क्या बढ़ रहा है किसान आंदोलन का कैचमेंट एरिया?

किसान आंदोलन के साथ बदली हुई परिस्थितियों में बात की जाए तो पश्चिम उत्तर-प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल और कांग्रेस जैसे दलों को पैर पसारने के लिए ज़मीन मिल गई है। क्योंकि, आंदोलन से पहले इस क्षेत्र में जयंत चौधरी से लेकर प्रियंका गांधी तक को रैलियों में भीड़ जुटाना मुश्किल होता था। लेकिन, अब तस्वीर बदल गई है और इनकी रैलियों के दौरान बड़ी संख्या में आ रही भीड़ से यह पुष्टि होती है कि गैर-भाजपा दलों को अपना राजनैतिक अस्तित्व हासिल करने का मौका मिला है

Date:

Share post:

किसान आंदोलन को नब्बे दिनों से अधिक का समय बीत गया है। इस दौरान कुछेक मौके ऐसे आए जब ये दावे किए गए कि किसान आंदोलन कमज़ोर पड़ने लगा है। इन दिनों एक बार फिर कहीं-कहीं से यह बात सुनाई दे रही है कि दिल्ली सीमा स्थित सिंघु, टिकरी और गाजीपुर धरना-स्थलों पर लोगों की संख्या कम दिख रही है। ऐसे में यह आंदोलन मंद पड़ने लगा है।

प्रश्न यह है कि सच्चाई क्या है और किसान आंदोलन की दिशा किस ओर है? वहीं, इन धरना-स्थलों से जुड़ी तमाम तस्वीरों और वीडियो से तो यह जाहिर होता है कि वहां खासी संख्या में लोग अब भी बने हुए हैं। ये तस्वीरें और वीडियो इस तादाद तक हैं कि इन पर संदेह करने का कोई कारण दिखाई नहीं देता है। फिर भी यदि यह बात मान लें कि किसान आंदोलन के धरना-स्थलों से आधी तक भीड़ छट गई है तो रणनीतिक स्तर पर ऐसा लगता नहीं है कि आंदोलनकारियों का स्वर दब रहा है। उल्टा आंदोलन की अब तक की यात्रा देखें तो यही वह पड़ाव है जब इसका स्वरूप बदलते हुए दिख रहा है और यह पहले से अधिक विस्तार पा रहा है।

पहली बात तो किसान आंदोलन में लोगों की संख्या में आई गिरावट से जुड़े दावे एक एजेंडा के तहत भी हो सकते हैं, ताकि किसानों का मनोबल टूटे और वे सरकार की बात मानने के लिए तैयार हो सकें।

दूसरी तरफ़, आज की तारीख़ में बात करें तो पश्चिम उत्तर-प्रदेश गन्ना बेल्ट है और पंजाब व हरियाणा गेंहू बेल्ट है। इसीलिए रबी के मौसम की इन दोनों फ़सलों की अच्छी उपज़ लेने की तैयारी में कई किसान अपने-अपने ख़ेतों में काम कर रहे हैं। हालांकि, भौगोलिक नज़रिए से ऐसा भी नहीं है कि किसी भी परिस्थिति में किसान कुछ घंटों में धरना-स्थलों तक न पहुंच सकें। दूसरी बात यह है कि ख़ासतौर से पश्चिम उत्तर-प्रदेश और हरियाणा में ज़गह-ज़गह महापंचायतों का आयोजन हो रहा है। इसी तरह, उत्तर-प्रदेश में कई किसान आगामी जिला पंचायत चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं।

गांव-गांव, ढाणी ढाणी पहुंचा आंदोलन

धरना-स्थलों से दूर किसानों की महापंचायत और रैलियों में जुट रही भारी भीड़ से ज़ाहिर होता है कि यह आंदोलन धरना-स्थलों से दूर-दराज़ के गांवों तक फ़ैल रहा है और किसान गांव-गांव संगठित हो रहे हैं। कारण स्पष्ट है कि धरना-स्थल पर कई किसानों की मौत का असर केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार पर पड़ता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। इसलिए, किसान नेताओं को अब यह लगने लगा है कि सरकार सिर्फ़ वोट प्रभावित होने से ही डरती है। ऐसे में उनकी कोशिश है कि यदि पंचायत स्तर पर भाजपा कमज़ोर पड़ जाए और स्थानीय चुनावों में पार्टी को हार का सामना करना पड़े तो संभवत: सरकार संयुक्त किसान मोर्चा की बात मानने पर मज़बूर हो जाए।

