हाल ही में खत्म हुए Gen Z के नेतृत्व वाले छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ यह नहीं थी कि उसने महज़ 36 दिनों में सफलता हासिल कर ली—और इस तरह पिछले एक दशक से ज़्यादा समय में सबसे कम अवधि में सफल होने वाले देशव्यापी आंदोलनों में अपनी जगह बना ली। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह थी कि यह आंदोलन सफल कैसे हुआ।
पिछले कुछ वर्षों में हमने किसान आंदोलन जैसे कई आंदोलन देखे, जो महीनों—और कुछ मामलों में वर्षों—तक चलते रहे, तब जाकर सरकारों ने उनकी बात सुनी। लेकिन इस बार भारत की सबसे युवा पीढ़ी ने वह कर दिखाया, जिसे बहुत से लोग नामुमकिन मानते थे। महज़ एक महीने से कुछ ज़्यादा समय में उसने अपनी बात मनवा ली।
लेकिन इस आंदोलन की सफलता सिर्फ सरकार को अपनी मांगें मानने के लिए मजबूर करने तक सीमित नहीं थी। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने अपने मुद्दे और अपने मकसद को किसी और दिशा में भटकने नहीं दिया।
पिछले कई वर्षों से जब भी सरकारें मुश्किल में घिरी हैं, उन्होंने अक्सर दो बड़े सहारों का इस्तेमाल किया है। पहला, मुख्यधारा का मीडिया, जिसके एक बड़े हिस्से को आज आम बोलचाल में ‘गोदी मीडिया’ कहा जाता है। दूसरा, लगभग हर मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम बहस में बदल देना। बार-बार ऐसा हुआ कि असली सवाल पीछे छूट गए और पूरी बहस सांप्रदायिक मुद्दों की ओर मोड़ दी गई।
लेकिन इस आंदोलन ने सरकार को इनमें से किसी भी रणनीति का मौका नहीं दिया।
छात्र जिस मुद्दे को लेकर सड़कों पर उतरे थे, आंदोलन ने पूरी बहस को उसी मुद्दे पर केंद्रित रखा। उसने बहस को भटकाने की हर कोशिश नाकाम कर दी।
इस आंदोलन ने सोशल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता के ज़रिए मुख्यधारा के मीडिया को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया। साथ ही उसने पूरी कोशिश की कि उसे सांप्रदायिक राजनीति की तरफ न खींचा जाए। आंदोलन का पूरा फोकस छात्रों, सार्वजनिक परीक्षाओं और जवाबदेही तय कराने पर ही बना रहा।
वह आंदोलन, जिसे हिंदू-मुस्लिम बहस में नहीं बदला जा सका
हैरानी की बात यह है कि शायद यही वजह भी थी कि बहुत-से मुसलमानों ने इस आंदोलन में खुद को पीछे रखा और बहुत कम लोग सामने आए। एक बड़ा डर था कि जिस दिन मुसलमान इस आंदोलन का सबसे दिखाई देने वाला चेहरा बन गए, उसी दिन असली मुद्दा पीछे छूट जाएगा। फिर इस आंदोलन को छात्रों के अधिकारों की लड़ाई के बजाय एक और “मुस्लिम आंदोलन” कहकर पेश किया जाने लगेगा।
लेकिन कम भागीदारी ने भी उन्हें किसी तरह की सुरक्षा की गारंटी नहीं दी।
मोहम्मद जुनैद का मामला इसका एक उदाहरण है। आंदोलन के पहले दिन से ही वह प्रदर्शनकारियों को मुफ्त खाना उपलब्ध करा रहे थे। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा देने से पहले ही जुनैद द्वारा परोसे जा रहे मुफ्त भोजन के लिए पैसा कहां से आ रहा है, इसकी जांच शुरू कर दी गई। उनके करीबी लोगों के मुताबिक, पुलिस ने उनके परिवार के कई लोगों से पूछताछ की, जिनमें उनकी बहन भी शामिल थीं। आंदोलन खत्म होने के बाद जुनैद को दिल्ली में हिरासत में लिया गया, उनसे पूछताछ की गई और बाद में उत्तराखंड में छोड़ दिया गया। कई लोगों को लगा कि जिस व्यक्ति का काम सिर्फ मानवीय मदद करना था, उसके साथ की गई पूछताछ ज़रूरत से कहीं ज़्यादा सख्त लगी।
