From Pagan Goddess to Chocolate Bunny: The Curious History of Easter

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[dropcap]I[/dropcap]f Jesus Christ died so painfully on the Cross on this Friday, why do we call it ‘Good Friday’? Actually, the term ‘good’ came from ‘God’s Friday’ or from an archaic translation of the term ‘Holy’ or ‘Pious’. Germans call it Karfreitag or ‘Sorrowful Friday’.

This celebration begins the ‘Easter’ weekend and Christians believe that on Easter Sunday Jesus arose from his dead state and began his journey to heaven.

Initially, they were both linked to Spring Equinox on the 21st-22nd of March, but after Roman Emperor Constantine of Byzantium (present-day Istanbul) recognised Christianity in 313 AD, the Church re-examined the volumes of myths and legends. It then decided that Jesus had died in 33 AD, on the 3rd of April.

As a festival, however, Easter goes back well before Christ arrived and the pre-Christian masses originally celebrated it in honour of a pagan goddess called Eostre or Ostara or even Astare. She was worshipped in Spring as the dead winter found fresh life through her.

The Easter Bunny is also older than Christianity because it was the companion or vahana of the goddess, called the Moon-hare and scholars like Homer Smith claim that this Christian festival was called ‘Easter’ only in the late Middle Ages. The Irish differed from the Roman Church and observed Easter on a date linked to the pagan goddess Eostre before the Christian Church imposed the Roman calendar in 623 AD. 

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Eggs were always taken as symbols of rebirth, which is why Easter eggs were usually coloured red, especially in Eastern Europe, to symbolise the blood of Christ. The Russians used to place red Easter eggs on graves to serve as ‘resurrection charms’ and though the Czechs honoured Christ on Easter Sunday, his pagan rival was recalled on Easter Monday. This was the ‘Moon-day’ as opposed to the Sun-day. The older traditions used dyed chicken eggs, but now substitutes have come in chocolate, or plastic eggs filled with candy such as jellybeans.

In Poland and in the Slavic traditions of Eastern Europe, the old tradition of hand-painting eggs called Pisanka is still practised. In Bulgaria, traditional egg fights are a rage and the winning egg is titled as the Boark, the fighter. Germans and Swiss hang decorated eggs from branches or bushes and even on the top of wells that are all dressed up for Easter as Osterbrunnen. The celebrated House of Faberge created exquisite jewelled eggs for the Russian Imperial Court that took this humble folk art to new heights.

if Jesus Christ died so painfully on Cross on this Friday, why do we call it 'Good Friday'? Actually, term 'good' came from ‘God's Friday’

Like the celebration of Christmas, many such traditions of Easter were altered, censored and banned during the Protestant Reformation. Modern Easter is a thriving industry that runs on Easter eggs, bunnies and baskets of condiments, chocolate eggs, jelly beans and marshmallow chicks. The Easter Bunny has become a popular legendary Easter gift-giving character, somewhat like Santa Claus.

Easter is, however, not just food and fun, for it is also associated with the painful emulation of bodily tortures that were heaped upon Christ, called ‘The Passion’. Filipinos and Mexicans go through Christ’s last journey dragging heavy crosses on their shoulders and they whip themselves till they bleed. Some also pierce their heads with crowns of prickly thorns. This self-hurt reminds us of the rites of Muharram or Baan-phors in Bengal or the Tai Pusam in Tamil Nadu and of Charak.

Easter reminded people in ancient and medieval Europe, who hardly ever bathed in winter, that it was time for a bath. In Hungary and some neighbouring countries, there was a custom of pouring buckets of cold water on shivering humans in the name of Easter. Men often wooed women with perfumes or scented water during this season.

 

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Ladakh Fights for Future: Hunger Strike Highlights Ecological Concerns

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Sonam Wangchuk, a resident of Ladakh who inspired the Bollywood blockbuster “3 Idiots,” went on a 21-day hunger strike demanding statehood for Ladakh and to protect its fragile ecology. However, despite his efforts and those of the Ladakhi people, the Indian government has not yet addressed their concerns. Watch our video story on his fast, the support he received, and his future plans.