इन महापंचायतों की सफ़लता इस बात से भी आंकी जा सकती है कि उत्तर-प्रदेश राज्य सरकार की पुलिस इन्हें आयोजित करने वाले व्यक्तियों के ख़िलाफ़ सख़्ती से पेश आ रही है। जैसे कि पिछली 10 जनवरी को आयोजित अलीगढ़ महापंचायत में राज्य पुलिस ने करीब छह हज़ार लोगों पर मुकदमे क़ायम किए। इन महापंचायतों में यदि पुलिस की घेराबंदियों के बावज़ूद हज़ारों की तादाद में भीड़ आ रही है तो ऐसी स्थिति में गाजीपुर सीमा की भीड़ उतना मायने नहीं रखती है। इसका अर्थ यह है कि किसान आंदोलन अब विकेन्द्रित होता जा रहा है।

दूसरी तरफ़, संयुक्त किसान मोर्चा की रणनीति बदली हुई है। मोर्चा ‘रेल रोको’ अभियान की तरह अब ऐसे कॉल कर रहा है जिससे यह आंदोलन प्रसार पा सके। देखा जाए तो बात महज़ तीन क़ानूनों की वापिसी की मांग से शुरू हुई थी, मगर अब गांव-गांव आंदोलन होने से ख़ेती-किसानी से जुड़े हर संकट पर बात हो रही है। इस नज़रिए से इसका एक्सटेंशन शुभ संकेत है।

हालांकि, रैली में भीड़ इसकी सफ़लता का एक पैमाना हो सकता है। लेकिन, सफ़लता का असल पैमाना यह होना चाहिए कि किसान नेता हर रैली में अपनी बात ठीक तरह से लोगों तक पहुंचा पा रहे हैं। यदि किसान नेता इन रैलियों में अपनी बात ठीक तरह से पहुंचा पा रहे हैं तो यह निकट भविष्य में देखना होगा कि स्थानीय किसान नेता ऐसी बातों को किस सीमा तक और अधिक लोगों तक आगे पहुंचा पाते हैं या नहीं।

कैसे बन रही है हवा

किसान आंदोलन का स्वरूप बदलने के बावज़ूद यह बात महत्त्वपूर्ण है कि यह किसी एक नेता के पीछे खड़ा आंदोलन नहीं बन पाया है। संभवत: इसकी वजह से देश के अन्य राज्यों में भी किसान-आंदोलन के समर्थन की ख़बरें आ रही हैं। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के यवतमाल से लेकर मुंबई के आज़ाद मैदान तक किसान जुटे हैं। वहीं, पहले किसान नेताओं को बैठक आयोजित करने के लिए ख़ुद पहल करनी पड़ती थी, लेकिन अब स्थानीय स्तर पर कई राज्यों के किसान आंदोलन से जुड़े बड़े नेताओं को आमंत्रित कर रहे हैं। जैसे कि कुछ दिनों पहले ही महाराष्ट्र के ही यवतमाल में करीब चालीस सामाजिक संगठनों ने राकेश टिकैत को रैली में बुलाए जाने की मांग पर एक जनसभा आयोजित की।