और जुनैद का मामला कोई अकेला मामला नहीं था। देश के दूसरे हिस्सों से भी ऐसी ही घटनाओं की खबरें सामने आईं।
असम में Cockroach Janata Party (CJP) के देशव्यापी आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन आयोजित करने के लिए एक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाने के आरोप में तीन मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर लिया गया।
वहीं पश्चिम बंगाल में कोलकाता के बड़े छात्र प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इसे “फ्राइडे प्रोटेस्ट” कहकर खारिज कर दिया। इससे एक व्यापक नागरिक आंदोलन को सांप्रदायिक नज़रिए से देखने की कोशिश हुई। यह भी कहा गया कि प्रदर्शन में शामिल कई लोग NEET के अभ्यर्थी नहीं थे। इसके कुछ ही समय बाद लगभग 70 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, जिनमें अधिकतर मुसलमान थे। राज्य में लागू नए गुंडा एक्ट के तहत 16 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। इससे बहुत-से लोगों के बीच यह धारणा और मजबूत हुई कि पुलिस कार्रवाई में मुसलमानों को अलग से निशाना बनाया गया।
इन सभी घटनाओं को साथ रखकर देखें तो कई मुसलमानों—खासतौर पर भाजपा शासित राज्यों में रहने वालों—के बीच यह एहसास गहरा होता जा रहा है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों में हिस्सा लेना अब उनके लिए ऐसा जोखिम बनता जा रहा है, जिसका सामना शायद दूसरे नागरिकों को उतनी गंभीरता से नहीं करना पड़ता।
इन मामलों में कानूनी तौर पर क्या सही है और क्या गलत, इसका फैसला अदालतें करेंगी। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब भी मुसलमान किसी लोकतांत्रिक आंदोलन में हिस्सा लेते हैं, चर्चा आंदोलन के मुद्दे से हटकर उनकी पहचान पर आ जाती है? और इसका आम मुसलमानों की लोकतांत्रिक जीवन में हिस्सा लेने की इच्छा पर क्या असर पड़ता है?
जब बराबरी की नागरिकता सवालों के घेरे में आ जाए
यह हमें भारत के हालिया इतिहास की एक और घटना की याद दिलाता है।
साल 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप के बाद इंसाफ की मांग को लेकर हजारों युवा सड़कों पर उतर आए थे। उस समय किसी ने यह नहीं पूछा कि जिन लोगों के परिवार की महिलाएं यौन हिंसा की शिकार नहीं हुई थीं, वे प्रदर्शन में क्यों शामिल हैं, या वे किस धर्म से आते हैं। उन्हें सिर्फ भारतीय नागरिक माना गया, जो अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे थे।
तो आज ऐसा अलग क्यों होना चाहिए?
यहीं से एक और बड़ा सवाल सामने आता है।
अगर मुसलमानों को यह महसूस होने लगे कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन में हिस्सा लेने से उन पर शक किया जा सकता है, उन्हें परेशान किया जा सकता है या उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है, तो इसका भारतीय लोकतंत्र पर क्या असर पड़ेगा? क्या लोकतंत्र तब भी स्वस्थ रह सकता है, जब नागरिकों का एक बड़ा तबका सार्वजनिक जीवन से धीरे-धीरे दूर होने लगे—इसलिए नहीं कि उसे समाज या देश की परवाह नहीं है, बल्कि इसलिए कि उसे भागीदारी की कीमत चुकाने का डर हो?
