होमबाउंड: दलित–मुस्लिम पहचान पर नए भारत की सियासत का कड़वा सच

यह कहानी लॉकडाउन की मार, नौकरी के संकट और जाति-धर्म के रोज़मर्रा के भेदभाव को एक जगह जोड़ती है। Homebound बताती है कि संकट केवल महामारी का नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था का भी था। फ़िल्म आज के भारत की असल तस्वीर को बिना लाग-लपेट दिखाती है

Date:

Share post:

फिल्म ‘मसान’ से चर्चित हुए निर्देशक नीरज घायवान की फिल्म ‘होमबाउंड’ बॉलीबुड के फिल्मी पैटर्न को तोड़ती हुई फिल्म है। इस फिल्म के नायक (चाहें तो मुख्य पात्र कहें) चंदन वाल्मीकि और शोएब मलिक दो व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि समकालीन भारतीय समाज में दलितों-मुसलमानों के प्रातिनिधिक चरित्र हैं। कोई व्यक्ति या कोई खलनायक इनके जिंदगी के सपने, गरिमा, आत्मसम्मान और लोकतांत्रिक अधिकारों को नहीं रौंदता हैं, इनसे इनका किसी और के जैसा ही इंसान होने का हक नहीं छीनता है, पूरा का पूरा सिस्टम रौंदता है, कुचलता है। दलित समुदाय का चंदन वाल्मीकि तो सैंकड़ों वर्षों से वर्ण-जातिवादी व्यवस्था, संस्कृति, जीवन-मूल्यों, आदर्शों और मनोविज्ञान की पग-पग मार झेलता ही रहा है, शोएब भी नए हिंदू राष्ट्र के पैरोकारों के निज़ाम में चंदन की नियति को पहुंच गया है। कुछ मामलों में चंदन से भी बदतर स्थिति में भी।

चंदन फिल्म में एक-दो बार शोएब को हिंदू नाम देकर पिटाई-अपमान से बचाने की कोशिश करता है। हां, एक-दो बार वह खुद को मुस्लिम के रूप में प्रस्तुत करके शोएब के साथ मार भी खाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि शोएब के प्रति पहले दुराग्रह-पूर्वाग्रह नहीं थे, पर नए निज़ाम ने उसे खाद-पानी देकर एक बीज को पूरा का पूरा बरगद का पेड़ बना दिया है।

जाति–धर्म की संयुक्त कैद में दो सपने

वैसे तो इस देश में चंदन वाल्मीकि और शोएब मलिक होना ही किसी इंसान की नियति तय करने के लिए आज काफी है, इसके साथ ही दोनों का मेहनत-मजूरी करने वाले मां-बाप का बेटा होना, रही-सही कसर पूरी कर देता है। नीरज घेवान को भारतीय समाज के इस सच का पूरी तरह अहसास है कि यदि आप वाल्मीकि हैं, मुस्लिम हैं, उसके मजदूर वर्गीय स्थिति के हैं, तो आपके लिए देश में ज्यादातर रास्ते बंद हैं। आपकी उड़ान की हर कोशिश को, अपनी जातीय-धार्मिक और वर्गीय वंचना से निकलने के हर प्रयास को नाकाम बना देने के लिए पूरा का पूरा सिस्टम मौजूद है। फिर आप चाहे कितने ही काबिल और होनहार क्यों न हों। सामाजिक-धार्मिक तौर पर निम्न स्थिति के साथ वर्गीय निम्न स्थिति जब जुड़ जाती है, तब इस देश में स्थिति कितनी भयावह हो जाती है, यह चंदन-शोएब की कोशिशों और नाकामयाबियों से समझा जा सकता है, जिसकी अत्यंत यथार्थपरक प्रस्तुति यह फिल्म करती है।