भाजपा के लिए राजस्थान में 2019 जैसी सफलता पाना आसान नहीं, 10 सीटों पे ख़ासी दिक्कत

[dropcap]रा[/dropcap]जस्थान में दो चरण में लोकसभा चुनाव होंगे। पहले चरण में चुनाव 19 अप्रैल को 12 सीटों  बीकानेर गंगानगर चूरू झुंझुनू सीकर नागौर जयपुर ग्रामीण जयपुर शहरी अलवर भरतपुर करौली-धौलपुर और दौसा  में होंगे।

2023 में हुए विधानसभा के चुनावों के परिणामों और वर्तमान स्थितियों की समीक्षा में सामने आते समीकरण से तस्वीर कुछ साफ हो जाती है। भारतीय जनता पार्टी अबकी बार कितनी सीटें जीत सकती है या उसके तिलिस्म के टूट जाने के संकेत धरातल पर दिखाई देंगे। 2019 में भाजपा ने यहाँ से सभी 25 सीटें जीती थी, उस वक़्त राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, और इस बार भाजपा की। हालांकि 2023 में अशोक गेहलोत की सरकार गिर गयी पर दोनों पार्टियों में मतों का ज्यादा अंतर नहीं रहा, इसी से ये अनुमान लगाया जा रहा के भाजपा के लिए पाँच साल पहली वाली सफलता दुहराना आसान नहीं होगा। जमीनी हालात भी कुछ वैसे ही हाल बता रहे हैं।

दौसा की लोकसभा सीट के अंतर्गत 8 विधानसभा आती हैं। बस्सी, चाकसू, थानागाजी, बांदीकुई, महोबा, सिकराय, दौसा और लालसोट। भाजपा के यहाँ से 5 विधायक 2023 में जीते हैं। कांग्रेस के 3 विधायक हैं। 2019  में पुलवामा लहर के चलते इस सीट पर भाजपा की जसकौर मीणा ने 548733 वोट हासिल किये जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार सविता मीणा ने 470289 वोट पाए थे।

पूर्वी राजस्थान की सबसे चर्चित सीट दौसा में अब भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ने लगी हैं, दौसा से भाजपा ने कन्हैया लाल मीणा को प्रत्याशी बनाया है, निवर्तमान संसद जसकौर मीणा का टिकट काट दिया गया। वहीँ किरोड़ी लाल मीणा इस टिकट को ले कर खासे नाराज़  हैं कियुँकि वो अपने भाई जगमोहन मीणा को टिकट दिलवाने के लिए प्रयासरत थे। दौसा से पहले सचिन पायलट सांसद रह चुके हैं कांग्रेस ने पूर्व मंत्री वर्तमान विधायक मुरारी लाल मीणा को चुनाव में उतारा है।

भरतपुर की सीट में जिले की 7 विधानसभा व एक विधानसभा अलवर जिले की आती है। कमान नगर, डीग-कुम्हेर, भरतपुर, नदबई, वियर, बयाना, थानागाजी हैं। भाजपा का गढ़ में यहाँ 5 विधायक भाजपा के व एक-एक रालोद, कांग्रेस और निर्दलीय है। भरतपुर अनुसूचित जाती के लिए आरक्षित सीट है। भरतपुर की सीट पर कोई भी पार्टी अभी तक हैट्रिक नहीं लगा पाई ये तासीर यहाँ के मतदाताओं की है।

भाजपा ने यहाँ अपना प्रत्याशी फिर से बदल दिया है। अबकी बार रामस्वरूप कोली को यहाँ से प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने संजना जाटव पर भरोसा जताया है। बसपा ने इंजीनियर अंजिला शकरावल को अपना उमीदवार बनाया है। 2019 में रंजीता कोली ने एक बड़ी जीत यहाँ से प्राप्त की थी। पुलवाना की लहर में 707992 वोट बटोरने में सफल रही थी। कांग्रेस के अभिजीत कुमार जाटव को 389593 को वोट मिले थे। स्थानीय समीकरण और जनता जनार्दन अबके किस तरह से व्यवहार करेंगे चुनाव के अंतिम दिनों तक साफ हो जायेगा।

