समय से भुला दिए गए मुद्दों को सामने नहीं लाता, तो जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शन और आज दिखाई देने वाले कई जनआंदोलन शायद इतनी मजबूती से सामने नहीं आ पाते।
शेरवानी ने गांधी की पत्रकारिता से इसकी सीधी तुलना करते हुए कहा कि सत्ता से असहज सवाल पूछना, जमीन पर मौजूद वास्तविकताओं को दर्ज करना और उन लोगों को जगह देना जिनकी आवाज मुख्यधारा में दब जाती है—यह काम गांधी भी करते थे और आज स्वतंत्र मीडिया भी कर रहा है।
पत्रकारिता क्यों है और उसे किसके लिए काम करना चाहिए?
eNewsroom के मैनेजिंग एडिटर शहनवाज अख्तर ने कहा कि यही सवाल इस कॉन्क्लेव के आयोजन के पीछे की मूल सोच थी।
उन्होंने कहा, “गांधी जी केवल अखबारों में लिखने वाले व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने गहराई से सोचा था कि पत्रकारिता क्यों है और उसे किसके लिए काम करना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि आज इस सवाल को फिर से न्यूजरूम में लाने की जरूरत है—“पुरानी यादों के कारण नहीं, बल्कि एक जरूरी और व्यावहारिक सवाल के रूप में।”
प्रोफेसर मोहम्मद रियाज ने गांधी के पत्रकारिता जीवन के एक कम चर्चित पहलू की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि गांधी ने अपने शुरुआती दौर में स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम किया और युद्ध संवाददाता के रूप में भी रिपोर्टिंग की।
रियाज ने कहा कि रिपोर्टिंग और प्रकाशन गांधी के राजनीतिक जीवन के बाद की चीजें नहीं थीं। बल्कि इन्हीं माध्यमों के जरिए उन्होंने लोगों को सुनना, तथ्यों को समझना और जनता से संवाद करना सीखा।
स्वतंत्र पत्रकारिता को आर्थिक मदद की जरूरत
पत्रकारिता की नैतिकता के साथ-साथ उम्मेद ग्लोबल स्कूल के संस्थापक और शिक्षाविद वली रहमानी ने स्वतंत्र मीडिया के सामने मौजूद आर्थिक चुनौती की बात की।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्र पत्रकारिता को बिना कॉरपोरेट समर्थन के जिंदा रखने के लिए जनता का सहयोग जरूरी है।
रहमानी ने कहा, “हर स्वतंत्रता सेनानी के अपने संपादकीय थे। उन्हें विश्वास था कि अगर कोई सच प्रकाशित नहीं करेगा, तो हम करेंगे। यही काम eNewsroom और उसकी टीम कर रही है।”
उन्होंने कहा, “ईमानदार और निर्भीक पत्रकारिता को जिंदा रहने के लिए सहयोग की जरूरत है। दुख की बात है कि आज हम ईमानदार और सही खबर चाहते हैं, लेकिन ऐसे संस्थानों को सहयोग देने के लिए तैयार नहीं हैं।”
उन्होंने कहा कि सिर्फ नैतिक समर्थन काफी नहीं है।
“उन्हें सिर्फ हमारा नैतिक समर्थन नहीं चाहिए। उन्हें टिके रहने के लिए आर्थिक सहयोग की भी जरूरत है। हमें आगे आकर आर्थिक रूप से उनका समर्थन करना होगा।”
विंग कमांडर (रिटायर्ड) मोहम्मद शमीम अख्तर ने भी भरोसेमंद स्थानीय पत्रकारिता के महत्व पर बात की। उन्होंने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) के दौरान अपने व्यक्तिगत अनुभव का जिक्र किया और बताया कि eNewsroom ने उनकी समस्या को किस तरह रिपोर्ट किया।
उन्होंने कहा कि जब प्रशासनिक व्यवस्था लोगों की शिकायतों को सामने लाने में नाकाम रहती है, तब छोटे और स्वतंत्र मीडिया संस्थान उनकी आवाज बन सकते हैं। उन्होंने eNewsroom को अपना व्यक्तिगत समर्थन देने की बात कही और लोगों से स्वतंत्र पत्रकारिता को आर्थिक सहयोग देने की अपील की।
जमीनी पत्रकारिता के लिए सम्मान
कॉन्क्लेव में जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता के लिए तीन पत्रकारों को सम्मानित भी किया गया।
एन डी शर्मा मेमोरियल लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल अजीज और कमलनयन छापरिया को उनकी लंबे समय की जनसरोकार वाली पत्रकारिता के लिए दिया गया।
बिस्वजीत रॉय मेमोरियल एमर्जिंग जर्नलिस्ट अवॉर्ड रकिबুজ ज़मान को दिया गया। उन्हें असम, पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल में नागरिकता, विस्थापन, पहचान और मतदाता सूची के Special Intensive Revision से जुड़े मुद्दों पर उनकी जमीनी रिपोर्टिंग के लिए सम्मानित किया गया।
दोनों पुरस्कार वरिष्ठ पत्रकार एन.डी. शर्मा और बिस्वजीत रॉय की स्मृति में शुरू किए गए हैं, जिनका eNewsroom की यात्रा से गहरा संबंध रहा है।
बिस्वजीत रॉय की किताब और Pairokar का विमोचन
कार्यक्रम के दौरान दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार बिस्वजीत रॉय की किताब Arab-Jews Relations and Tagore का भी विमोचन किया गया। किताब में यह देखा गया है कि रवींद्रनाथ टैगोर ने अरब-यहूदी संबंधों और उससे जुड़े सवालों को किस तरह देखा और लिखा।
इसके साथ त्रैमासिक पत्रिका Pairokar के नए अंक का भी विमोचन किया गया।
कॉन्क्लेव का समापन सिर्फ गांधी को याद करने के साथ नहीं हुआ, बल्कि उस सवाल के साथ हुआ जो उनकी पत्रकारिता के केंद्र में था और आज भी उतना ही जरूरी है—
पत्रकारिता आखिर किसके लिए है? और उसे किसके प्रति जवाबदेह होना चाहिए?