चंदन-शोएब का घर आस-पास है। वैसे भी इस देश के शहरों में दलित-मुस्लिम मुहल्ले और आवास आसपास ही अक्सर होते हैं। विशेषकर गरीब और निम्न मध्यवर्गी बड़े हिस्से की। चंदन वाल्मिकी हिंदू समाज के श्रेणीक्रम में जहां खड़ा है, वहां हिंदूपन की बू का शिकार होकर शोएब से घृणा करने का कोई संस्कार नहीं पाया है या उसके पास इसकी कोई वजह नहीं हैं। शोएब भी हिंदू के बू के शिकार किसी लड़के या परिवार से शायद ही घना दोस्ताना रिश्ता बना पाए, खासकर आज के दौर में। दोनों के बीच घनी दोस्ती है। साथ ही पढ़ते हैं, अक्सर साथ ही रहते हैं, साथ ही खेलते हैं, एक-दूसरे के घर खाते-पीते हैं। दोनों के मां-पिता और बहन एक दूसरे की मां-पिता और बहन जैसे ही हैं। दोनों के सपने भी एक ही हैं– पुलिस में भर्ती होना। पुलिस में भर्ती होकर दोनों अपनी और अपने परिवार की दो बुनियादी समस्याएं हल करना चाहते हैं। पहली आर्थिक। चंदन की मां, पिता, बहन और खुद चंदन की सबसे बड़ी इच्छा है कि उनका एक पक्का घर हो, यही सबसे बड़ा सपना है। पिता खटते हैं, बहन पढ़ाई छोड़कर स्कूल में दाई का काम करती है। बच्चों के पोतड़े साफ करती है। लेकिन पिता-बहन की कमाई से इतना नहीं जुट पाता कि वे अपने लिए पक्का घर बना सकें। सारा कुछ चंदन और उसके भविष्य पर निर्भर है। शोएब का सबसे बड़ा ख्वाब पिता के पैर का आपरेशन करना है, ताकि वे चल सकें।

वर्दी का वादा, ज़िंदगी का धोखा

दोनों इंटर पास हैं। पुलिस भर्ती की तैयारी कर रहे हैं। फार्म भर रहे हैं। परीक्षा दे रहे हैं। पहले परीक्षा नहीं होती, परीक्षाएं कभी होती हैं, तो रिजल्ट नहीं आता। लेकिन दोनों एक अन्य बड़े कारण से पुलिस में भर्ती होना चाहते हैं। वह कारण यह कि उन्हें लगता है कि यदि वे पुलिस बन जाएंगे, तो वाल्मीकि होने और मुस्लिम होने के चलते होने वाले रोज-रोज के अपमान और संघर्ष से मुक्ति मिल जाएगी। उनका आत्मसम्मान और व्यक्तिगत गरिमा वापस मिल जाएगी। चंदन कई बार एससी कैटेगरी में नहीं सामान्य कैटेगरी में फार्म भरता है ताकि वहां पुलिस में भी उसे वाल्माकि होने के चलते अपमानित न होना पड़े या किया जाए। अलग-अलग कारणों से दोनों पुलिस में भर्ती नहीं हो पाते। चंदन के अंतिम तौर पर भर्ती होने की जब सूचना आती है, तब तक उसकी मौत हो चुकी है। शोएब के पास एक विकल्प अरब देशों में जाने का है, लेकिन वह मां-बाप का अकेला बेटा है, वह उन्हें और अपने परिवेश को छोड़कर जाना नहीं चाहता है। चंदन अंत मे गुजरात मजदूरी करने जाता है। बाद में शोएब भी उसके पास ही आ जाता है। अंत में दोनों की नियति उन्हे फैक्ट्री में मजदूर बना देती है। दोनों अपने-अपने मजदूर परिवार को हाड़-तोड़ मेहनत-मजूदरी से बाहर निकालना चाहते हैं, खुद भी निकलना चाहते हैं, लेकिन उन्हें मजदूर ही बने रहना पड़ता है।

कोविड का प्रहार: 1200 किलोमीटर की मौत-यात्रा

दोनों के सपने कुछ उड़ान भरते है, तभी कोविड काल शुरू हो जाता है। सपने अधूरे ही दम तोड़ देते हैं। चंदन 1200 किलोमीटर की घर-वापसी की यात्रा में दम तोड़ देता है, शोएब की बाहों में। उसे बचाने की शोएब की सारी कोशिश नाकामयाब हो जाती है। फिल्म कोविड काल की मजदूरों पर पड़ी मार, पुलिसिया दमन और सिस्टम की निर्ममता का भी जीता-जागता चित्र प्रस्तुत करती है। इस पूरी प्रक्रिया में चंदन और शोएब के गहन मानवीय रिश्ते (दोस्ती) को फिल्म इस तरह सामने लाती है कि दर्शक के मन में इंसानी भाव भीतर तक भर जाता है। चंदन का शोएब की बाहों में दम तोड़ने का दृश्य, चंदन मर रहा है या शोएब, इसके बीच के अंतर को मिटा देता है।

