मिथुन कोबरा हैं, किसान आतंकवादी हैं, दीदी की स्कूटी गिर जाएगी

रविश कुमार लिखते हैं: ख़ुद कभी रोज़गार पर आँकड़े नहीं दे पाए। जो आँकड़े आते थे उसे बंद कर दिया। अपनी सरकार की नौकरियों का हिसाब नहीं दिया। आए दिन ट्विटर पर रेलवे और स्टाफ़ सिलेक्शन कमीशन को लेकर ट्रेंड होता रहता है, उस पर तो प्रधानमंत्री ने न बयान दिया न पहल की लेकिन बंगाल में जा कर रोज़गार का मुद्दा उठा रहे हैं

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कोलकाता में प्रधानमंत्री मोदी ने ममता बनर्जी के बारे में कहा कि हम हर किसी का भला चाहते हैं, हम नहीं चाहते कि किसी को चोट लगे लेकिन लेकिन जब स्कूटी ने नंदीग्राम में गिरना तय किया है तो हम क्या करें।

प्रधानमंत्री की भाषा का जब कभी अध्ययन होगा तब लोग यह देख पाएँगे कि उन्होंने जिस भाषा और भाषण से जिस पद को पाया उस पद की गरिमा अपने भाषण और उसकी भाषा में कितनी गिराई है। कभी तेल के दाम कम होने पर खुद को नसीबवाला कहने वाले प्रधानमंत्री के भाषण का यह हिस्सा अजीब है। स्कूटी गिर जाने का रूपक चुनते हैं। किसी दिन यह भी कह देंगे कि आपकी कार पलट जाएगी, जहाज़ गिर जाएगा। बिहार में एक वक्त डी एन ए का मसला ले आए थे
संदर्भ यह है कि ममता बनर्जी ने स्कूटी चला कर तेल की क़ीमतों का विरोध किया था। उन्हें चलानी नहीं आती थी तो सुरक्षाकर्मी स्कूटी को सहारा दे रहे थे।

अब इस घटना को प्रधानमंत्री अपने भाषण में किस तरह लाते हैं आपको देखना चाहिए। वे तेल के दाम के विरोध की बात को गोल कर जाते हैं लेकिन उसके बढ़ने के विरोध के तरीक़े का मज़ाक़ उड़ाना नहीं भूलते। यह भी कहते हैं कि स्कूटी
नहीं गिरी नहीं तो दीदी जिस राज्य में स्कूटी बनी है उस राज्य को दोष देती।

प्रधानमंत्री कितने सतही तरीक़े से बातों को रखते हैं। अगर अन्य कारणों से उनकी लोकप्रियता नहीं होती तो लोग उनके कई भाषणों और कई भाषणों के हिस्से पर शर्म करते। कभी ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर सीधे सीधे झूठ बोल देना तो कभी डी एन ए की बात उठाना तो कभी गुजरात दंगों के संदर्भ में यह कहना कि उन्हें तो कार के नीचे पिल्ले के आ जाने पर भी तकलीफ़ होती है। उनके भाषणों में राजनीतिक मर्यादा की गिरावट के कई प्रसंग भले भुला दिए गए हों लेकिन जब अध्ययन होगा तो लोग जान सकेंगे कि उन्होंने लोकप्रियता के नाम पर किन किन बातों को अनदेखा किया है।

जिस मंच पर प्रधानमंत्री ममता बनर्जी के लिए स्कूटी के गिर जाने का रूपक चुनते हैं तो उसी मंच पर मिथुन चक्रवर्ती कहते हैं कि वे कोबरा है। काटते ही इंसान फ़ोटो में बदल जाता है।

संवाद भले फ़िल्मी हो मगर संदर्भ तो ममता को लेकर ही था। इस घटिया संवाद के ज़रिए ममता बनर्जी को टार्गेट करते हैं और कहते हैं मैं जिसे मारता हूँ उसकी लाश श्मशान में मिलती है। मिथुन कोबरा बन कर बीजेपी में गए हैं या बीजेपी में जाने के बाद कोबरा बन गए हैं। अगर बीजेपी में नहीं जाते तो ईडी और आयकर विभाग के डर से भीगी बिल्ली बने फिरते।

प्रधानमंत्री की भाषा में राजनीतिक मर्यादा के पतन का असर दूसरे नेताओं में भी दिखता है। उनके समर्थकों की भाषा में भी दिखता है। आप मेरे ही लेख के किसी कमेंट में जाएँगे तो उनके समर्थकों की भाषा देख सकते हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक उन्होंने लोकतांत्रिक भाषा को कुचलने का नेतृत्व किया है। मोदी संभवतः सबसे ख़राब भाषण देने वाले नेताओं में से हैं। उनके भाषण में ताली बजवाने और ललकारे की क्षमता तो है मगर वे अपनी भाषा के ज़रिए राजनीति की हर उस मर्यादा को ध्वस्त करते हैं जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए ज़रूरी होती है। कभी लाल क़िले के भाषण से झूठ बोल दिया तो कभी संसद में घुमा फिर कर ऐसे बोल गए जैसे चतुराई ही सत्य हो।

ख़ुद कभी रोज़गार पर आँकड़े नहीं दे पाए। जो आँकड़े आते थे उसे बंद कर दिया। अपनी सरकार की नौकरियों का हिसाब नहीं दिया। आए दिन ट्विटर पर रेलवे और स्टाफ़ सिलेक्शन कमीशन को लेकर ट्रेंड होता रहता है, उस पर तो प्रधानमंत्री ने न बयान दिया न पहल की लेकिन बंगाल में जा कर रोज़गार का मुद्दा उठा रहे हैं। विपक्ष के राज्यों में भाजपा रोज़गार को मुद्दा बनाने लगी है लेकिन बिहार मध्यप्रदेश सहित अपने राज्यों में रोज़गार की बात ही नहीं करती। मोदी जी के भाषण चतुराई के लिए ही जाने जाते रहेंगे जिस चतुराई की क़ीमत जनता को ही चुकानी है। प्रधानमंत्री ने एक बार भी नहीं कहा कि किसानों को आतंकवादी मत कहो।

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