चुनावी सूचियों में बदलाव—झारखंड के हाशिए पर खड़े नागरिकों के लिए वजूद की जंग

झारखंड में बड़ी तादाद में ऐसे लोग रहते हैं जो अक्सर सरकारी प्रक्रियाओं में पीछे छूट जाने का ख़तरा झेलते हैं—जैसे प्रवासी मज़दूर, आदिवासी, विस्थापित परिवार और असंगठित क्षेत्र के कामगार। ऐसे में विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) सिर्फ़ एक आम चुनावी प्रक्रिया नहीं रह जाती। असली सवाल यह नहीं है कि किसका सत्यापन होगा, बल्कि यह है कि क्या पहले से हाशिये पर खड़े लोगों को एक बार फिर लोकतंत्र में अपनी जगह साबित करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा

Date:

Share post:

गिरिडीह/राँची: दशकों से झारखंड के लोग कई तरह की जंग लड़ रहे हैं। किसी ने अपनी जल, जंगल और ज़मीन को बचाने के लिए लड़ाई लड़ी, तो किसी ने खदानों, बांधों और बड़े कारखानों की वजह से हुए विस्थापन (उजड़ने) के ख़िलाफ़ जद्दोजहद की। रोज़गार की तलाश में लाखों लोग अपने गाँवों को छोड़कर गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली और केरल जैसे दूर-दराज़ के इलाक़ों का सफ़र करने पर मजबूर हुए। वहीं कई लोग सिर्फ़ इस बात के लिए लड़ते रहे कि हुकूमत (सरकार) उन्हें पहचान सके—चाहे एक नागरिक के तौर पर, मज़दूर के तौर पर, जंगल के बाशिंदे के तौर पर या सरकारी योजनाओं के हक़दार के तौर पर।

आज इस सूबे (राज्य) के सामने एक नई चुनौती खड़ी है: मतदाता सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR)।

कुछ लोगों के लिए यह महज़ एक दफ़्तरी या प्रशासनिक काम हो सकता है। लेकिन बहुत से आम अवाम (नागरिकों) के लिए यह घबराहट, कश्मकश और रातों की नींद उड़ाने की वजह बन गया है।

चुनाव आयोग का यह अभियान झारखंड के क़रीब 2.64 करोड़ वोटरों से जुड़ा है। काग़ज़ पर इसका मक़सद बिल्कुल साफ़ और सीधा है—वोटर लिस्ट को दुरुस्त करना और मरे हुए, दूसरी जगह जा चुके, फ़र्जी या अयोग्य वोटरों के नाम हटाना। मगर गाँवों, क़स्बों और मज़दूरों की बस्तियों में पूछा जा रहा सवाल अलग है: क्या असली और जायज़ वोटर बिना किसी परेशानी के इस दौर से गुज़र पाएंगे?

हिजरत (पलायन), जंगलों और हाशिए पर बसा एक राज्य

झारखंड कोई आम सूबा नहीं है।

यहाँ की आबादी का एक चौथाई से ज़्यादा हिस्सा आदिवासियों का है। जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, अनुसूचित जनजाति (ST) सूबे की आबादी का 26 फ़ीसदी से ज़्यादा हैं। यहाँ का हर पाँचवां बाशिंदा किसी न किसी धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय (मुस्लिम, ईसाई, सिख और जैन) से ताल्लुक रखता है। इसके अलावा, पश्चिमी सिंहभूम, गुमला, सिमडेगा, खूंटी और लातेहार जैसे ज़िलों में लाखों ऐसे ख़ानदान (परिवार) हैं जो जंगलों पर निर्भर हैं।

इनमें से ज़्यादातर मुफ़लिस और कमज़ोर तबके ऐतिहासिक रूप से सरकारी अदारों (संस्थानों) से दूर हाशिए पर रहे हैं। सरकारी काग़ज़ात के साथ उनका रिश्ता शहरों के मध्यम वर्ग (मिडिल क्लास) जितना आसान नहीं है, बल्कि काफ़ी पेचीदा रहा है।

राँची के एक वोटर के पास अलमारी में करीने से रखे काग़ज़ात की फ़ाइल हो सकती है। लेकिन पाकुड़ या गोड्डा का एक मुसाफ़िर मज़दूर, जो सूरत की किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर काम कर रहा है, उसके पास यह सहूलियत नहीं होती। किसी सुदूर गाँव के आदिवासी परिवार के रिकॉर्ड में नामों के हिज्जे (स्पेलिंग) अलग-अलग हो सकते हैं। जंगल में रहने वाले एक परिवार की जड़ें तो उस ज़मीन में गहरी हो सकती हैं, लेकिन उसे साबित करने के लिए उनके पास पुख़्ता सरकारी दस्तावेज़ नहीं होते।

यही बात झारखंड को दूसरों से अलग बनाती है।

इस सूबे की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक हिजरत (पलायन) पर टिकी है। हर साल लाखों मज़दूर काम के सिलसिले में झारखंड से बाहर जाते हैं। दुमका, देवघर, साहिबगंज, पाकुड़ और गिरिडीह जैसे ज़िलों के पूरे के पूरे गाँवों के लोग दूर के राज्यों में मुस्तक़िल काम कर रहे हैं। जब जाँच टीमें तस्दीक (वेरिफिकेशन) के लिए गाँवों में पहुँचेंगी, तो मुमकिन है कि ये मज़दूर अपने घरों से सैकड़ों या हज़ारों किलोमीटर दूर हों।