इसी तरह, यह बात भी अहम है कि यदि शरीर में बीमारी है तो एक ज़गह दबाने का अर्थ यह नहीं है कि वह समाप्त होगी। हो सकता है कि वह शरीर के दूसरे अंग से फ़ूट जाए। इस आंदोलन ने किसानों की दुख-तकलीफ़ों को सतह पर ला दिया है। इसकी वजह से कृषि संकट से जुड़े कई प्रश्न भी सामने आ गए हैं और उन पर व्यापक चर्चा भी हो रही है। लेकिन, समाज के दूसरे तबक़े भी ख़ुश हैं तो ऐसा नहीं है। देश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए ख़ासकर बेरोज़गार युवा, सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़े कर्मचारी और मज़दूरों का असंतोष संगठित तरीके से सामने आना बाक़ी है। ऐसे तबक़ों के लिए मौज़ूदा किसान आंदोलन एक प्रेरक घटनाक्रम की तरह है। ऐसे तबक़े संगठित और प्रभावशाली होंगे तो मालूम नहीं किंतु यह ख़बर भी किसी से छिपी नहीं है कि ये भी अपने-अपने स्तर पर अपनी-अपनी मांगों को लेकर व्यापक आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। कल को हो सकता है कि सरकार इसी तरह से उनके आंदोलनों को भी दबाने की कोशिश करे, लेकिन फिर कहीं और से गुस्सा फ़ूटेगा। इसलिए, सरकार को ज़रूरत इस बात की है कि वह नीतिगत मोर्चे पर अपनी समीक्षा करे और ऐसी योजनाएं बनाए जिससे ज़्यादा से ज़्यादा वंचित तबक़ों को लाभ मिले।

दूसरी तरफ़, किसान आंदोलन के साथ बदली हुई परिस्थितियों में बात की जाए तो पश्चिम उत्तर-प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल और कांग्रेस जैसे दलों को पैर पसारने के लिए ज़मीन मिल गई है। क्योंकि, किसान आंदोलन से पहले इस क्षेत्र में जयंत चौधरी से लेकर प्रियंका गांधी तक को रैलियों में भीड़ जुटाना मुश्किल होता था। लेकिन, अब तस्वीर बदल गई है और इनकी रैलियों के दौरान बड़ी संख्या में आ रही भीड़ से यह पुष्टि होती है कि गैर-भाजपा दलों को अपना राजनैतिक अस्तित्व हासिल करने का मौका मिला है। ऐसा इसलिए संभव हुआ है कि इस आंदोलन से किसान यूनियनों में भी एक नई चेतना आई है।

एक संदेश यह भी

शुरुआत में यह आंदोलन किसानों का था। लेकिन, अब इससे अन्य तबक़े जुड़ रहे हैं तो इसकी वजह है। दरअसल, कृषि क़ानूनों से यदि किसान प्रभावित होगा तो इसका मतलब यह है कि इनसे पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। वहीं, देश की ग्रामीण पट्टी में कोरोना महामारी के कारण लोगों के पास बड़ी संख्या में काम नहीं है। बहुत संभव है कि ऐसे लोगों का एक हिस्सा किसानों के साथ हमदर्दी रखे और उन्हें समर्थन दे। यही कारण है कि पंजाब से चला आंदोलन आज विस्तार पा गया है। आज सिंघु सीमा नेपथ्य में जा रही है। टिकरी और गाजीपुर की सीमाएं भी नेपथ्य में जा रही हैं। इसके पीछे कारण यह है कि इनसे ज़्यादा भीड़ अब अन्य ज़गहों पर ज़मा हो रही है। फिर ख़ास बात यह है कि किसान महापंचायत और रैलियां गांव-गांव आयोजित हो रही हैं इसलिए गांव में किसान से लेकर अन्य वर्ग के परिवारों को उनकी अपनी ज़गह पर सीधे जुड़ने का मौका मिल रहा है।

Related articles

‘We Need to Be More Understanding’: Sharmila Tagore Backs Seher Hashmi’s ‘Beyond the Horizon’ Ride

Seher Hashmi’s 7,000-km Beyond the Horizon expedition, flagged off by Sharmila Tagore in Delhi, aims to break mental-health myths and encourage people to seek support.

From GB Meeting Dispute to Campus Clash: What Happened at Jadavpur University

A violent confrontation at Jadavpur University over a proposed FETSU general body meeting left several students injured, as ABVP and Left-backed student organisations traded allegations of assault, vandalism and stone-pelting.

A Lifetime for the Marginalised: Remembering Kazi Mohammed Sherif, Champion of People’s Movements in Bengal

Kazi Mohammed Sherif spent a lifetime standing with marginalised communities, building institutions and strengthening people’s movements. His journey from public service to grassroots activism left behind a legacy of social justice, mentorship and collective action

“I Was Branded Pakistani, Terrorist”: Hafiz Says Threats Began After Jantar Mantar Protest, Father Murdered

Kolkata: The father of Cockroach Janta Party (CJP) member Sheikh Abdul Hafiz was murdered on August 15, two...