झामुमो के ‘गुरु-शिष्य’ की गाथा: सुदिव्य कुमार के संघर्ष और सफलता की कहानी

Date:

Share post:

रांची/गिरिडीह: झारखंड में हेमंत सोरेन 2.0 के मंत्री मण्डल का गठन आज हो गया। कुल 11 मंत्रियों ने पद एवं गोपनियता की शपथ राजभवन में ली। शपथ लेने वालों में ज़्यादातर राजनीतिक बैक्ग्राउण्ड से आते हैं या पहले भी मंत्री रह चुके हैं, पर गिरिडीह विधायक सुदिव्य कुमार, उन गिने चुने नेताओं में आते हैं, जिनकी राजनीति में पहली पीढ़ी है।

सुदिव्य कुमार के मंत्री पद के शपथ के साथ ही गिरिडीह सदर को 20 सालों बाद मिला मंत्री पद।

गुरुजी के शिष्य, सुदिव्य

54 वर्षीय सुदिव्य कुमार की झारखंड मुक्ति मोर्चा पार्टी से जुड़ाव तीन दशकों से भी ज्यादा का है।

2004 में जब शिबू सोरेन को कुड़को (पीरटांड़) और चीरूडीह के मामले सामने आने के वजह से केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था और गिरिडीह, जामताड़ा न्यायालय की ख़ाक छाननी पड़ी थी, उस वक़्त सुदिव्य कुमार, जो गिरिडीह झामुमो के ज़िला अध्यक्ष थे उन्होनें गुरुजी को न सिर्फ कानूनी और राजनीतिक मामलों में साथ दिया, बल्कि साये की तरह उनके साथ हर जगह खड़े दिखे।

गिरिडीह कभी भी झामुमो का गढ़ नहीं रहा। पर पहली बार 2004 में ही जेएमएम से मुन्ना लाल विधायक बने थे। पर उस वक़्त भी शिबू सोरेन के साथ सुदिव्य ही रहे।

पहले दो चुनावों में नाकामी मिली

2009 में पहली बार जेएमएम के टिकट पर चुनाव लड़े और बड़े अंतर से हार गए। 2014 में फिर पार्टी के सिंबल से उम्मीदवार हुए पर जीत इस बार भी नहीं सके। हालांकि हार का अंतर बहुत कम हो गया था- मात्र दस हज़ार।

फिर आया 2019 का चुनाव और इस बार 16 हज़ार से दो बार विधायक रहे निर्भय शाहबादी को मात दिया। सुदिव्य भले 2019 में चुनाव जीते हों, पर तब तक सोरेन परिवार के बहुत नजदीक हो गए थे।

अब सुदिव्य, हेमंत सोरेन के भी करीबी और जेएमएम के रणनीतिकार भी माने जाते हैं।

सुदिव्य के पहले कार्यकाल में गिरिडीह को मिला विश्वविद्यालय, मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज

वैसे तो पूरा गिरिडीह ज़िला शिक्षा के मानचित्र में देश में पिछड़ा हुया है, पर सदर विधानसभा के छात्रों को उच्च शिक्षा की पढ़ाई के लिए ख़ास कर दिक्कत आती थी, क्योंकि यहाँ से अच्छे खासे स्टूडेंट्स देश भर में पढ़ाई के लिए जाते हैं। सुदिव्य ने वैसे तो कई काम पिछले कार्यकाल में करवाए पर जो महत्वपूर्ण रहे उनमें महान वैज्ञानिक सर जेसी बोस के नाम पर विश्वविद्यालय, साथ ही मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज का दिलाना।

मंत्री पद के साथ गिरिडीह के लोगों को न सिर्फ पुराने काम जल्द पूरा होने का भरोसा है, बल्कि विकास की नई इबारत ज़िला और प्रदेश में लिखे जाने की उम्मीद है।

spot_img

Related articles

How Haq Rewrites the Shah Bano Case by Erasing Law, History, and State Accountability

Cinema that claims lineage from history does more than narrate events. It curates collective memory, directs moral attention,...

Bangladeshi? Why a Political Label Is Becoming a Death Sentence for India’s Migrants

Across India, Bengali Muslim migrant workers face fear, detention and death driven by identity suspicion, where accents and names turn livelihoods into risks and citizenship itself becomes conditional

A Packed Court, a Woman Leader, and a Question of Democracy: Inside Mamata Banerjee’s SC Appearance

Mamata Banerjee appeared in the Supreme Court, questioning the rushed SIR process and warning that tight timelines could disenfranchise millions of voters across states.

Inside Jaipur’s Amrapali Museum and Its New Immersive Experience

The month of January in Jaipur is the most vibrant time of the year in India’s new cultural...