Sitharaman Releases White Paper Attacking UPA, But Data Tells a Different Story

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[dropcap]T[/dropcap]he Union Finance Minister Nirmala Sitharaman has released a “White Paper on the Indian Economy” today, which purportedly seeks to “generate a wider, more informed debate on the paramountcy of national interest and fiscal responsibility in matters of governance over political expediency.”

The White Paper criticises the “mismanagement and short-sighted handling of the public finances during FY04-FY14”, i.e. under the UPA era. However, official data shows that when the UPA-I government took charge in 2004, the Gross Debt of the Central government was over 67% of GDP and the Gross Debt of Central and State Governments together (General Government) was almost 85% of GDP.

When the UPA era ended in 2014, Gross Central Government debt had come down to below 53% of GDP and General Government Debt to below 67%.

In the past ten years under the Modi government, Central Government debt has climbed up to 58% of GDP in FY 24 and General Government debt to 82% of GDP.

Public Debt/GDP ratio declined during the UPA era because of two reasons:

  1. GDP grew at a rate much faster than the previous regime
  2. Growth was driven by private investment, consumption and exports allowing the government to maintain moderate fiscal deficits

Public Debt/GDP ratio increased under the Modi regime because of two reasons:

  1. GDP growth rate fell, first due to successive shocks like Demonetisation, the hasty introduction of GST and finally the Covid-19 pandemic and lockdown
  2. Growth has been over-dependent upon fiscal stimulus and the government’s capital expenditure, with a slump in private investment and export growth

Unable to digest and acknowledge this simple fact, the Modi government has wasted the resources of the Finance Ministry to bring out election propaganda material ahead of the Loksabha elections, targeting the UPA government, which lost power ten years ago.

Some of the criticisms made in the White Paper regarding the UPA era, like high inflation, high current account deficit and bad debt accumulation of NPAs in public sector banks are not entirely invalid. But the people voted on them ten years ago, in 2014. What matters more today is the record of the past ten years, FY 14-FY 24.

What has the Modi government done in the past ten years? Both export and import growth have declined over the past decade, while the Indian rupee’s value has fallen from Rs. 60 per dollar in 2014 to Rs. 83 per dollar today. Inflation has risen again in the past year, with food inflation currently touching the double-digit mark. Most disturbingly, over Rs. 15 trillion of Bank NPAs, mainly owned by large corporate defaulters, have been written off by the banks in the past ten years.

Corporate tax rates have been cut down to historically low levels, affecting government revenues and widening the fiscal deficit. Yet, private investment has not taken off. Unemployment levels are at historic highs. After betraying the aspirations of the youth, the Modi regime seeks to mislead them by relentlessly pursuing divisive policies in the name of religion.

What has prospered under the Modi regime is crony capitalism, with favoured corporate houses being showered with largesse to return their favour of funding the BJP through opaque channels like electoral bonds. The ongoing saga of the Adani group stands as testimony. Rather than berating the governments of the past, the Finance Ministry would have done well to consider a White Paper on its failures and deficiencies. That would have served the people better.

चुनाव और भारतीय मुसलमानों के समक्ष विकल्प

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[dropcap]जै[/dropcap]से-जैसे 2024 के आमचुनाव नजदीक आ रहे हैं, कुलीन वर्ग के कुछ मुसलमान अपने समुदाय से अपील कर रहे हैं कि भाजपा के बारे में अपनी राय पर वह एक बार फिर विचार करे (तारिक मंसूर, ‘मुस्लिम्स शुड रीलुक एट बीजेपी’, द इंडियन एक्सप्रेस, फरवरी 01, 2024). पुनर्विचार के आग्रहियों का कहना है कि भारतीय मुसलमानों के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं हो रहा है. उनका यह भी कहना है कि सरकार की खाद्यान्न, आवास, रसोई गैस, पेयजल इत्यादि से संबंधित समाज कल्याण योजनाओं से मुसलमानों को भी लाभ मिल रहा है. इसके अलावा, भाजपा पसमांदा और सूफी मुसलमानों की ओर विशेष ध्यान दे रही है और यह भी कि भारत में 2014 के बाद से कोई बड़ा साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ है. उनका दावा है कि पिछला एक दशक साम्प्रदायिक हिंसा की दृष्टि से स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे शांतिपूर्ण दौर रहा है.

इस तरह की अपीलें अर्धसत्यों पर आधारित हैं और उन मूल मुद्दों को नजरअंदाज करती हैं जो भारतीय मुसलमानों के जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं. यह हो सकता है कि कुलीन वर्ग के कुछ मुसलमानों को पहले की तुलना में कम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हो मगर उससे असुरक्षा, हाशियाकरण और अपने मोहल्लों में सिमटने की मजबूरी जैसी मुसलमानों से जुड़ी समस्याएं अदृश्य नहीं हो जातीं. इस बात में कोई दम नहीं है कि 2014 के बाद से मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है. दिल्ली में शाहीन बाग आंदोलन के पश्चात मुसलमानों के खिलाफ भयावह हिंसा हुई थी जिसे भाजपा के नेताओं ने भड़काया था (“गोली मारो…”). इस हिंसा में मारे गए 51 लोगों में से 37 मुसलमान थे.

हर दिन किसी न किसी बहाने मुसलमानों की संपत्ति जमींदोज करने के लिए बुलडोजर खड़े हो जाते हैं. कुछ भाजपा शासित राज्यों के बीच तो यह प्रतियोगिता चल रही है कि कौन मुसलमानों की संपत्ति को ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश एपी शाह ने एक न्यूज पोर्टल को बताया कि, ‘‘किसी अपराध में शामिल होने का आरोप किसी भी स्थिति में संबंधित व्यक्ति की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आधार नहीं हो सकता”. गाय और गौमांस पर राजनीति का एक नतीजा है सड़क पर विचरण करते असंख्य आवारा मवेशी और उनके कारण बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं. दूसरा नतीजा है खेतों में खड़ी फसलें चट करते आवारा गायों और बैलों के झुंड. और तीसरा नतीजा है जान लेने के एक नए तरीके – लिंचिंग – का भारत में बढ़ता उपयोग. मोहम्मद अखलाक से शुरू कर ऐसे अनेक मुसलमान (और दलित) हैं जो खून की प्यासी भीड़ के हाथों मारे गए हैं.