करौली धौलपुर की सीट का अधिकतर हिस्सा मध्यप्रदेश और उतर प्रदेश के साथ लगता हुआ है। 2008 में पुन परिसीमन के बाद यह लोकसभा क्षेत्र आरक्षित हो गयी थी। बसेरी बरी धौलपुर राजाखेड़ा टोडाभीम हिण्डोन करौली सपोटरा विधान सभा क्षेत्र इस लोकसभा में हैं।

वर्तमान में यहाँ से कांग्रेस के 5 विधायक भाजपा से 2 और बसपा से एक विधायक हैं।

करौली-धौलपुर लोकसभा सीट के लिए भाजपा ने प्रत्याशी इंदु देवी जाटव को प्रत्याशी घोषित किया है, कांग्रेस प्रत्याशी भजनलाल जाटव और बसपा प्रत्याशी विक्रम सिंह हैं। अधिकतर मतदाता लगभग 82% ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं। यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ कहा जाता है। अनुसूचित जाती के यहाँ करीब 22.5% मतदाता है और अनुसूचित जनजाति के 14.6% और मुस्लिम समुदाय के 4% मतदाता हैं। 2019 की लहर में यहाँ से मनोज रजोरिया ने 526443 वोट प्राप्त किए थे। कांग्रेस के संजय जाटव ने 428761 मत हासिल किये थे। 2023  की विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को यहां 7 विधानसभा में 589040 मत मिले थे जबकि मुख्य विपक्षी भाजपा को 7 विधानसभा में 534199 मत मिले थे। बसपा को यहाँ 2 विधानसभा में 153935 मत प्राप्त हुए थे। यहाँ मुकाबला काफी रोचक होगा। स्थानीय समीकरण यहां बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं। कौन कितने रूठे हुए को मना पाता यही सफलता का सूत्र होगा।

अलवर की सीट हॉट सीट की श्रेणी में आ गई है। राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 में यहाँ से 5 सीट कांग्रेस जीती हैं। यहाँ से संसद महंत बालक नाथ को भाजपा ने विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाया था और वो विधायक का चुनाव हार गए। भाजपा को 8 विधानसभा वाली इस लोकसभा सीट में केवल 2 सीटों पर ही जीत 2023 के विधानसभा चुनावों में मिल पाई थी। तिजारा किशनगढ़ बॉस मुंडावर बहरोड़ अलवर ग्रामीण अलवर शहरी रामगढ़ राजगढ़ लक्ष्मणगढ़ सीट अलवर लोकसभा में हैं।

जातीय समीकरण में यादव यहाँ 13.63%, अनुसूचित जाति 17.8%, अनुसूचित जनजाति 5.9%, ब्राह्मण 11.21%, मुस्लिम 18.6%, जाट 8.13%, माली 5.06%, सिख 2.3%, गुज्जर 3.8% हैं।

भाजपा ने यहां से महंत बालकनाथ को बदल कर भूपेंदर याहव को टिकट दिया है। भूपेंदर यादव  के बारे में पहले हरियाणा से चुनाव में उतरने की अटकलें लगाई जा रही थी। पिछली बार महंत बालक नाथ ने एक बड़े अंतर् से यहाँ जीत हासिल की थी। कांग्रेस ने मुंडावर विधायक ललित यादव को मैदान में उतारा है, जबकि बीएसपी से फजल हुसैन पर दांव खेला है।

