23 दिन का अनशन, लाठीचार्ज और संघर्ष—नेहा बोरा क्यों कहलाने लगीं आंदोलन की आत्मा

समाजशास्त्र की छात्रा, रंगकर्मी, जेएनयू की शोधार्थी और आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष—जानिए कैसे नेहा बोरा लाखों युवाओं के आंदोलन का चेहरा बनीं

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23 दिन से उसने अन्न का एक दाना नहीं खाया था। शरीर का वजन साढ़े सात किलो घट चुका था। रक्त में शर्करा खतरनाक स्तर पर पहुँच गई थी। डॉक्टर चेतावनी दे रहे थे कि शरीर के महत्त्वपूर्ण अंग प्रभावित हो सकते हैं। फिर भी नेहा बोरा जब दूसरी बार जंतर-मंतर के मंच पर पहुँचीं, तो उनकी आवाज़ में कमजोरी नहीं थी।

उन्होंने घायल विद्यार्थियों की ओर देखकर कहा, “हमारी चोटें हिंसा की गवाही देंगी।”

सिलीगुड़ी से जेएनयू तक: एक शोधार्थी का सफर

लगभग 29 वर्ष की नेहा मूल रूप से उत्तराखंड से आती हैं। उनके बचपन का एक हिस्सा सिलीगुड़ी में बीता जहाँ उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल, सिलीगुड़ी से स्कूली शिक्षा प्राप्त की। स्कूल के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आईं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक किया। समाजशास्त्र की पढ़ाई ने उन्हें जाति, वर्ग, लैंगिक असमानता, सामाजिक सत्ता और संस्थागत भेदभाव जैसे प्रश्नों से जोड़ा।

नेहा ने आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। आंबेडकर विश्वविद्यालय ने सामाजिक विज्ञान, संस्कृति, मानवीय अध्ययन और आलोचनात्मक चिंतन पर केंद्रित शिक्षा के लिए अपनी अलग पहचान बनाई है। यहीं उनके सामाजिक सरोकारों, रंगमंच और सार्वजनिक सक्रियता को अधिक स्पष्ट दिशा मिली।

नेहा रंगमंच से जुड़ी हैं। रंगमंच ने उनकी भाषा, मंच पर उपस्थिति और लोगों से सीधे संवाद करने की क्षमता को मजबूत किया। उनके भाषण में किसी तैयार राजनीतिक पर्चे की भाषा नहीं सुनाई देती। वे सामने खड़े लोगों से बात करती हैं। उनके वाक्य छोटे होते हैं और चोट सीधे करते हैं।

इस समय नेहा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में पीएचडी के तीसरे वर्ष की शोधार्थी हैं। यह केंद्र सिनेमा, रंगमंच, प्रदर्शन, दृश्य संस्कृति और कला के सामाजिक अर्थों का अध्ययन करता है।
यही उनकी पहचान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। वे केवल नारे लगाने वाली छात्र नेता नहीं हैं। वे समाजशास्त्र की विद्यार्थी, कला और प्रदर्शन की शोधार्थी तथा रंगमंच से जुड़ी कार्यकर्ता हैं। कक्षा, पुस्तकालय, रंगमंच और आंदोलन उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व के चार आधार हैं।

कैसे बनीं छात्र आंदोलन की सबसे बुलंद आवाज़

जेएनयू में पढ़ाई के दौरान नेहा छात्र राजनीति में सक्रिय हुईं। वे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन, आइसा से जुड़ीं और बाद में इसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनी गईं। शिक्षा का निजीकरण, विश्वविद्यालयों में फीस वृद्धि, छात्रावास, छात्रवृत्ति, जातिगत भेदभाव, महिलाओं की सुरक्षा और लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार उनके प्रमुख मुद्दे बने।

वे मॉब लिंचिंग के विरुद्ध बोलीं। उन्होंने बिलकिस बानो के लिए न्याय की माँग उठाई। उन्होंने गाजा में मारे जा रहे नागरिकों, महिलाओं और बच्चों के पक्ष में आवाज़ उठाई। वे दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के समान अधिकार की बात करती रही हैं। उनका मानना है कि शिक्षा केवल उन परिवारों का विशेषाधिकार नहीं बन सकती, जिनके पास महँगी फीस और निजी कोचिंग के लिए पैसा है।

जंतर-मंतर का आंदोलन पेपर लीक, परीक्षाओं में गड़बड़ियों, बेरोजगारी और विद्यार्थियों की आत्महत्याओं के प्रश्न पर खड़ा हुआ। सोशल मीडिया पर “कॉकरोच जनता पार्टी” के व्यंग्यात्मक नाम से शुरू हुई मुहिम जल्द ही सड़कों पर उतर आई। देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी दिल्ली पहुँचे। उनकी प्रमुख माँग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और परीक्षा व्यवस्था की विफलताओं की जिम्मेदारी तय करना थी।