मोनू मानेसर, जो नासिर और जुनैद के खिलाफ हिंसा में शामिल था, की दास्तां दिल दहलाने वाली है. हर्षमंदर, जो पीड़ितों के परिवारों से मिले थे, ने लिखा, ‘‘मोनू मानेसर के सोशल मीडिया पेज देखकर मैं सन्न रह गया. वो और उसकी गैंग के सदस्य खुलेआम आधुनिक बंदूकें लहराते हुए पुलिस की गाड़ियों के सायरन जैसी आवाज करने वाली जीपों में घूमते हैं, गाड़ियों पर गोलियां चलाते हैं और जो उनके हत्थे चढ़ जाता है उसकी बेदम पिटाई करते हैं. सबसे बड़ी बात तह कि अपनी इन हरकतों की वे लाईव स्ट्रीमिंग भी करते हैं.”

गाय से जुड़ी हिंसा में मौतों और घायलों की संख्या के बारे में कोई अधिकृत आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि सरकार उन्हें छुपाना चाहती है. परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तरह की घटनाओं से मुसलमान बहुत डर गए हैं. मेवात, जहां बड़ी संख्या में मुसलमान डेयरी उद्योग से जुड़े हुए हैं, उन स्थानों में से एक है जहां के मुसलमान गंभीर मुसीबत में हैं. राजस्थान में शंभूलाल रैगर ने अफराजुल की जान लेते हुए अपना वीडियो बनाया. अलीमुद्दीन अंसारी की हत्या के आरोपियों का तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने अभिनंदन किया था. इस तरह की घटनाएं अब आम हो चली हैं.

हमने लव जिहाद के चारों ओर बुना गया नफरत और भय का जाल देखा है, हमने जिहाद के प्रकारों के टेबिल देखे जिनमें यूपीएससी जिहाद और लैंड जिहाद शामिल था. सबसे मजेदार था कोरोना जिहाद. हमें बताया गया कि भारत में तबलीगी जमात में आए मुसलमानों ने कोरोना फैलाया! कई रहवासी संघों ने मुसलमान ठेले वालों का आवासीय परिसरों में प्रवेश रोक दिया था.

इस्लामोफोबिया नई ऊंचाईयां छू रहा है. मुसलमान डरे हुए हैं और केवल अपनों के बीच रहना चाहते हैं. अधिकांश शहरों में मिश्रित आबादी वाले इलाकों में मुसलमानों को न तो मकान खरीदने दिए जा रहे हैं और ना किराए पर मिल रहे हैं. मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति में भी गिरावट आ रही है. मौलाना आजाद फैलोशिप, जो उच्च शिक्षा के लिए थी और जिसके अधिकांश लाभार्थी मुस्लिम विद्यार्थी होते थे, बंद कर दी गई है. आर्थिक दृष्टि से भी मुसलमानों की हालत गिरती जा रही है. गैलप डेटा के अनुसार ‘‘सन् 2018 और 2019 में भारतीय अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ने के बाद दोनों समूहों (हिन्दू और मुसलमान) में यह धारणा बलवती हुई कि उनका जीवनस्तर गिरा है. सन् 2019 में 45 प्रतिशत भारतीय मुसलमानों ने कहा कि उनका जीवनस्तर पहले की तुलना में खराब हुआ है. सन् 2018 में यह प्रतिशत 25 था. हिंदू भारतीयों में 2019 में यह कहने वालों का प्रतिशत 37 था जो उसके पिछले साल (2018) से 19 प्रतिशत अधिक था”.

एनआरसी व सीएए के माध्यम से मुसलमानों को मताधिकार से वंचित करने के प्रयास भी चल रहे हैं. असम में एक लंबी कवायद के बाद पता चला कि जिन 19 लाख लोगों के पास जरूरी दस्तावेज नहीं थे उनमें से अधिकांश मुसलमान थे. सीएए में ऐसे हिन्दुओं के लिए बच निकलने का रास्ते है मगर ऐसे मुसलमानों के लिए हिरासत केन्द्र बनाए जा रहे हैं.

वर्तमान में पसमांदा मुसलमानों के लिए जो सहानुभूति दिखाई जा रही है, वह केवल धोखा है. हम जानते हैं कि बहुसंख्यकवादी राजनीति से प्रेरित हिंसा की घटनाओं के मुख्य शिकार पसमांदा ही हैं. कहने की ज़रुरत नहीं कि अशरफ मुसलमानों को पसमांदाओं के साथ बेहतर व्यवहार करने की ज़रुरत है लेकिन पूरे समुदाय के लिए सबसे बड़ा खतरा असुरक्षा का भाव है जो पसमांदाओं और अशरफों दोनों के प्रभावित करता है और जो दकियानूसी तत्वों को पनपने का मौका देता है. मुस्लिम समुदाय में सामाजिक सुधारों की आवश्यकता है. मगर यह ज़रुरत तब तक हाशिये पर ही रहेगी जब तक कि समुदाय के अस्तित्व और नागरिकता पर खतरा मंडराता रहेगा.

विभिन्न राज्यों की भाजपा सरकारें ऐसे कई कदम उठा रही हैं जो मुसलमानों के साथ भेदभाव करने वाले हैं. राम मंदिर के उद्घाटन के बाद भाजपा-आरएसएस की बहुसंख्यकवादी राजनीति और तेजी पकड़ सकती है. राजनैतिक संस्थाओं में मुसलमानों की भागीदारी पहले ही कम हो रही है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी का एक भी सांसद मुसलमान नहीं है.

पहले की सरकारें भी मुसलमानों की समस्याओं को हल नहीं कर सकीं. इसकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा रहा है संघ और भाजपा. सच्चर समिति की सिफारिशों का जो हश्र हुआ वह इस बात का उदाहरण है कि इस समुदाय के पक्ष में किसी सकारात्मक कदम को किस तरह रोका जाता है. इस रिपोर्ट के प्रस्तुत किये जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा कि वंचित और हाशियाकृत समुदायों का राष्ट्रीय संसाधनों पर पहला हक है. संघ ने प्रचार यह किया कि मनमोहन सिंह का कहना है कि इस देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक है. इस समुदाय के दुःख-दर्द कम करने के हर प्रयास में अड़ंगे लगाए गए.