ऑफिस की दीवारों में बंद अदृश्य सांप्रदायिकता

शोएब पुलिस भर्ती में असफल घोषित होने के बाद एक प्राइवेट फर्म में चपरासी का काम करता है। वहां अपनी योग्यता साबित करके सेल्समैन बन जाता है। उसकी जिंदगी उड़ान लेने की ओर बढ़ती है, सपने पूरा होने की ओर बढ़ते हैं। पर एक दिन जब उसी फर्म के लोग भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच देखने के लिए एक जगह जुटते हैं, पार्टी करते हैं। शोएब मैच के दौरान भारतीय टीम के सपोर्ट में सहज ही उत्साहित हो रहा है, तालियां बजा रहा है, लेकिन उसके ऑफिस के वरिष्ठ सहकर्मी भारत की जीत के उल्लास और विजयी भाव को जाहिर करने के लिए अकारण शोएब को धर्म के आधार पर निशाना बनाते हैं, उसे पाकिस्तानी टीम का समर्थक घोषित करते हैं, उसके खान-पान की खिल्ली उड़ाते हैं। उसकी मां के बनाए मूंग के हलवे को धर्म से जोड़कर गंदे इशारे करते हैं। स्थिति शोएब के लिए असहनीय हो जाती है और वह नौकरी छोड़ देता है। हालांकि यह ऑफिस में पहली घटना नहीं थी, लेकिन धर्म-पहचान आधारित छोटे-छोटे अपमानों को वह टालता रहता था। लेकिन किसी भी व्यक्ति की अपमान सहने की कोई न कोई तो सीमा होती ही है, उस दिन शोएब के लिए वह हद पार हो जाती है। ऐसा नहीं कि उस ऑफिस में कुछ एक अच्छे हिंदू नहीं है, हैं। लेकिन बहुत ही कम। उनकी आवाज उतनी मुखर नहीं है, जितनी धर्म-पहचान के आधार अपमानित करने वालों की।

ऐसा नहीं है कि इस फिल्म में सिर्फ त्रासदी ही त्रासदी है, खुशियों के पल नही हैं, प्यार के पल नहीं हैं, जीवन कभी ऐसा नहीं होता है। हर स्थिति में इंसान खुश होने का रास्ता ढूंढ़ ही लेता है, अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश तो करता ही है। पढ़ाई और पुलिस भर्ती की तैयारी के दौरान चंदन-शोएब पूरी उम्मीद से भरे हैं, उन्हें अपनी मेहनत और तैयारी पर भरोसा है कि वे पुलिस में भर्ती जरूर हो जाएंगे। इस पढ़ाई, तैयारी और सपने देखने के दौरान वे खुशियों से उछलते हैं, कुलाचें भरते हैं। परिवार की गरीबी दूर हो जाएगी, घर बना जाएगा, पिता का आपरेशन हो जाएगा, पुलिस में भर्ती होते ही चंदन वाल्मीकि होने और शोएब मलिक होने के अपमान से छुटी मिल जाएगी। बस कुछ दिनों की बात है। यह सब सोचकर उनके दिल उमंग-उत्साह से भरे हुए हैं। बुरे दिन कुछ दिनों की बात है, यह उन्हें गहरी दिलासा दिलाता है।

इस सपने के टूटने के बाद अपनी नियति मान जब वे गुजरात में मजदूरी करने लगते हैं, जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ती है, पैसे घर भेजने लगते हैं। चंदन के घर के निर्माण का काम शुरू हो जाता है। पूरा घर खुश है। शोएब भी पैसा जुटाकर और कर्ज लेकर पिता के आपरेशन के पैसे जुटाता है, आपरेशन हो जाता है। खुशी का एक नया दौर आता है। सभी युवा मजदूर गुजरात में अभावों के बीच भी मौज-मस्ती का कोई न कोई रास्ता निकाल लेते हैं। वह शोएब के घर से आए अचार की छीना-छपटी ही क्यों न हो।