23 दिन का अनशन और अडिग प्रतिरोध

नेहा ने अपने साथियों मनीष कुमार और आमीन अमितोज के साथ अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। सोनम वांगचुक भी उनके साथ अनशन पर बैठे। दिन बीतते गए। सरकार की ओर से कोई निर्णायक बातचीत नहीं हुई। नेहा का शरीर लगातार कमजोर होता गया। फिर भी वे वहीं बैठी रहीं।

21वें दिन पुलिस सोनम वांगचुक को अस्पताल ले गई। नेहा ने उसी समय कहा, “एक ओर सरकार ने 21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों और सोनम वांगचुक की कोई सुध नहीं ली। दूसरी ओर हमारे अनशनकारियों को जबरन उठाकर अस्पताल में भर्ती कराने की कोशिश की जा रही है।”

उन्होंने लोगों से जंतर-मंतर पहुँचने की अपील की और कहा, “यह आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक समाप्त नहीं होगा।”

संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई ने नेहा को भीतर तक झकझोर दिया। जंतर-मंतर के मंच पर लौटकर उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहे विद्यार्थियों पर लाठियाँ चलाई गईं, आँसू गैस छोड़ी गई और महिला प्रदर्शनकारियों के शरीर के निजी हिस्सों पर बैटन से वार किए गए।

नेहा बोली, “संसद तक अपनी माँगें लेकर पहुँचे, तो हमारे सिर फोड़ दिए गए। इसे याद रखा जाएगा।”
उन्होंने कहा, “हमारे इस आंदोलन के बाद जितनी जान बाकी छोड़ी है, वह गवाही देगी। हमारी चोटें हिंसा की गवाही देंगी।”

नेहा ने मंच से सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख को याद किया। उन्होंने उन स्त्रियों का नाम लिया जिन्होंने गालियाँ, अपमान और हमले सहकर लड़कियों तथा वंचित बच्चों के लिए शिक्षा के द्वार खोले थे। नेहा ने आज की शिक्षा की लड़ाई को उसी परंपरा से जोड़ा। उनका संदेश साफ था कि शिक्षा बचाना केवल वर्तमान विद्यार्थियों का प्रश्न नहीं, आने वाली पीढ़ियों का प्रश्न है।

अब पूरा देश सुन रहा है नेहा बोरा का सवाल

वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने बाद में अपने कार्यक्रम सेंट्रल हॉल में नेहा बोरा, आमीन अमितोज और आंदोलन में शामिल अनुष्का घोष से बातचीत की। बातचीत का विषय छात्र आंदोलन, नीट, पेपर लीक, शिक्षा सुधार और लोकतांत्रिक अधिकार था।

नेहा ने कपिल सिब्बल से कहा कि युवाओं का गुस्सा अचानक पैदा नहीं हुआ है। वर्षों की तैयारी के बाद पेपर लीक हो जाता है। परीक्षा रद्द हो जाती है। नई तारीख महीनों नहीं आती। परिवार कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। विद्यार्थी अपना सबसे अच्छा समय कोचिंग और परीक्षा केंद्रों के बीच बिता देते हैं। इसके बाद भी उन्हें निष्पक्ष अवसर नहीं मिलता।
उन्होंने साफ किया कि यह आंदोलन अब किसी एक नेता या व्यक्ति का आंदोलन नहीं है। यह उन लाखों विद्यार्थियों का आंदोलन है जिनकी मेहनत को कमजोर परीक्षा व्यवस्था ने अनिश्चितता में डाल दिया है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा उनके लिए एक जवाबदेही की माँग है।

कपिल सिब्बल से बातचीत में उन्होंने कहा कि इतिहास में बड़े परिवर्तन युवाओं ने ही किए हैं। नेहा ने आंदोलन का मूल भाव रखा। विद्यार्थी सरकार से बात चाहते हैं, सहानुभूति नहीं। वे ठोस कार्रवाई चाहते हैं, आश्वासन नहीं। वे साफ और सुरक्षित परीक्षा चाहते हैं। वे अपने भविष्य पर भरोसा चाहते हैं।

नेहा की कहानी अभी लिखी जा रही है। सिलीगुड़ी की छात्रा से दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की विद्यार्थी, आंबेडकर विश्वविद्यालय की स्नातकोत्तर छात्रा, रंगकर्मी, जेएनयू की शोधार्थी और आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष तक की उनकी यात्रा लंबी है।

जंतर-मंतर ने उन्हें राष्ट्रीय चेहरा बना दिया है। उनकी माँगें सीधी हैं। पेपर लीक बंद हों। परीक्षाएँ निष्पक्ष हों। दोषियों को सजा मिले। शिक्षा सस्ती हो। सरकार विद्यार्थियों से बात करे। राजनीतिक जवाबदेही तय हो। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर बल प्रयोग न हो।

23 दिनों तक भूखी रही वह शोधार्थी आज देश से यही पूछ रही है कि पढ़ने वाला युवा न्याय माँगने कहाँ जाए? और अब उसकी आवाज़ अनसुनी नहीं है

Raj Gopal Singh Verma
Raj Gopal Singh Verma
A history writer, Raj Verma has authored 36 books till now, include biographies of forgotten heroes and heroines of freedom struggle, ignored women activists and subaltern and the areas of history which have missing threads.

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