भाजपा का कहना है कि मुफ्त राशन इत्यादि जैसे उसकी सरकार की योजनाओं का लाभ सबको मिल रहा है. ये योजनाएं, बल्कि ‘लाभार्थी’ की पूरी परिकल्पना ही, प्रजातान्त्रिक “अधिकार-आधारित दृष्टिकोण” के खिलाफ है. सभी समुदायों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि वे किसे वोट दें. जहाँ तक मुसलमानों को बहलाने-फुसलाने के प्रयासों का सवाल है, उसके आधार खोखले हैं.

 

अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया; लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं

‘भारत के विचार’ का भविष्य: क्या साम्प्रदायिक ताकतें हावी होंगी?

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মা চাপা দেওয়ার অভিযোগ করেছেন: আইআইটিয়ান হত্যাকাণ্ডে উত্তরের জন্য এসআইটি-কে ঠেলে দিল কলকাতা এইচসি

কলকাতা: কলকাতা হাইকোর্ট আবারও বিশেষ তদন্তকারী দলকে (এসআইটি), যেটি আইআইটিিয়ান ফাইজান আহমেদ হত্যা মামলার তদন্ত করছে, তার কার্যক্রম ত্বরান্বিত করার আহ্বান জানিয়েছে। বিচারপতি জয় সেনগুপ্তের আদালত আরও বলেছে যে এসআইটি স্বাধীনভাবে একটি চূড়ান্ত প্রতিবেদন দাখিল করতে পারে না এবং আদালত সিদ্ধান্ত নেওয়ার আগে তদন্ত পর্যালোচনা করবে।

2023 সালের নভেম্বর মাসেও, জয় সেনগুপ্তের আদালত অভিযুক্তদের শূন্য করতে দেরি করার জন্য এবং মামলায় সুনির্দিষ্ট কিছু নিয়ে আসার জন্য এসআইটি-এর সমালোচনা করেছিল।

14 অক্টোবর, 2022-এ, আইআইটি খড়গপুরের তৃতীয় বর্ষের ছাত্র ফাইজান আহমেদের আংশিক পচা দেহ ক্যাম্পাসের একটি হোস্টেলের ঘর থেকে উদ্ধার করা হয়েছিল। আসামের তিনসুকিয়ার বাসিন্দা ফাইজান 2020 সালে লকডাউন চলাকালীন আইআইটি খড়গপুরে ভর্তি হয়েছিলেন এবং তিনি আনুষ্ঠানিকভাবে 2021 সালের ডিসেম্বরে ক্যাম্পাসে যোগদান করেছিলেন। যদিও খড়গপুর পুলিশ এবং আইআইটি কর্তৃপক্ষ উভয়েই দাবি করেছে যে আইআইটিিয়ান ফাইজান, যিনি জয়েন্টে 11 তম স্থান অর্জন করেছিলেন প্রবেশিকা পরীক্ষা এবং আইআইটি কেজিপিতে দুটি গবেষণা দলের অংশ হয়েছিলেন, আত্মহত্যা করেছিলেন, তার বাবা-মা দাবি করেছিলেন যে তাকে হত্যা করা হয়েছিল। পরিবারটি বিচারের জন্য কলকাতা হাইকোর্টের দ্বারস্থ হয়। বিচারপতি রাজশেখর মন্থা খড়্গপুর পুলিশকে মৃত্যুর কারণ জানতে বলেন। যাইহোক, প্রথম পোস্টমর্টেম রিপোর্টের পরেও, পুলিশ মৃত্যুর কারণ স্থাপন করতে পারেনি, এবং আদালত ফরেনসিক বিশেষজ্ঞ ডাঃ অজয় গুপ্তকে নিয়োগ করেছে। প্রথম ময়নাতদন্তের ভিডিও ক্লিপ পর্যালোচনা করে আইআইটিিয়ান ফাইজানের শরীরে রক্তক্ষরণ শনাক্ত করা হয়। ডাঃ গুপ্তা নতুন করে ময়নাতদন্তের আদেশ দেওয়ার জন্য আদালতকে অনুরোধ করেছিলেন, যা মঞ্জুর করা হয়েছিল। পরবর্তীতে দ্বিতীয় ময়নাতদন্তের পর জানা যায় ফাইজানকে হত্যা করা হয়েছে এবং সে আত্মহত্যা করেনি। 2023 সালের জুনে, বিচারপতি মান্থা একটি এসআইটি গঠন করেছিলেন। যাইহোক, আইআইটি খড়গপুর কর্তৃপক্ষ এবং বেঙ্গল পুলিশ উভয়ই সিদ্ধান্তকে চ্যালেঞ্জ জানিয়ে ডিভিশন বেঞ্চে চলে গেছে।

যাইহোক, প্রধান বিচারপতি টিএস শিবগনাম এবং বিচারপতি হিরনমাই ভট্টাচার্যের সমন্বয়ে গঠিত ডিভিশন বেঞ্চ এই আদেশ বহাল রেখেছে এবং আরও উল্লেখ করেছে যে দ্বিতীয় পোস্টমর্টেম রিপোর্টের ফলাফলের ভিত্তিতে আরও তদন্ত করা হবে।

পরিবারের প্রতিনিধিত্বকারী আইনজীবীদের একজন, নীলাদ্রি শেখর ঘোষ, মঙ্গলবার আদালতে একটি আবেদন জমা দেন। এতে বলা হয়েছে, ‘গত বছরের মে মাসে পরিচালিত দ্বিতীয় ময়নাতদন্তে ইঙ্গিত দেওয়া হয়েছিল যে হত্যাকাণ্ডের ফলে মৃত্যু হতে পারে। এসআইটির উচিত এই সত্যের আলোকে তাদের অগ্রগতি প্রতিবেদন জমা দেওয়া।

“আমি এসআইটি গঠনের পর থেকে বলে আসছি যে দুটি আদালতের সিদ্ধান্তগুলি ইঙ্গিত দিয়েছে যে এটি একটি হত্যার মামলা ছিল এবং দ্বিতীয় ময়নাতদন্তের ফলাফলের ভিত্তিতে আরও তদন্ত করা হবে। কিন্তু আট মাস হয়ে গেছে, এবং SIT কোনো অগ্রগতি করেনি,” মঙ্গলবার আদালতে শুনানির পর রেহানা ইনিউজরুমকে বলেন।