जयपुर ग्रामीण कोटपूतली विराटनगर शाहपुरा फुलेरा आम्बेर झोटवाड़ा जामवा-रामगढ़ बानसूर की विधानसभाओं का क्षेत्र है। कांग्रेस ने यहाँ से 2023 के विधानसभा चुनाव में 3 सीटों पर जीत पाई और भाजपा 5 सीटों पे जीती है। भाजपा को 7 विधान सभा में 645705 वोट प्राप्त हुए थे जबकि कांग्रेस को 637658 मत मिले। एक निर्दलीय को लगभग 59124 व एक प्रत्याशी आसपा (कांशीराम ) को 54185 मत मिले। 2014 और 2019 राज्यवर्धन सिंह राठौर यहाँ से विजयी रहे थे जिन्हें विधानसभा चुनाव के दौरान विधायक के चुनाव के लिए उतर दिया गया था। भाजपा ने अब यहाँ से राव राजेंद्र सिंह को चुनाव में उतरा है कांग्रेस ने अनिल चोपड़ा को अपना प्रत्याशी बनाया है। कोटपूतली विराटनगर शाहपुरा फुलेरा बानसूर के समीकरण इस सीट को बहुत प्रभावित करने वाले हैं जहाँ से स्थानीय मतदाताओं में एक हलचल भीतर ही भीतर चल रही है। यह सीट भाजपा के लिए सरल नहीं रह गई है।

जयपुर शहरी सीट एक तरह से भाजपा का गढ़ माना जाता है। 2023 के विधानसभा चुनाव में विधान सभा की 6 सीट यहाँ भाजपा क खाते में हैं जबकि कांग्रेस को यहाँ 2 सीट ही मिल पाई। हवा महल विद्याधर नगर सिविल लाइन्स किशन पोल मालवीय नगर आदर्श नगर सांगानेर बांगरू की सीटों की यह लोकसभा शहरी मतदाताओं की मानी जाती है। भाजपा ने यहाँ भी निवर्तमान सांसद का टिकट काट कर नए प्रत्याशी मंजू शर्मा को चुनाव में उतारा है, कांग्रेस ने अब टिकट बदल कर प्रताप सिंह खाचरियावास को अपना प्रत्याशी बनाया है। मंजू शर्मा भाजपा  के कद्दावर नेता कई बार के विधायक भंवर लाल शर्मा की बेटी है। कहा जा रहा है के नरेंद्र मोदी की पसंद के कारण मंजू शर्मा को दो बार के सांसद रामचरण बोहरा की जगह टिकट दिया गया है।

वहीँ कांग्रेस को भी अपना प्रत्याशी जयपुर डायलॉग से जुड़े विवादित सुनील शर्मा को बदलना पड़ा है। प्रतापसिंह खाचरियावास को मैदान में उतरा गया है जो भैरों सिंह शेखावत के भतीजे हैं। अबकी बार जयपुर सीट एक तरफा नहीं रहेगी यहाँ भाजपा को काफी मशक्क्त करनी पड़ेगी।

लोकसभा के चुनाव में राजस्थान में गहमागहमी काफी तेजी से बढ़ेगी जिसमे भाजपा की बड़ी रैलियों चुनावों को किस तरह प्रभावित करेंगी ये देखना रोचक होगा। भाजपा के 400 पार के नारे को राजस्थान कितना बल दे पायेगा ये पहले चरण के चुनाव में स्पष्ट होने लगेगा। वर्तमान परिस्थितियों में जो संकेत धरातल से उभर रहे हैं उनमे भाजपा के लिए राजस्थान में लगभग 10 सीटें फंसी हुयी लगने लगी है जिनपे गंभीर चुनौतियों का सामना अबकी बार पार्टी को करना पड़ेगा।

99 টাকা কি আপনার জীবন পরিবর্তন করতে পারে? জেনে নিন সুলতান কুর্তার উত্থান সম্পর্কে

কলকাতা: তারা বলে যে একটি সিংহ চূড়ান্ত লাফ দেওয়ার আগে একধাপ পিছিয়ে যায়। এটির মতোই, 2000 সালের প্রথম দিকে এই যুবক তার স্টক এবং দোকান থাকা সত্ত্বেও তার ব্যবসা বিক্রয় শুরু না করা বেছে নিয়েছিল। সঠিক কৌশল নিয়ে সঠিক সময়ে আঘাত করা বেছে নেন তিনি।

