रांची: झारखंड में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट की चर्चा फिलहाल 43 लाख नाम हटाए जाने को लेकर हो रही है। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच एक दूसरा पहलू भी सामने आया है—ड्राफ्ट लिस्ट में ऐसी-ऐसी गलतियां, जिन्हें देखकर लोग हैरान भी हैं और परेशान भी।
ये केवल स्पेलिंग की छोटी-मोटी गलतियां नहीं हैं। कई जगह रिश्ते बदल गए हैं, कई जगह नामों का ऐसा मेल हुआ है कि वह किसी मीम जैसा लगता है, और कहीं-कहीं तो जरूरी जानकारी ही गायब है।
यानी जिस प्रक्रिया को “स्पेशल” कहा जा रहा है, उसकी ड्राफ्ट लिस्ट खुद कई सवाल छोड़ रही है।
जब ‘झारखंड’ बन गया किसी का पति
ड्राफ्ट लिस्ट में एक मतदाता संजीदा खातून के पति के नाम की जगह “मोहम्मद झारखंड” दर्ज है।
यानी ऐसा लगता है जैसे पूरा राज्य ही उनके पति के नाम का हिस्सा बन गया हो।
यह टाइपिंग की साधारण गलती नहीं लगती। सवाल यह भी है कि अगर फॉर्म भरने में त्रुटि हुई थी, तो सत्यापन के दौरान यह कैसे नहीं पकड़ी गई?
इसी तरह एक अन्य मतदाता जमीला खातून के पति का नाम “हाफिजुर प्रसाद” दर्ज किया गया है।
नाम पढ़कर पहली नजर में ऐसा लगता है जैसे दो अलग-अलग सांस्कृतिक पहचानें एक ही नाम में जोड़ दी गई हों। यह गलती फॉर्म भरने वाले से हुई या उसे सत्यापित करने वाले अधिकारी से, इसका जवाब अभी तक साफ नहीं है।
लेकिन इतना जरूर है कि ऐसी प्रविष्टियां सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती हैं।
‘फादर‘ ही बन गया पिता का नाम
अगर आपको लगता है कि इससे बड़ी गलती नहीं हो सकती, तो एक और उदाहरण देखिए।
एक मतदाता इश्तियाक अंसारी की वोटर एंट्री में पिता के नाम की जगह केवल “Father” लिखा हुआ है।
यानी जिस कॉलम में पिता का वास्तविक नाम होना चाहिए था, वहां अंग्रेजी शब्द ही दर्ज कर दिया गया।
इतना ही नहीं, एक अन्य मतदाता “बड़का बाबू” की एंट्री में पिता के नाम वाला कॉलम पूरी तरह खाली है। इसके बावजूद ड्राफ्ट लिस्ट प्रकाशित हो चुकी है।
सवाल यह है कि अगर इतनी स्पष्ट गलतियां भी अंतिम ड्राफ्ट तक पहुंच गईं, तो सत्यापन प्रक्रिया कितनी प्रभावी रही?
आज मीम, कल मुश्किल
सोशल मीडिया पर ऐसी एंट्रियां लोगों को हंसा सकती हैं।
लेकिन असली चिंता हंसी से कहीं बड़ी है।
वोटर लिस्ट केवल मतदान का दस्तावेज नहीं होती। यह पहचान से जुड़े कई सरकारी रिकॉर्ड का आधार भी बन जाती है।
आज अगर किसी व्यक्ति के पिता, पति या नाम में गलती रह गई और समय रहते उसे ठीक नहीं कराया गया, तो आने वाले वर्षों में यही गलती बड़ी कानूनी और प्रशासनिक समस्या बन सकती है।
मान लीजिए दस या बीस साल बाद फिर कोई विशेष सत्यापन अभियान होता है। तब पुराने रिकॉर्ड और नए दस्तावेजों में नाम या रिश्ते का मिलान नहीं होगा। इसका असर केवल उस व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उसके बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों तक पहुंच सकता है।
कई मामलों में केवल स्पेलिंग या रिकॉर्ड के छोटे अंतर को “तार्किक विसंगति” (Logical Discrepancy) मान लिया जाता है। लेकिन बाद में यही विसंगतियां नागरिकता, पहचान, पासपोर्ट, सरकारी योजनाओं, बैंकिंग, राशन कार्ड या अन्य दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान बड़ी परेशानी का कारण बन सकती हैं।
पश्चिम बंगाल में भी दस्तावेजों में नाम या स्पेलिंग के अंतर को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे अनुभव बताते हैं कि सरकारी रिकॉर्ड में छोटी दिखने वाली गलती भी भविष्य में बड़ी प्रशासनिक समस्या बन सकती है।
झारखंड में फिलहाल यह सूची ड्राफ्ट है और सुधार का अवसर उपलब्ध है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि निर्वाचन आयोग इन त्रुटियों को कितनी तेजी और गंभीरता से ठीक करता है, ताकि अंतिम वोटर लिस्ट नागरिकों की सही पहचान का भरोसेमंद दस्तावेज बन सके।