मोहब्बत, मज़दूरी और टूटते सपनों की दास्तान

फिल्म में एक नायिका भी है, यदि उसे नायिका कहना चाहें। सुधा भारती नाम है। चंदन वाल्मीकि और उसके बीच प्यार की एक डोर बंधी हैं। चंदन की जिंदगी में सुधा का प्यार उमस भरी गर्मी में एक ठंडी बहार के जैसी है, लेकिन चंदन की जिंदगी और सुधा की जिंदगी में बंबइया फिल्मों के प्रेमी जोड़े की तरह सिर्फ उछल-कूद, आह-उह, देवदास-पारो की तरह गम में डूबे रहने का वक्त नहीं हैं। परिवार, मां-बाप-बहन की रोटी, आवास और एक सम्मानजनक रोजगार माउंट एवरेस्ट की तरह सामने खड़ा है, जिसकी चढ़ाई की कोशिश में ही सारा दम निकल जाता है। यहां तक की मौत भी हो जाती है। फिल्म यहां थोड़ी कमजोर दिखी, सुधा के जीवन और जीवन-संघर्षों को दिखाने के लिए फिल्म में कोई स्पेस नहीं है। ऐसा लगता है कि सुधा को सिर्फ चंदन के चरित्र को उभारने के लिए लाया गया है। जबकि सुधा के माध्यम से जातीय-धार्मिक पहचान की कीमत क्या चुकानी पड़ती है, उसके साथ लैंगिक पहचान की कीमत क्या चुकानी पड़ती है, उसे भी सामने लाया जा सकता था। खैर जो नहीं है, वह नहीं है। सुधा को अंत में चंदन की लाश ही देखने को मिलती है।

कला की दृष्टि से इस फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि व्यक्तियों के नायकत्व और खलनायकत्व की जगह उस समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और उससे बनने वाले पूरी की पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया गया है। फिल्म में व्यक्ति केवल उस व्यवस्था के प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं। चंदन वाल्मीकि और शोएब मलिक कुछ एक व्यक्तियों की अपराधिक मानसिकता के शिकार नहीं है, बल्कि पूरी की पूरी समाज व्यवस्था उनके प्रति आपराधिक है। कुछ व्यक्ति यदि अपराधी हों तो उनको ठीक किया जा सकता है, दंडित किया जा सकता है। लेकिन जहां पूरी की पूरी समाज व्यवस्था ही आपराधिक हो, वहां तो व्यक्तियों को नहीं, व्यवस्था को बदलने का कार्यभार सामने आ जाता है। इस फिल्म की एक यह बड़ी खूबी है। फिल्म देखते समय आपको कुछ व्यक्तियों से नहीं, उस पूरी व्यवस्था से नफरत होती है, जो वर्ण-जाति-वर्ग या धार्मिक पहचान के आधार पर सोचती है और व्यवहार करती हैं तथा जहां किसी व्यक्ति की नियति उसकी वर्ण-जाति-वर्ग और धार्मिक पहचान से निर्धारित होती है। फिल्म व्यक्ति और समाज के द्वंद्वात्मक रिश्ते के इस नाजुक संतुलन को कायम रखने में फिल्म कामयाब रही है।

रोजमर्रा के अपमानों का समकालीन भारतीय महाकाव्य

इस फिल्म की दूसरी कलात्मक खूबी यह है कि चंदन-शोएब जैसे लोगों के जीवन-यथार्थ को किसी अति पर ले जाकर अवास्तविक नहीं बनाती है। दलित-मुस्लिम उत्पीड़न को दिखाने के लिए किसी कभी-कभी दिल दहला देने वाली घटनाओं को विषय नहीं बनाती, जिसके बारे में कहा जा सके कि यह तो कभी-कभार होता है या कुछ एक के साथ होता है। वह भारतीय समाज के रोजमर्रा के जीवन में सहज-स्वाभविक तरीके से दलितों-मुसलमानों के साथ घटित होने वाले यथार्थ को अपना विषय बनाती है, जो रोज-बरोज बहुसख्यक दलितों-मुसमलानों के साथ हो रहा है। जो सहज व स्वाभाविक बहुतों के लिए बन चुका है। लेकिन यह सहज-स्वाभविक अपराध जिनके साथ घटते हैं, उनके लिए किस कदर भयावह होते हैं, कितना जानलेवा होता हैं, फिल्म उसे सामने लाती है। जो किसी के लिए सहज-सामान्य व्यवहार है, वह किसी के लिए कितना यातनादायी है, इसकी ओर ध्यान दिलाती है।