রমজান আসার সাথে সাথে, 2001 সালে, তিনি একটি অবিশ্বাস্য অফার সহ বিজ্ঞাপন এবং ব্যানার স্থাপন করেছিলেন – কুর্তা মাত্র 99 এবং তাও এক বছরের গ্যারান্টি সহ। একটি লোভনীয় চুক্তি যা অনেকেই মিস করতে চাইবেন না। অনন্য বিপণন কৌশলটি পুরুষদের জন্য এখন-প্রসিদ্ধ-জাতিগত ব্র্যান্ডকে সেই ধাক্কা দিয়েছে যা এর প্রতিষ্ঠাতা প্রত্যাশিত ছিল – একটি রেকর্ড-ব্রেকিং বিক্রয় যা দেখেছিল ক্রেতারা 99 টাকায় কুর্তা কিনতে সারিবদ্ধ। এক ঘন্টার মধ্যে স্টক শেষ হয়ে গেল। জনতা তার কুর্তা ধরার জন্য উন্মাদনায় চলে যায়, চশমা ভেঙে যায়, নিয়ন্ত্রণ করতে পুলিশকে ডাকতে হয় এবং তারপরে তারা যেমন বলে – বাকিটা ইতিহাস।

এর পেছনের মানুষটি ছিলেন সুলতান – দ্য কিং অফ কুর্তাসের ব্যবস্থাপনা পরিচালক আরশাদ শামীম। এমন একটি পরিবারে জন্মগ্রহণ করা যা জাতিগত পোশাক, বিশেষ করে মহিলাদের জন্য, কলকাতার জাতিগত পোশাক প্রস্তুতকারকদের কেন্দ্রস্থল চিত্তপুরের বাইরেও বেড়ে উঠতে চেয়েছিল।

সেন্ট জেভিয়ার্স কলেজ থেকে এই কমার্স গ্র্যাজুয়েটের যাত্রা জাদুকর ছাড়া আর কিছুই নয়। যাইহোক, জাদু সহজ নয়। ফলাফল অর্জনের জন্য এটি অনেক ধৈর্য, ​​অধ্যবসায় এবং কৌশল গ্রহণ করেছে। আর, শামীম ঠিক সেটাই পারদর্শী।

“আমি সবসময় একজন ব্যবসায়ী হতে চেয়েছিলাম। পোশাক শিল্প আমার কাছে আবেদন করেছিল কারণ এটি আমার পারিবারিক ব্যবসা ছিল। কিন্তু আমি মহিলাদের জাতিগত পরিধান শিল্পে উদ্যোগী হতে চাইনি। পুরুষদের জাতিগত পোশাক ছিল যেখানে আমি একটি চিহ্ন তৈরি করতে চেয়েছিলাম। সুতরাং, আমার লক্ষ্য নির্ধারণ করা হয়েছিল। এবং সুলতান কুর্তা চালু করার জন্য আমি যে কৌশলটি বেছে নিয়েছিলাম তা আমার ব্যবসাকে সঠিক ধাক্কা দিয়েছে,” শামীম স্মরণ করিয়ে দেয়।

“মাত্র পাঁচ লাখ টাকার পুঁজি নিয়ে, তিনি জাতিগত পোশাক শিল্পে বিনিয়োগ করতে বেছে নিয়েছিলেন। আমরা 2001 সালে খুব ছোট থেকে শুরু করেছিলাম। এবং লকডাউন না হওয়া পর্যন্ত, আমাকে জাকারিয়া স্ট্রিটে (রবীন্দ্র সরণি) আমাদের দোকানের বাইরে সুলতান কুর্তার জন্য বাজপাখি করতে দেখা যেত। আমার কাজ ছিল সর্বাধিক গ্রাহকদের কাছে পৌঁছানো এবং কলকাতার রাস্তায় আমার পণ্য বিক্রি করতে আমার কোন দ্বিধা ছিল না,” তিনি বলেছেন।

তিনি কি কখনও ভেবেছিলেন যে সুলতান মান্যভারের সাথে প্রতিদ্বন্দ্বিতা করতে পারে?