भारत में बेरोज़गारी, शिक्षा, भ्रष्टाचार, किसानों के अधिकार और न जाने कितने मुद्दों पर आंदोलन हुए हैं। लेकिन शायद आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल सांप्रदायिकता का है।
आखिर वह दिन कब आएगा, जब मॉब लिंचिंग, बुलडोज़र कार्रवाई, आर्थिक बहिष्कार, चुनिंदा पुलिस कार्रवाई और कानून के असमान इस्तेमाल को सिर्फ “मुस्लिम मुद्दे” नहीं माना जाएगा, बल्कि संविधान से जुड़े सवालों के रूप में देखा जाएगा—ऐसे सवाल, जो कानून के सामने बराबरी, अभिव्यक्ति की आज़ादी और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से जुड़े हैं?
अगर Gen Z ने यह साबित कर दिया है कि वह अलग ढंग से सोच सकता है और अलग तरीके से आंदोलन खड़ा कर सकता है, तो अब उसके सामने एक और जिम्मेदारी है। उसे यह सवाल भी उठाना होगा कि क्या लोकतंत्र तब तक पूरा माना जा सकता है, जब तक करोड़ों नागरिक असमान परिस्थितियों में सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने को मजबूर हों।
इरफ़ान, शाहीन बाग़ और भारत के मुसलमानों की अनदेखी प्रतिभाएँ
हालिया आंदोलन के दौरान सबसे असरदार आवाज़ों में से एक इरफ़ान की थी, जो दिहाड़ी मज़दूर हैं। उन्हें सुनकर बहुत-से लोग हैरान रह गए कि संविधान की उनकी समझ कितनी गहरी है। हो सकता है उन्हें उच्च शिक्षा हासिल करने का मौका न मिला हो, लेकिन उन्होंने जिस साफ़गोई और भरोसे के साथ संविधान के उसूलों की बात की, उसने हर किसी का ध्यान खींचा।
इरफ़ान की बातों ने हमें यह याद दिलाया कि इस देश में ऐसी न जाने कितनी आवाज़ें हैं, जो सुनाई ही नहीं देतीं। इसलिए नहीं कि उनके पास कहने को कुछ नहीं है, बल्कि इसलिए कि उन्हें बोलने का मंच ही बहुत कम मिलता है।
शाहीन बाग़ ने भी हमें कुछ ऐसा ही दिखाया था। उसने देश को हजारों ऐसी प्रतिभाशाली मुस्लिम महिलाओं से परिचित कराया, जो किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रही थीं। वे सिर्फ वही चाहती थीं, जिसका हक़ हर भारतीय नागरिक को है—बिना डर के जीने की आज़ादी, बेख़ौफ़ कहीं भी आने-जाने का अधिकार, देश के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने का अवसर और वे तमाम अधिकार, जिन्हें इस देश के बहुत-से लोग सहज रूप से अपना अधिकार मानते हैं।
Gen Z के सामने लोकतंत्र की अगली परीक्षा
अब सवाल यह नहीं है कि ऐसी उम्मीदें मौजूद हैं या नहीं।
असल सवाल यह है कि क्या भारत उनका ईमानदारी से सामना करने के लिए तैयार है? राजनीति कब तक इशारों और सांकेतिक भाषा में बात करती रहेगी? वह खुलकर यह कब स्वीकार करेगी कि इस देश में बहुत-से मुसलमान किस तरह के भेदभाव का सामना कर रहे हैं? राजनीतिक दल सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि संविधान द्वारा वादा की गई समान नागरिकता के लिए खुलकर लड़ाई कब लड़ेंगे?
ये आसान सवाल नहीं हैं। लेकिन हर पीढ़ी के सामने एक ऐसा सवाल ज़रूर आता है, जो उसके समय की पहचान बन जाता है।
भारत को सिर्फ एक और आंदोलन की ज़रूरत नहीं है। उसे नफ़रत को आम बात बना देने के ख़िलाफ़ एक आंदोलन की ज़रूरत है—ऐसा आंदोलन, जिसमें एक समुदाय दूसरे समुदाय के लिए नहीं, बल्कि सभी नागरिक संविधान के पक्ष में खड़े हों। अगर Gen Z ने राजनीतिक आंदोलनों के तौर-तरीके बदल दिए हैं, तो शायद अब वह इस गणराज्य की नैतिक दिशा को भी नई दिशा दे सकता है।
यह लेख पहले अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुआ था। यह उसी का हिंदी अनुवाद है।