মা বলতে থাকেন, “এবং এখন আমার সন্দেহ হচ্ছে যে তারা ফাইজানের জিনিসপত্র দখল করছে না, যা গুরুত্বপূর্ণ প্রমাণ হতে পারে। ফাইজানের ফোন এবং ল্যাপটপ অভিযুক্তদের সম্পর্কে আলোকপাত করতে পারে, তবে তারা সেখান থেকে কী পেয়েছে তা এসআইটি প্রকাশ করছে না।”

“আমি মনে করি যে এসআইটি, প্রকাশ করার পরিবর্তে, অভিযুক্তদের সম্পর্কে লুকিয়ে আছে,” তিনি যোগ করেছেন।

 

এটি ইংরেজিতে প্রকাশিত প্রতিবেদনের একটি অনুবাদ

आईआईटीयन की हत्या पर मां ने लगाया पर्दा डालने का आरोप, कलकत्ता हाईकोर्ट ने एसआईटी को जवाब देने को कहा

कोलकाताः कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक बार फिर आईआईटीयन फैजान अहमद की हत्या के मामले की जांच कर रहे विशेष जांच दल (एसआईटी) से अपनी कार्यवाही में तेजी लाने का आग्रह किया है। न्यायमूर्ति जय सेनगुप्ता की अदालत ने यह भी कहा कि एस. आई. टी. स्वतंत्र रूप से अंतिम रिपोर्ट दाखिल नहीं कर सकती है, और अदालत निर्णय लेने से पहले जांच की समीक्षा करेगी।

नवंबर 2023 में भी, जय सेनगुप्ता की अदालत ने अभियुक्तों को पकड़ने में देरी करने और मामले में कुछ भी ठोस सामने लाने के लिए एसआईटी की आलोचना की थी।

14 अक्टूबर, 2022 को, आईआईटी खड़गपुर के तीसरे वर्ष के छात्र आईआईटीयन फैज़ान अहमद का आंशिक रूप से विघटित शरीर परिसर में एक छात्रावास के कमरे से बरामद किया गया था। असम के तिनसुकिया के रहने वाले फैजान को 2020 में लॉकडाउन के दौरान आईआईटी खड़गपुर में भर्ती कराया गया था, और वह दिसंबर 2021 में आधिकारिक तौर पर कैंपस में शामिल हो गए। जबकि खड़गपुर पुलिस और आईआईटी अधिकारियों दोनों ने दावा किया कि आईआईटीयन फैजान, जिसने संयुक्त में 11वीं रैंक हासिल की थी प्रवेश परीक्षा और आईआईटी केजीपी में दो शोध टीमों का हिस्सा बने, उन्होंने आत्महत्या कर ली थी, उनके माता-पिता ने दावा किया कि आईटीयन फैजान की हत्या कर दी गई थी। न्याय के लिए परिवार कलकत्ता उच्च न्यायालय चला गया। न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा ने खड़गपुर पुलिस से मौत के कारण का पता लगाने को कहा। हालाँकि, पहली पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद भी पुलिस मौत का कारण स्थापित नहीं कर सकी और अदालत ने फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. अजॉय गुप्ता को नियुक्त किया। पहले शव परीक्षण के वीडियो क्लिप की समीक्षा करने के बाद, फैज़ान के शरीर पर रक्तस्राव की पहचान की गई। डॉ. गुप्ता ने अदालत से नए सिरे से पोस्टमॉर्टम का आदेश देने का अनुरोध किया, जिसे मंजूर कर लिया गया। इसके बाद, दूसरे शव परीक्षण के बाद यह स्थापित हो गया कि फैजान की हत्या की गई थी और उसने आत्महत्या नहीं की थी। जून 2023 में जस्टिस मंथा ने एक एसआईटी का गठन किया. हालाँकि, आईआईटी खड़गपुर के अधिकारी और बंगाल पुलिस दोनों फैसले को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में चले गए।

हालाँकि, मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगणनम और न्यायमूर्ति हिरणमई भट्टाचार्य की खंडपीठ ने आदेश को बरकरार रखा और यह भी उल्लेख किया कि दूसरी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के नतीजे के आधार पर आगे की जांच की जाएगी।

परिवार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों में से एक, नीलाद्रि शेखर घोष ने मंगलवार को अदालत के समक्ष एक आवेदन प्रस्तुत किया। इसमें कहा गया, ‘दूसरा पोस्टमॉर्टम, जो पिछले साल मई में किया गया था, ने सुझाव दिया कि मौत हत्या का परिणाम हो सकती है। एसआईटी को इस तथ्य के आलोक में अपनी प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए।”

“मैं एसआईटी को उसके गठन के बाद से ही बता रहा हूं कि दो अदालतों के फैसलों ने संकेत दिया है कि यह हत्या का मामला था, और दूसरी शव परीक्षा के निष्कर्षों के आधार पर आगे की जांच की जाएगी। लेकिन आठ महीने हो गए हैं, और एसआईटी ने कोई प्रगति नहीं की है,” रेहाना ने मंगलवार की अदालती सुनवाई के बाद ईन्यूज़रूम को बताया।

मां ने आगे कहा, “और अब मुझे संदेह है कि वे फैजान के सामान पर कब्जा नहीं कर रहे हैं, जो महत्वपूर्ण सबूत हो सकता है। फैजान के फोन और लैपटॉप से ​​आरोपियों के बारे में पता चल सकता है, लेकिन एसआईटी यह खुलासा नहीं कर रही है कि उन्हें वहां से क्या मिला।

उन्होंने कहा, ”ई गंदी बात करता है, बल्कि खुलासा करता है, 2 छुपता है और पूछता है।”

 

ये इंग्लिश में प्रकाशित स्टोरी का अनुवाद है।

Mother Alleges Cover-up: Calcutta HC Pushes SIT for Answers in IITian’s Murder

Kolkata: The Calcutta High Court has once again urged the Special Investigation Team (SIT), which is probing the murder case of IITian Faizan Ahmed, to expedite its proceedings. Justice Jay Sengupta’s court also stated that the SIT cannot independently file a final report, and the court will review the investigation before making a decision.

