“महेंद्र सिंह कौन हैं?” — यह सवाल उस आदमी के बारे में कम, पूछने वाले के बारे में ज़्यादा बताता है।
जब हाल ही में बगोदर से मौजूदा भाजपा विधायक नागेंद्र महतो ने सार्वजनिक मंच से यह सवाल उछाला, तो यह कोई भोली जिज्ञासा नहीं थी। यह एक राजनीतिक तंज था—एक ऐसे जननेता की हैसियत को छोटा करने की कोशिश, जिसकी याद आज भी सत्ता को असहज करती है। लेकिन इतिहास ऐसे सवालों का जवाब शब्दों से नहीं, सच्चाई से देता है।
महेंद्र सिंह सिर्फ विधायक नहीं थे।
वह एक सोच थे।
बगोदर की राजनीति में महेंद्र सिंह का उदय किसी सत्ता संरक्षण से नहीं, बल्कि जनसंघर्षों से हुआ था। 1990, 1995 और 2000 में वे तीन बार विधायक चुने गए—उस दौर में जब यह इलाका अविभाजित बिहार का हिस्सा था। ज़मीन, मज़दूरी, विस्थापन और गरीबों के हक़ की लड़ाई उनकी राजनीति का मूल था। वे चुनावी मौसम के नेता नहीं थे; वे हर मौसम में जनता के साथ खड़े रहने वाले नेता थे।
आंदोलनों से निकले नेता, सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं
महेंद्र सिंह की पहचान सिर्फ विधानसभा में दिए गए भाषणों से नहीं बनी। वे सड़कों, गांवों और आंदोलन स्थलों से उभरे नेता थे। मरकच्चो, तेलोडीह और ऐसे कई इलाकों में हुई घटनाओं के बाद जब जनता गुस्से और डर के बीच फंसी थी, तब महेंद्र सिंह ने लोगों को संगठित किया, उनके साथ खड़े हुए और विरोध का नेतृत्व किया।
इन आंदोलनों में वे मंच पर खड़े नेता नहीं, बल्कि जुलूस में चलने वाले साथी थे। पुलिसिया दमन, प्रशासनिक चुप्पी और सत्ता की बेरुखी के खिलाफ़ आवाज़ उठाना उनके लिए जोखिम था, लेकिन वे पीछे नहीं हटे। इन्हीं संघर्षों ने उन्हें जनता का नेता बनाया—ऐसा नेता जो लोगों के दुख को सिर्फ बयान नहीं करता था, उसे अपने कंधे पर उठाता था।
विधानसभा की वो अकेली आवाज़, जिसने सत्ता को हमेशा जनता के प्रति जगाया
साल 2000 में जब झारखंड राज्य बना, तो नई सत्ता संरचनाएं उभरीं। उस दौर में, जब ज़्यादातर दल सत्ता के समीकरणों में उलझे थे, महेंद्र सिंह झारखंड विधानसभा में अक्सर अकेली विपक्षी आवाज़ बनकर खड़े रहे।
कभी विस्थापन का मुद्दा हो, कभी किसानों की बदहाली, कभी आदिवासी और दलित इलाकों की अनदेखी—महेंद्र सिंह ने हर सवाल को सदन में उठाया। संख्या में वे अकेले हो सकते थे, लेकिन आवाज़ में अकेले नहीं थे। उनके पीछे बगोदर और आसपास के इलाकों की जनता खड़ी थी।
यही वजह थी कि बिहार की राजनीति के दिग्गज नेता लालू प्रसाद यादव भी महेंद्र सिंह का सम्मान करते थे। राजनीति में ऐसा सम्मान आसानी से नहीं मिलता—यह जनता के भरोसे और नैतिक ताक़त से मिलता है।
“मैं हूँ महेंद्र सिंह हूँ”: वो पल जो इतिहास बन गया
महेंद्र सिंह का सबसे बड़ा परिचय विधानसभा में नहीं, बल्कि 16 जनवरी 2005 को सामने आया।
एक सार्वजनिक सभा के दौरान हथियारबंद हमलावर आए। उन्होंने भी वही सवाल पूछा जो आज दोहराया जा रहा है—
“महेंद्र सिंह कौन है?”
उस पल में, जब चुप रहना जान बचा सकता था, महेंद्र सिंह ने न छिपने का फैसला किया। उन्होंने खड़े होकर कहा—
“मैं हूँ महेंद्र सिंह।”
इसके कुछ ही पलों बाद, उन्हें गोली मार दी गई। मौके पर ही उनकी मौत हो गई।
यह एक हत्या नहीं थी। यह सत्ता और डर के खिलाफ़ खड़े एक जननेता की शहादत थी।
दो दशक बाद भी बगोदर क्यों याद करता है महेंद्र सिंह
आज की राजनीति में, जहां यादें छोटी होती जा रही हैं और सिद्धांत बदलते रहते हैं, महेंद्र सिंह की याद असहज करती है। शायद इसी वजह से उनकी पहचान को छोटा करने की कोशिशें होती हैं।
लेकिन बीस साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी, हर 16 जनवरी को बगोदर और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं। यह कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं होता—यह स्मृति का सैलाब होता है।
लोग एक ऐसे नेता को याद करते हैं जो गांव-गांव गया, जो ज़मीन पर बैठकर लोगों की बात सुनता था, जो सत्ता से नहीं, जनता से ताक़त लेता था।
महेंद्र सिंह मूर्तियों में नहीं, सरकारी विज्ञप्तियों में नहीं, बल्कि लोगों की सामूहिक याददाश्त में ज़िंदा हैं।
तो सवाल फिर उठता है—
महेंद्र सिंह कौन हैं?
वह जवाब हैं जो मिटाया नहीं जा सकता।
वह नाम हैं जो गोलियों से ख़त्म नहीं होता।