फिल्म में यदि जाह्नवी कपूर को छोड़ दिया जाए तो किसी स्टार-सुपरस्टार को नहीं लिया गया है। फिल्म में जाह्नवी की भूमिका बहुत छोटी है, उनका स्टारडम हावी नहीं होने पाया है। ईशान खट्टर (शोएब मलिक) और विशाल जेठवा (चंदन वाल्मीकि) का अभिनेता रूप फिल्म के चरित्रों पर हावी नहीं होता। अभिनेता और चरित्र पूरी तरह एकाकार हैं। चरित्रों पर अभिनेता हावी नहीं हैं।

फिल्म में एक अन्य रेखांकित करने लायक चीज यह है कि यह बड़े-बड़े विमर्शों की फिल्म नहीं है। हिंदी में कई चर्चित विमर्श आधारित कलात्मक फिल्में भी बनी हैं, जिसके लिए नसीरूद्दीन शाह, ओमपुरी, अनुपम खेर आदि जाने जाते रहे हैं। विमर्श आधारित फिल्में बौद्धिक वर्ग के एक हिस्से तक तो अपना प्रयोजन संप्रेषित कर पाती हैं, लेकिन आम आदमी उससे जुड़ नहीं पाता। यह फिल्म सामान्य जिंदगी की कहानी को बिलकुल सामान्य तरीके से प्रस्तुत करती है, बिना किसी विशेष ताम-झाम या अबूझ संकेतों के। चंदन या शोएब की जिंदगी वाल्मिकी समाज या व्यापक अर्थों में दलित समाज और शोएब की जिंदगी मुस्लिम समाज के निम्म मध्यवर्गीय युवाओं की सपनों-संघर्षों की जिंदगी है। ऐसे एक दो नहीं, करोड़ों युवा और उनके संघर्ष आसानी से देखे जा सकते हैं।

निर्देशक नीरज घायवान ने भारतीय समाज में जाति, धर्म और वर्ग के बीच के रिश्ते कैसे घुले-मिले हैं, कैसे आपस में गुथे हुए हैं, कैसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की जिंदगी की दिशा और नियति तय करते हैं, इसको पकड़ने और प्रस्तुत करने में कामयाबी हासिल की है।

नीरज घायवन की यह हिंदी फ़िल्म ‘होमबाउंड’ ऑस्कर, 2026 (98वें अकादमी पुरस्कार) में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फ़िल्म श्रेणी के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि चुनी गई है। इसे ऑस्कर मिले। इससे न केवल निर्देशक और फिल्म यूनिट के लिए, सिनेमा जगत के लिए और देश के लिए भी अच्छी बात होगी। उससे अच्छी बात यह होगी, शायद इस बहाने इस देश के हाशिए पर फेंक दिए गए दलित-मुस्लिम और मेहनतकश लोग और उनकी स्थिति लोगों की आंखों के सामने आए, उनके दिलों में उतरे।

spot_img

Related articles

The Murshidabad Files: Why Thousands of Valid Voters Are Now ‘Deleted’

Murshidabad: The publication of supplementary voter lists under the Special Intensive Revision (SIR) has triggered widespread alarm across...

Milord, Bengal’s Real Polarisation Is People vs Commission

The Chief Justice of India slams Bengal's "polarisation" as Malda unrest grows. Is the real divide between the people and the Election Commission over AI-driven voter list deletions and SIR?

“First the Voter, Then the Vote”: Malda Protests Intensify, AIMIM Leader Arrested

Following the arrest of AIMIM leader Mofakkerul Islam, Malda is gripped by intense unrest over massive voter list deletions, highway blockades, and a large-scale police crackdown involving dozens of recent apprehensions.

এসআইআর-এর কোপে কি তবে বৈধ ভোটাররা? সরকারি কর্মী থেকে সফটওয়্যার ইঞ্জিনিয়ার, বাদ পড়ছেন সবাই

বাংলার ভোটার তালিকা সংশোধনে নজিরবিহীন বিভ্রান্তি! গেজেটেড অফিসার থেকে সফটওয়্যার ইঞ্জিনিয়ার—পাসপোর্ট ও বৈধ নথিপত্র থাকা সত্ত্বেও বাদ পড়ছেন হাজারো নাগরিক। এআই-এর ভুল নাকি পরিকল্পিত বঞ্চনা? নাগরিক অধিকার ও ভোটাধিকার নিয়ে উঠছে গুরুতর প্রশ্ন