झारखंड के युवा, आने वाले चुनाव के पहले, फेक न्यूज़ से सावधान रहें

Date:

Share post:

रांची। दो दशक पहले जब झारखंड का निर्माण हुआ था तो खनिज सम्पदा से सम्पन्न राज्य के युवाओं के कई सपने थे, पर आज झारखंड के युवा कई तरह के सवालों से घिरे हुये हैं।

झारखंड के युवाओं के आज के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक हालात पे चर्चा के लिए झारखंड जनाधिकार महासभा ने 29-30 सितम्बर को एक दो-दिवसीय युवा सम्मेलन का आयोजन रांची में किया। महासभा राज्य की विभिन्न जन संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक मंच है। सम्मेलन में विभिन्न ज़िलों से लगभग 100 युवा भाग लिए थे।

सम्मेलन का मूल उद्देश्य था वर्तमान सामाजिक-राजनैतिक और सांस्कृतिक चुनौतियों को समझना और आगे के लिए रणनीति बनाना।

सम्मेलन में अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं – जैसे अलोका कुजूर, बिरेन्द्र कुमार, दयामनी बरला, डेविड सोलोमन, दीपक बारा, एलीना होरो, फैसल अनुराग, कुमार चंद मार्डी, जसिन्ता केरकेट्टा, मंथन, मेघनाथ, मुमताज़, पल्लवी प्रतिभा, प्रवीर पीटर, सकीना धोराजिवाला, तारामणि साहू, विनोद कुमार, विकास शर्मा, विश्वनाथ आज़ाद, विवेक आदि – ने अपनी बात रखी।

फैसल अनुराग ने झारखंड की राजनैतिक और सांस्कृतिक इतिहास को युवाओं के बीच दोहराया। वहीं दयामनी ने आदिवासियों के ज़मीन पर हो रहे लगातार हमलों एवं उनके विरुद्ध संगठित होने के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं को बिरसा मुंडा और सिदो-कान्हो, जो काफी कम उम्र में आदिवासियों के अधिकार के लिए अपना जान दे दी, के बलिदान को भूलना नहीं चाहिए।

फैसल अनुराग ने झारखंड की राजनैतिक और सांस्कृतिक इतिहास को युवाओं के बीच दोहराया। वहीं दयामनी ने आदिवासियों के ज़मीन पर हो रहे लगातार हमलों एवं उनके विरुद्ध संगठित होने के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं को बिरसा मुंडा और सिदो-कान्हो, जो काफी कम उम्र में आदिवासियों के अधिकार के लिए अपना जान दे दी, के बलिदान को भूलना नहीं चाहिए।

अलोका कुजूर, जिनपर फेसबुक पोस्ट के लिए देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है, ने अभिव्यक्ति के आज़ादी पर हो रहे हमले के विषय में बताया। इसके अलावा कई अनेक मुद्दों पर बात हुई – जैसे बढ़ता बहुसंख्यकवाद, मॉब लिंचिंग, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों का शोषण एवं रोज़गार का अभाव जैसे हालात पर भी चर्चा हुई।

मानकी तुबिद ने सबके सामने एक चौकाने वाली जानकारी राखी के उन्होंने पश्चिमी सिंहभूम के सभी थानों से यह जानकारी मांगी थी कि राज्य बनने के बाद SC-ST अत्याचार कानून अंतर्गत कितने केस दर्ज हुए थे। उन्हें यह पता चला कि केवल 36 केस दर्ज हुआ है। अभी भी अधिकांश मामलों में, खास कर के वैसे मामले जिनमे आर्थिक रूप से दबंग लोग दोषी हैं, अनुसन्धान ही चल रहा।

लेखिका व कवियत्री जसिन्ता केरकेट्टा ने आदिवासी समुदाय के मूल सोच – बराबरी और सामुदायिकता – के विषय में बात की। साथ ही, इन मूल्यों को कैसे लगातार कमज़ोर की जा रही है, यह भी बताया।

फ़िल्म निर्माता मेघनाथ ने साझा किया कि कैसे सांस्कृतिक पहल राज्य के विभिन्न संघर्षों का हिस्सा रहा है एवं वर्तमान समय में संस्कृति संघर्ष में और भी ज़रूरत है।

बिरेन्द्र कुमार ने समाज की विभिन्न संस्थाओं जैसे कॉलेज, सरकारी ऑफिस आदि में कमज़ोरों पर हो रहे शोषण के विषय पे चर्चा की। सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण ज़रूरी है लेकिन भाजपा व आरएसएस लगातार इसे हमला कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं को सरकार की जन-विरोधी नीतियों के विरुद्ध राजनैतिक संघर्ष करने की ज़रूरत है। आनेवाले विधान सभा चुनाव में इसका मौका है।

दीपक बार ने फेक न्यूज़ के बढ़ते इस्तेमाल पर बात रखी और सभी प्रतिभागियों को बताया कि आने वाले चुनाव के पहले फेक न्यूज़ से सावधान रहना चाहिए।

अनेक युवाओं ने कहा कि भाजपा द्वारा जन अधिकारों, आदिवासियों के सांस्कृतिक इतिहास और लोकतान्त्रिक अधिकारों पर लगातार हमला क्या जा रहा है। भाजपा और आरएसएस द्वारा युवाओं को सांप्रदायिक रूप से गोलबंद करने पर भी बात हुई।

सम्मेलन के अंत में प्रतिभागियों ने अपने क्षेत्र के युवाओं को सामाजिक-राजनैतिक व संस्कृति रूप से संगठित करने के लिए एक विस्तृत रणनीति बनाई।

spot_img

Related articles

Inside Jaipur’s Amrapali Museum and Its New Immersive Experience

The month of January in Jaipur is the most vibrant time of the year in India’s new cultural...

बगोदर में ‘मैं हूं महेंद्र सिंह’ की गूंज, 21वें शहादत दिवस पर उमड़ा जनसैलाब

बगोदर (झारखंड): “महेंद्र सिंह कौन है?”—यह सवाल 16 जनवरी 2005 को हत्यारों ने किया था। 21 साल बाद...

Who Was Mahendra Singh? The People’s Leader Power Tried to Forget

Mahendra Singh rose from mass protests, challenged power as a lone opposition voice, and was killed after declaring his identity, yet two decades later, people still gather to remember him

बीस साल बाद भी लोग पूछते नहीं, जानते हैं—महेंद्र सिंह कौन थे

महेंद्र सिंह, तीन बार विधायक और जनसंघर्षों के नेता, जिन्होंने ‘मैं हूँ महेंद्र सिंह’ कहकर गोलियों का सामना किया और झारखंड की राजनीति में अमिट विरासत छोड़ी।