In November 2023 also, Jay Sengupta’s court had criticized the SIT for delaying in zeroing on the accused and coming up with anything concrete in the case.

On October 14, 2022, the partially decomposed body of third-year IIT Kharagpur student Faizan Ahmed was recovered from a hostel room on the campus. Faizan, a resident of Tinsukia, Assam, was admitted to IIT Kharagpur during the lockdown in 2020, and he officially joined the campus in December 2021. While Kharagpur police and IIT authorities both claimed that Faizan, who had secured the 11th rank in the Joint Entrance Examination and became part of two research teams in IIT KGP, had committed suicide, his parents claimed he was murdered. The family moved to the Calcutta High Court for justice. Justice Rajsekhar Mantha asked Kharagpur police to ascertain the cause of death. However, even after the first postmortem report, the police could not establish the cause of death, and the court appointed forensic expert Dr. Ajoy Gupta. After reviewing the video clips of the first autopsy, a haemorrhage on Faizan’s body was identified. Dr. Gupta requested the court to order a fresh postmortem, which was granted. Subsequently, after the second autopsy, it was established that Faizan was murdered and had not committed suicide. In June 2023, Justice Mantha constituted an SIT. However, both IIT Kharagpur authorities and Bengal police moved to the division bench challenging the decision.

However, the division bench comprising Chief Justice TS Sivagnanam and Justice Hiranmai Bhattacharyya upheld the order and also mentioned that further investigation would be conducted based on the outcome of the second postmortem report.

One of the lawyers representing the family, Niladri Sekhar Ghosh, submitted an application before the court on Tuesday. It said, ‘The second postmortem, which was conducted in May last year, suggested that the death could be a result of homicide. The SIT should submit its progress report in light of this fact.”

“I have been telling the SIT since its constitution that the decisions of two courts have indicated that it was a case of homicide, and further probe will take place based on the findings of the second autopsy. But it has been eight months, and the SIT has made no progress,” Rehana told eNewsroom after Tuesday’s court hearing.

The mother continued, “And now I doubt that they are not taking possession of the belongings of Faizan, which could be vital evidence. The phone and laptop of Faizan could shed light on the accused, but the SIT is not disclosing what they obtained from there.”

“I feel that the SIT, rather than revealing, is hiding about the accused,” she added.

হাম জঙ্গল সে বাহার আ গেয়ে, ইনকে সাথ বৈঠনে লাগে তো ইনকে কাপড়ে মাইলে হো গেয়ে- হেমন্ত সোরেন অনাস্থা প্রস্তাবের বক্তৃতার সময়

রাঁচিঃ ঝাড়খণ্ড বিধানসভায় আস্থা ভোটে জয়ী হয়েছে চম্পাই সোরেনের নেতৃত্বাধীন গাথবন্ধন সরকার। সরকারের পক্ষে, এটি 47টি ভোট পেয়েছিল, এবং বিধানসভার 29 জন সদস্য এর বিরোধিতা করেছিলেন।

আস্থাভোটের আগে মুখ্যমন্ত্রী চম্পাই সোরেন এবং দলের অন্যান্য নেতারা বক্তব্য রাখেন, তবে হেমন্ত সোরেনের ভাষণই অধিবেশনের প্রথম দিনের প্রধান আকর্ষণ ছিল।

মুখ্যমন্ত্রী চম্পাই সোরেন একটি বক্তৃতা দিয়েছিলেন যার মধ্যে হেমন্ত সোরেনের কাজ এবং জেএমএম-এর কার্যকরী সভাপতির উদ্যোগকে এগিয়ে নিয়ে যাওয়ার প্রতিশ্রুতি অন্তর্ভুক্ত ছিল।

নতুন মুখ্যমন্ত্রী তাঁর ভাষণ শুরু করেন এই বলে, “হেমন্ত হ্যায় তো হেমন্ত হ্যায় (হেমন্ত থাকলে সাহস থাকে)”।

সরাইকেলার ছয়বারের বিধায়ক লকডাউন এবং কোভিডের সময় হেমন্ত সোরেন সরকারের কাজের কথা স্মরণ করেন। তিনি শুধু দূর থেকে পরিযায়ী শ্রমিকদের নিয়ে আসেননি, স্বাস্থ্য পরিকাঠামোকেও শক্তিশালী করেছেন। তিনি চিকিৎসা ছাড়া বা ক্ষুধায় মানুষকে মরতে দেননি।

তিনি বলেন, ‘যে শ্রমিকরা আগে চপ্পল পরতেন, তাঁদের বিমানের মাধ্যমে আনা হত। দুই বছর ধরে রাজ্যটি করোনা আক্রান্ত ছিল, তবুও হেমন্ত বাবু রাজ্যের উন্নয়নের জন্য কাজ করেছিলেন। কোভিড এবং লকডাউনের সময়, হেমন্ত সোরেন মানুষকে চিকিৎসা ছাড়াই মরতে দেননি, ক্ষুধায়ও মরতে দেননি, হেমন্ত বাবুর নামে প্রতিটি গ্রামে প্রকল্প রয়েছে এবং আপনি সেগুলি মুছে ফেলতে পারবেন না।

এবং উল্লেখ করেন, “বৃত্তির পরিমাণ বাড়ানো হয়েছে এবং প্রতিভাবান সুবিধাবঞ্চিত শিক্ষার্থীদের পড়াশোনার জন্য বিদেশে পাঠানো হচ্ছে।”

রাজ্যে বিজেপি সরকার গড়তে ইডি ও সিবিআই-কে অপব্যবহার করা হচ্ছে। এটা গণতন্ত্রের জন্য খুবই বিপজ্জনক “, যোগ করেন মুখ্যমন্ত্রী।

অনাস্থা প্রস্তাব 

জেল থেকে অনাস্থা প্রস্তাব এর অধিবেশনে অংশ নিতে আসা হেমন্ত সোরেন ঝাড়খণ্ডের রাজ্যপালকে এই ষড়যন্ত্রের অংশ বলে অভিযুক্ত করে বলেন, “সম্ভবত এই প্রথম কোনও মুখ্যমন্ত্রীকে দেশে গ্রেপ্তার করা হল। এবং আমি বিশ্বাস করি যে রাজভবনও এর অংশ ছিল।