“আচ্ছা, মান্যবর এবং সুলতানের মক্কেল আলাদা। তারা ধনীদের চাহিদা পূরণ করে এবং আমরা মধ্যবিত্তের চাহিদা পূরণ করি। সুতরাং, আমরা খুব বেশি প্রতিযোগিতার মুখোমুখি হইনি। মান্যভার যেখান থেকে দামের পরিসর শুরু করে তা হল আমাদের অফারে থাকা সবচেয়ে দামি পোশাকের দাম,” এমডি একটি সৎ উত্তর দিয়েছেন।

তিনি যোগ করেন, “দেখুন, আমাদের একটি দৃষ্টিভঙ্গি আছে – সাশ্রয়ী মূল্যে সেরা মানের পোশাক অফার করুন। এবং এটি আমাদের ব্র্যান্ডের জন্য একটি চিহ্ন তৈরি করতে সক্ষম হয়েছে।”

এছাড়াও, দুই দশক পরে যখন এই ব্যবসা শুধু বাংলায় নয়, ভারত জুড়ে এমনকি সীমানা ছাড়িয়েও বিস্তৃত হয়েছে।

“যতদূর কুর্তা উৎপাদনের বিষয়ে, সুলতান ভারতীয় উপমহাদেশের বৃহত্তম কুর্তা উৎপাদনকারী,” তিনি গর্ব করে উল্লেখ করেছেন।

কুর্তা বেছে নেওয়ার কোনো নির্দিষ্ট কারণ? “আমার শেরওয়ানি এবং কুর্তা পছন্দ আছে। এবং তারা বেশ ব্যয়বহুল. আমি জানতাম যে এটির জন্য একটি বাজার ছিল এবং যা করা দরকার তা হল তাদের সাশ্রয়ী মূল্যের করা। এবং আমি ঠিক তাই করেছি।”

“বাংলা সংস্কৃতিগতভাবে সমৃদ্ধ এবং এখানকার পুরুষরা ধর্ম নির্বিশেষে কুর্তা পরতে পছন্দ করে। এবং এটি জাতিগত পোশাকের প্রতি ভালবাসা এবং অর্থের মূল্য যা সুলতানকে কুর্তাদের রাজা করে তোলে। তাই, আমাকে খুব স্পষ্ট করে বলতে দিন, শুধু রমজানেই নয়, পূজার সময়ও আমাদের বিক্রি বেশি হয়,” শামীম উল্লেখ করেন।

ব্র্যান্ডটি বাড়ার সাথে সাথে, সুলতান শেরওয়ানি এবং অন্যান্য চারটি আইটেম একসাথে মাত্র 863 টাকায় বিক্রি করতে শুরু করে। এটি ছিল কুর্তা রাজার 99 টাকার কুর্তা অফার পরে আরেকটি হট কেক।

সুলতানের সাফল্যও এর আকর্ষণীয় এবং ম্যাভেরিক বিজ্ঞাপনের মধ্যে নিহিত, যা জাভিয়েরিয়ান নিজেই ধারণা করেছিলেন।

সুলতান কুর্তা আরশাদ শামীম নৃতাত্ত্বিক পোশাকের ফ্যাশন

শামীমের শক্তি এই সত্যে নিহিত যে সাফল্যের স্বাদ নেওয়ার পরেও, তিনি আজও স্থির থেকেছেন এবং কঠোর পরিশ্রম করছেন। তিনি একটি মার্সিডিজ বেঞ্জ গাড়ি কেনার পরপরই একটি ঘটনা স্মরণ করেন।

“একবার আমি জাকারিয়া স্ট্রিটে আমাদের পুরানো দোকানের কাছে হাকিং করছিলাম যখন আমি দেখলাম একজন লোক আমাকে দূর থেকে পর্যবেক্ষণ করছে। আমি প্রথমে তাকে চোর হিসেবে নিয়েছিলাম এবং আমার মালামাল বিক্রি করার সময় তার দিকে নজর রাখতাম। কয়েক ঘন্টা পরে, লোকটি আমার কাছে এসে জিজ্ঞেস করলো আমার কোন ভাই আছে, যে মার্সিডিজ চালাতো। আমি এই বলে তাকে হতবাক করেছিলাম যে উভয় মানুষই একই, এবং আমিই যে দামি গাড়ি চালাই।”