चिंता सिर्फ़ काग़ज़ात की नहीं है, बल्कि पहुँच (एक्सेसिबिलिटी) की है। क्या घर से दूर रहने वाला एक मज़दूर इस तस्दीक की शर्तों को आसानी से पूरा कर पाएगा? क्या हर ख़ानदान इन पेचीदा तरीक़ों को समझ पाएगा? क्या असली वोटर किसी ग़लती को सुधारने के लिए फ़ौरन और असरदार तरीक़े से आवाज़ उठा पाएगा? अंतिम वोटर लिस्ट जारी होने से बहुत पहले इन सवालों पर ग़ौर करना लाज़मी (ज़रूरी) है।

इसमें एक और पहलू भी है जिस पर अक्सर ध्यान नहीं जाता।

झारखंड का इतिहास विस्थापन और उजड़ने का इतिहास भी रहा है। जानकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि आज़ादी के बाद से अब तक विकास परियोजनाओं—जैसे खदानों, बांधों और फ़ैक्टरियों—की वजह से 10 लाख से ज़्यादा लोग बेघर हुए हैं। इनमें से कई लोग आज भी पुनर्वास, ज़मीन के हक़ और दस्तावेज़ों की ख़ामियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में जब किसी प्रक्रिया में बिल्कुल सटीक रिकॉर्ड की मांग की जाती है, तो उन लोगों पर दबाव और बढ़ जाता है जो पहले से ही दशकों की अनिश्चितता का दंश झेल रहे हैं।

इसके अलावा, झारखंड के मज़दूरों का एक बहुत बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र (इनफॉर्मल इकॉनमी) से आता है। दिहाड़ी मज़दूर, खेतिहर मज़दूर, घरेलू कामगार और गाड़ियों के ड्राइवर रोज़ कुआं खोदते हैं और रोज़ पानी पीते हैं। उनके लिए एक दिन काम पर न जाने का मतलब है उस दिन के खाने से महरूम (वंचित) हो जाना। ऐसे लोगों के लिए किसी दफ़्तरी प्रक्रिया में शामिल होना सिर्फ़ एक फ़ॉर्म भरने जितना आसान कभी नहीं होता।

सिर्फ़ वोटर लिस्ट नहीं, यह जम्हूरियत (लोकतंत्र) का इम्तिहान है

यही वजह है कि इस चुनावी सुधार (SIR) को सिर्फ़ सियासत के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

यह मसला बुनियादी तौर पर लोकतांत्रिक समावेशन (Democratic Inclusion) यानी सबको साथ लेकर चलने का है।

इस मुहिम का समर्थन करने वालों का तर्क है कि साफ़-सुथरी वोटर लिस्ट आज़ाद और निष्पक्ष चुनाव के लिए बेहद ज़रूरी है। उनकी बात सही भी है; एक मज़बूत जम्हूरियत के लिए सही और साफ़ वोटर लिस्ट का होना लाज़मी है।

लेकिन जम्हूरियत का तकाज़ा यह भी है कि अपने वोट के हक़ का इस्तेमाल करते वक़्त देश के किसी भी नागरिक को डर, बेदख़ली या किसी बोझ का अहसास न हो।

झारखंड को यही संतुलन और एतदाल (तालमेल) क़ायम करना होगा।

इस चुनावी संशोधन (SIR) की कामयाबी इस बात से नहीं आंकी जाएगी कि कितने नाम खोजे गए, कितने जाँचे गए या कितने हटाए गए। इसकी असली कामयाबी इस बड़े सवाल से तय होगी कि क्या एक ग़रीब मज़दूर, एक मुसाफ़िर कामगार, जंगल का बाशिंदा, बेघर हुआ परिवार, आदिवासी ग्रामीण और अल्पसंख्यक नागरिक इस पूरी प्रक्रिया के बाद जम्हूरियत में अपना यक़ीन और मज़बूत कर पाता है, या उसका भरोसा डगमगा जाता है।

इस लिहाज़ से, झारखंड में यह महज़ एक चुनावी फेरबदल नहीं हो रहा है, बल्कि यह भारत में लोकतांत्रिक हिस्सेदारी के भविष्य का एक बड़ा इम्तिहान (टेस्ट केस) बन रहा है। और यही वजह है कि झारखंड के इस चुनावी बदलाव पर पहले से कहीं ज़्यादा पैनी नज़र रखने की ज़रूरत है।

Shahnawaz Akhtar
Shahnawaz Akhtarhttp://shahnawazakhtar.com
Shahnawaz Akhtar is a senior journalist with over two decades of reporting experience across four Indian states and China. He is the Managing Editor and founder of eNewsroom India, an independent, Kolkata-based digital media platform. His work focuses on human-interest reporting, capturing lived realities, resilience, and voices often ignored by mainstream media
spot_img

Related articles

After Akbar Ali Mondal’s Killing, Pani Sol’s Hawkers Ask: How Will We Survive?

Pani Sol (Bankura): Every morning before sunrise, hundreds of bicycles and motorcycles roll out of Pani Sol village...

What Do Leander Paes, Kamran Akmal, and RF Kennedy Jr. Have in Common? It’s Not What You Think

Tennis star Leander Paes, Cricketer Kamran Akmal, and politician RFK Jr. all faced neurocysticercosis. Discover how this highly preventable, treatable brain parasite causes sudden seizures and why clean vegetables are your best defense.

The Future of INDIA Depends on Unity, Humility and Struggle

To defeat authoritarianism, the INDIA bloc must look beyond mere electoral math, embrace its diverse ideological roots, and transform political cooperation into a sustained, grassroots movement for constitutional democracy.

Up in Flames: Why 4,000 Burned EVMs Rekindled a Democratic Crisis

A devastating EVM fire in Kolkata highlights a deeper crisis in Indian democracy. More than a physical accident, it reveals how rapidly institutional trust erodes when transparency is compromised.