অনাস্থা প্রস্তাব এর ভাষণে আদিবাসী এবং তাঁর বিরুদ্ধে দুর্নীতির অভিযোগ তুলে ধরা হয়।

হেমন্ত উল্লেখ করেন, “আমাদের বুদ্ধি আমাদের বিরোধিতার মতো নয়, তবে আমরা বুঝতে পারি কোনটি সঠিক এবং কোনটি ভুল। খুব সুচিন্তিতভাবে, 2022 সাল থেকে আমার বিরুদ্ধে ষড়যন্ত্র চলছে। ”

তিনি দাবি করেন যে দলিতদের বিরুদ্ধে এত ঘৃণা রয়েছে এবং আদিবাসীদের জিজ্ঞাসা করেন যে তারা (বিজেপি) কোথা থেকে এত ক্ষমতা পায়।

উপস্থাপক সুধীর চৌধুরী সম্পর্কে মন্তব্য করে, হেমন্ত সোরেনকে জেলে পাঠানোর পর প্রাক্তন উপজাতি মুখ্যমন্ত্রী বলেন, “আদিবাসীদের জঙ্গলে থাকা উচিত। ‘হাম জঙ্গল সে বাহার আ গায়ে “,’ বরাবর বেথ গায়ে” থেকে ‘কাপড়ে মাইলে হোনে লাগে “।

তাদের আচরণ, কাজ এবং বিবৃতি আমাদের প্রতি তাদের ঘৃণার প্রমাণ দেয়। আমি এটা বুঝতে পেরেছি এবং এই ধরনের মানসিকতার বিরুদ্ধে কাজ করেছি।

“কিন্তু আমরা ঝাড়খণ্ডি। দেশ স্বাধীনতার স্বপ্নও দেখছিল না, তারপর থেকে আদওয়াসিরা স্বাধীনতা ও অধিকারের জন্য লড়াই করেছে।

তিনি বিজেপিকে আক্রমণ করতে থাকেন। “তাদের বন্ধুরা 12-14 লক্ষ কোটি টাকার কেলেঙ্কারি করেছে, তারা তাদের বিরুদ্ধে ব্যবস্থা নিতে পারেনি”, তিনি উল্লেখ করে চ্যালেঞ্জ জানিয়েছিলেন, “যদি তাদের কাছে আমার নামে 8.5 একর জমির কাগজপত্র থাকে তবে সেগুলি বিধানসভার সামনে আনুন। আমি রাজনীতি ছেড়ে দেব। যখন তারা নির্বাচনে জিততে পারবে না, তখন তারা পিছনের দরজা থেকে আক্রমণ করবে।

আবেগপ্রবণ হয়ে বিদায়ী মুখ্যমন্ত্রী প্রতিক্রিয়া জানিয়েছিলেন, “আমি চোখের জল ফেলব না, আমি সেগুলি অন্য মুহূর্তের জন্য রাখব। আদিবাসী ও পশ্চাদগামীদের অশ্রুর কোনও মূল্য নেই “।

এবং যোগ করেন, “তাদের প্রতিটি ষড়যন্ত্রের সঠিক সময়ে জবাব দেওয়া হবে”।

সিপিএমএল বিধায়ক বিনোদ সিং তাঁর ভাষণে দাবি করেন যে, হেমন্ত সোরেনের গ্রেপ্তারের সঙ্গে দুর্নীতির কোনও সম্পর্ক নেই, অন্যথায় তিনি এটিকে সমর্থন করতেন।

বিজেপির মতে দুর্নীতির সংজ্ঞা হল, যাঁরা বিজেপির সঙ্গে রয়েছেন, তাঁরা স্বাধীন। আর যারা তাদের বিরুদ্ধে তারা দুর্নীতিগ্রস্ত “, বলেন সিং।

তিনি বিজেপিকে আক্রমণ অব্যাহত রেখেছিলেন, “যদি এটা হত, তাহলে হেমন্ত বিশ্ব, শুভেন্দু অধিকারী, ছগ্গন ভুজবলের মতো দুর্নীতিগ্রস্ত নেতারা তাঁদের সঙ্গে থাকতেন না”।

তিনি বলেন, ‘এমএনআরইজিএ কেলেঙ্কারিতে রঘুবর দাসের বিরুদ্ধে দুর্নীতির অভিযোগ ছিল, কিন্তু রাজ্যপাল নিয়োগের মাধ্যমে তিনি রক্ষা পেয়েছেন।

বিরোধীদলীয় নেতা অমর বাউরি তাঁর প্রত্যাখ্যানে বর্তমান ও বিদায়ী মুখ্যমন্ত্রীদের বক্তৃতার বিরোধিতা করেন এবং দাবি করেন যে বিজেপি আদিবাসীদের ক্ষতি বা অপমান করে না, কারণ তারা দেশকে প্রথম উপজাতি রাষ্ট্রপতি দিয়েছে।

এদিকে, রাহুল গান্ধীর ভারত জোড়ো ন্যায় যাত্রা রাজ্যের রাজধানীতেই ছিল এবং একটি সভাও হয়েছিল।

 

এটি ইংরেজিতে প্রকাশিত প্রতিবেদনের একটি অনুবাদ

हम जंगल से बहार आ गए, इनके साथ बैठने लगे तो इनके कपड़े मैले हो गए- अविश्वास प्रस्ताव भाषण के दौरान हेमंत सोरेन

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रांची: चंपई सोरेन के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने झारखंड विधानसभा में विश्वास मत जीत लिया है. सरकार के पक्ष में 47 वोट मिले, जबकि 29 सदस्यों ने इसका विरोध किया।

विश्वास मत से पहले मुख्यमंत्री चंपई सोरेन और पार्टी के अन्य नेताओं ने भाषण दिया, लेकिन सत्र के पहले दिन का मुख्य आकर्षण हेमंत सोरेन का भाषण रहा।

मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के भाषण में हेमंत सोरेन के काम और झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष की पहल को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता शामिल रही।

नए मुख्यमंत्री ने अपना भाषण इन शब्दों के साथ शुरू किया, “हेमंत है तो हिम्मत है।”

सरायकेला से छह बार के विधायक ने लॉकडाउन और कोविड ​​के दौरान हेमंत सोरेन सरकार द्वारा किए गए कार्यों को याद दिलाया। “हेमंत बाबू ने न केवल दूर-दूर से प्रवासी श्रमिकों को लाया बल्कि स्वास्थ्य ढांचे को भी मजबूत किया। उन्होंने लोगों को न तो बिना इलाज के मरने दिया और न ही भूख से,” चंपई सोरेन ने कहा।

“जो मजदूर चप्पल पहनते थे उन्हें फ्लाइट से लाया गया। दो साल तक राज्य कोरोना से प्रभावित रहा, फिर भी हेमंत बाबू ने राज्य के विकास के लिए काम किया. कोविड और लॉकडाउन के दौरान, हेमंत सोरेन ने न तो लोगों को बिना इलाज के मरने दिया और न ही भूख से, हर गांव में हेमंत बाबू के नाम पर योजनाएं हैं, और आप उन्हें मिटा नहीं सकते,” चंपई ने कहा।

और बताया, “छात्रवृत्ति राशि बढ़ा दी गई है, प्रतिभाशाली वंचित छात्रों को अध्ययन के लिए विदेश भेजा जा रहा है।”

“राज्यों में भाजपा सरकार स्थापित करने के लिए ईडी और सीबीआई का दुरुपयोग किया जा रहा है। यह लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है,” मुख्यमंत्री ने कहा।

अविश्वास प्रस्ताव

अविश्वास प्रस्ताव सत्र में हिस्सा लेने जेल से आये हेमंत सोरेन ने झारखंड के राज्यपाल पर साजिश का हिस्सा होने का आरोप लगाया, ”देश में शायद यह पहली बार हुआ कि किसी मुख्यमंत्री को गिरफ्तार किया गया। और मेरा मानना है कि राजभवन भी इसका हिस्सा था।”

अविश्वास प्रस्ताव, उनके भाषण में आदिवासियों और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर प्रकाश डाला गया।

हेमंत ने कहा, ”हमारी बुद्धि हमारे विपक्ष की तरह नहीं है, लेकिन हम समझते हैं कि क्या सही है और क्या गलत है। बहुत ही सुनियोजित तरीके से 2022 से मेरे खिलाफ साजिश चल रही है।”

उन्होंने आगे कहा के क्यू दलितों और आदिवासियों के खिलाफ इतनी नफरत है और पूछा कि उन्हें (भाजपा) को इतनी ताकत कहां से मिलती है।

हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद आदिवासियों को जंगलों में रहना चाहिए के एंकर सुधीर चौधरी की टिप्पणी पर कमेंट करते हुए पूर्व आदिवासी मुख्यमंत्री ने कहा, ”इनके लोग कहते हैं कि हम जंगल में थे, तो हमे जंगल में रहना चाहिए। हम जंगल से बाहर आ गए, इनके बराबर बैठ गए तो इनके कपड़े मेल हो गए।”

उन्होंने कहा, “उनके व्यवहार, कार्य और बयान हमारे प्रति उनकी नफरत को साबित करते हैं। मैं इसे समझता हूं और मैंने ऐसी मानसिकता के खिलाफ काम किया है।”

झामुमो नेता ने गर्व से कहा, “लेकिन हम झारखंडी हैं। देश, आजादी के बारे में सपने में भी नहीं सोच रहा था, तब से आदिवासियों ने आजादी और अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी।”

उन्होंने बीजेपी पर हमला जारी रखते हुए कहा, ‘उनके दोस्तों ने 12-14 लाख करोड़ के घोटाले किए हैं, वे उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सके.’ अगर मैने 8.5 एकड़ जमीन मैने ली है तो विधान सभा में कागज़ लाकर दिखाये, मैं राजनीति छोड़ दूंगा। जब वे चुनाव नहीं जीत पाते हैं तो वे पिछले दरवाजे से हमला करते हैं।”

भावनात्मक रूप से निवर्तमान मुख्यमंत्री ने प्रतिक्रिया व्यक्त की, “मैं आँसू नहीं बहाऊंगा, मैं उन्हें अन्य क्षणों के लिए रखूंगा। उनके पास आदिवासियों और पिछड़ों के आंसुओं का कोई मूल्य नहीं है।”

और कहा, “उनकी हर साजिश का सही समय पर जवाब दिया जाएगा।”

सीपीआईएमएल विधायक विनोद सिंह ने अपने भाषण में दावा किया कि हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी का भ्रष्टाचार से कोई लेना-देना नहीं है, नहीं तो वह इसका समर्थन करते।

उन्होंने कहा, “भाजपा के अनुसार भ्रष्टाचार की परिभाषा यह है कि जो भाजपा के साथ हैं, वे स्वतंत्र हैं। और जो उनके खिलाफ हैं वे भ्रष्ट हैं, “सिंह ने कहा।

उन्होंने भाजपा पर तीखा हमला करते हुए कहा, “अगर ऐसा होता तो हिमंता बिस्वा, शुभेंदु अधिकारी, छग्गन भुजबल जैसे भ्रष्टाचार के आरोपी उनके साथ नहीं होते।

सिंह ने आरोप लगाया, “मनरेगा घोटाले में रघुबर दास के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप थे, लेकिन उन्हें राज्यपाल नियुक्त करके बचाया गया है।”

अपने खंडन में, विपक्ष के नेता, अमर बौरी ने वर्तमान और निवर्तमान मुख्यमंत्रियों के भाषणों का विरोध किया और दावा किया कि भाजपा आदिवासियों को नुकसान या अपमान नहीं करती है, क्योंकि इसने देश को पहला आदिवासी राष्ट्रपति दिया है।

इस बीच, राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा राज्य की राजधानी में ही थी और एक सभा भी आयोजित की थी।

 

ये इंग्लिश में प्रकाशित स्टोरी का अनुवाद है।

 

Hum Jungle Se Bahaar Aagaye, Inke Sath Baithne Lage To Inke Kapde Maile Ho gaye- Hemant Soren during no-confidence motion speech

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ঝাড়খণ্ডে আরেকটি অনাস্থা প্রস্তাব এবং রাহুল গান্ধীর উপস্থিতি

গোবিন্দপুর/রাঁচি: ঝাড়খণ্ডে স্থিতিশীল সরকার সবসময়ই একটি সমস্যা। বিশেষ করে একজন উপজাতীয় মুখ্যমন্ত্রী তার পাঁচ বছরের মেয়াদ শেষ করতে পারেননি, যা হেমন্ত সোরেনেরও পরিণতি হয়েছিল। হেমন্ত সোরেনের নেতৃত্বাধীন গাথবন্ধন সরকার 2019 সালের বিধানসভা নির্বাচনে সংখ্যাগরিষ্ঠতা পেয়েছিল, তবুও ঝাড়খণ্ড মুক্তি মোর্চা কার্যকরী সভাপতি পদে তার মেয়াদ শেষ করতে পারেননি।

এখন, চম্পাই সোরেন, যিনি হেমন্ত সোরেনের পদত্যাগের পর শপথ নিয়েছেন, তাঁর সরকারকে 81 আসনের ঝাড়খণ্ড বিধানসভায় তাদের সংখ্যাগরিষ্ঠতা প্রমাণ করতে হবে।

ঝাড়খণ্ডে অনাস্থা প্রস্তাব

ঝাড়খণ্ডে বিধানসভায় অনাস্থা প্রস্তাব স্বাভাবিকের চেয়ে বেশি ঘন ঘন হয়েছে। যাইহোক, এবার, যখন অনাস্থা দিবস আসন্ন, কংগ্রেস নেতা রাহুল গান্ধী তার ভারত জোড়া ন্যায় যাত্রা নিয়ে রাজ্যে রয়েছেন।

রাজনৈতিক পর্যবেক্ষকরা বিশ্বাস করেন যে গাথবন্ধন দলগুলির মধ্যে, কংগ্রেস বিধায়করাই পূর্ববর্তী হেমন্ত সরকার সম্পর্কে সময়ে সময়ে অসন্তোষ প্রকাশ করেছেন। সেখানে কয়েকজন জেএমএম বিধায়কও রয়েছেন, তবে সূত্রগুলি ইঙ্গিত দেয় যে কংগ্রেস বিধায়করা সিনিয়র গাথবন্ধন নেতাদের সতর্ক দৃষ্টিতে রয়েছেন।

যাইহোক, কংগ্রেসের সিনিয়র নেতারা স্বস্তি পেয়েছেন যে রাহুল গান্ধীর উপস্থিতি কংগ্রেসকে একত্রিত রাখতে সাহায্য করবে।

রবিবার, রাহুল গান্ধী মন্ত্রী আলমগীর আলম এবং সিপিআইএমএল বিধায়ক বিনোদ সিং এবং প্রাক্তন এমসিসি বিধায়ক অরূপ চ্যাটার্জির সাথে দেখা করেন।

ওয়ানাডের সাংসদ রাঁচিতে একটি জনসভা করবেন। বিধানসভায় অনাস্থা ভোটের পরে এটি হওয়ার পরিকল্পনা করা হয়েছে এবং পরে, গাঠবন্ধন নেতারা রাহুল গান্ধীর সভায় যোগ দেবেন।

বিহার বিধানসভায় 10শে ফেব্রুয়ারি, অনাস্থা প্রস্তাবও অনুষ্ঠিত হবে এবং ঝাড়খণ্ডে গাঠবন্ধনের জয় বা পরাজয় বিগ ব্রাদার রাজ্যের রাজনীতিতে প্রভাব ফেলতে পারে।

প্রাক্তন মুখ্যমন্ত্রী হেমন্ত সোরেনকেও প্রস্তাবে ভোট দেওয়ার অনুমতি দেওয়া হয়েছে। হায়দ্রাবাদে উড়ে আসা গাঠবন্ধন বিধায়করা আজ রাতে ফিরে এসেছেন।

উল্লেখযোগ্যভাবে, ভারতীয় জনতা পার্টির (বিজেপি) উভয় রাজ্য সভাপতি বাবুলাল মারান্ডি এবং গোড্ডা সাংসদ নিশিকান্ত দুবে রাহুল গান্ধীর যাত্রা ঝাড়খণ্ডে প্রবেশের পর থেকে ক্রমাগত আক্রমণ করেছেন।

বিজেপি নেতৃত্বাধীন এনডিএ বিধায়করা এই প্রস্তাবে কীভাবে প্রতিক্রিয়া জানায়, তা দেখা গুরুত্বপূর্ণ। রাজ্যের প্রধান হিসেবে মারান্ডির মেয়াদে এটিই হবে প্রথম ঝাড়খণ্ডে অনাস্থা প্রস্তাব।

প্রস্তাবের ফলাফলের পরে, ইন্ডিয়া ব্লককে ঝাড়খণ্ডে লোকসভা আসন ভাগাভাগি ইস্যুতে কাজ করতে হবে। এবং প্রক্রিয়াটি মসৃণ হবে, যদি ফলাফল তাদের পক্ষে আসে।

রাঁচি-ভিত্তিক সিনিয়র সাংবাদিক রবি প্রকাশ, ই-নিউজরুমকে বলেছেন, “রাহুল গান্ধীর উপস্থিতির কারণে, কংগ্রেস নেতাদের মধ্যে উত্তেজনা রয়েছে, এবং পরিসংখ্যান বলছে গঠবন্ধন তার সংখ্যাগরিষ্ঠতা প্রমাণ করতে সক্ষম হবে৷

“তবে, ফলাফল বিহারে খুব বেশি প্রভাব ফেলতে পারে না। রাজ্যে এখনও একটি সামন্ততান্ত্রিক মানসিকতা রয়েছে। এমনকি বিহারে কংগ্রেসের রাজনীতিতেও সামন্তবাদ রয়েছে। এবং বেশিরভাগই লাইন অনুসারে ভোট দেবেন, যার অর্থ সরকারের পক্ষে যারা। ইতিমধ্যে শপথ নিয়েছেন,” তিনি যোগ করেছেন।

 

এটি ইংরেজিতে প্রকাশিত প্রতিবেদনের একটি অনুবাদ