আজ কলকাতা জুড়ে সুলতানের অন্তত চৌদ্দটি শোরুম রয়েছে। তবুও, এটি শামীমকে বিরতি দেয় না। এমনকি আজ অবধি, প্রধান লেনদেন, আলোচনা এবং পণ্য হ্যান্ডলিং তার দ্বারা করা হয়।

এই নম্রতার অনুভূতি এখনও সেই ব্যক্তির মধ্যে বিদ্যমান, যিনি এমন একটি ব্র্যান্ড তৈরি করেছিলেন যে এই আড়াই দশকে পুরুষদের জন্য জাতিগত পোশাকের ক্ষেত্রে গণনা করার মতো একটি নাম হয়ে উঠেছে। রমজান মাসে, তিনি তার অফিস প্রাঙ্গণে তার সহকর্মীদের সাথে তার রোজা ভাঙ্গেন। তিনি তার সাথে বসা লোকদের টিফিন দিতে ভোলেন না।

52 বছর বয়সী এই ব্যক্তি যিনি জীবনের বিভিন্ন শেড প্রত্যক্ষ করেছেন, যোগ করেছেন, “আমি আরও তিন বছর ব্যবসা দেখব, তারপরে, আমি সমাজকে ফিরিয়ে দিতে চাই। আমি শিক্ষা খাতে কাজ করব এবং নিশ্চিত করব যে আমি যেখানে থাকি, সেই এলাকায় কোনও শিশু না খেয়ে না ঘুমায়।”

 

এটি ইংরেজিতে প্রকাশিত প্রতিবেদনের একটি অনুবাদ

क्या 99 रुपये आपकी जिंदगी बदल सकते हैं? जाने सुल्तान कुर्ता के उदय के बारे में

कोलकाता: कहते हैं कि शेर आखिरी छलांग लगाने से पहले एक कदम पीछे हटता है. इसके समान ही, 2000 की शुरुआत में इस युवा ने अपना स्टॉक और दुकान होने के बावजूद अपने व्यवसाय की बिक्री शुरू नहीं करने का फैसला किया। उन्होंने सही समय पर सही रणनीति के साथ काम करना तय किया।

जैसे ही 2001 में रमज़ान आया, उसने एक अविश्वसनीय ऑफर के साथ विज्ञापन और बैनर लगाए – केवल 99 में कुर्ते और वह भी एक साल की गारंटी के साथ। एक आकर्षक सौदा जिसे बहुत से लोग छोड़ना नहीं चाहेंगे। अद्वितीय विपणन रणनीति ने पुरुषों के लिए अब प्रसिद्ध-जातीय ब्रांड को वह धक्का दिया जिसकी उसके संस्थापक को उम्मीद थी – एक रिकॉर्ड-तोड़ बिक्री जिसमें खरीदारों को 99 रुपये में कुर्ता खरीदने के लिए कतार में खड़ा देखा गया। एक घंटे के भीतर स्टॉक खत्म हो गया। भीड़ अपने कुर्ते को पकड़ने के लिए उग्र हो गई, शीशे टूट गए, नियंत्रण के लिए पुलिस बुलानी पड़ी और फिर जैसा कि कहा जाता है – बाकी इतिहास है।

इसके पीछे का व्यक्ति सुल्तान – द किंग ऑफ कुर्तास का प्रबंध निदेशक अरशद शमीम था। ऐसे परिवार में जन्मे, जो विशेष रूप से महिलाओं के लिए परिधानों का कारोबार करते थे, अरशद, कोलकाता में वस्त्र निर्माताओं के केंद्र, चित्तपुर से आगे बढ़ने की इच्छा रखते थे।

सेंट जेवियर्स कॉलेज से वाणिज्य स्नातक की पढ़ाई करने वाले की यात्रा, एक जादुई यात्रा जैसे है। हालाँकि, जादू आसान नहीं है। परिणाम प्राप्त करने के लिए बहुत धैर्य, दृढ़ता और रणनीति की आवश्यकता थी। और, अरशद ने बिल्कुल इसी में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।

“मैं हमेशा से एक बिजनेसमैन बनना चाहता था। परिधान उद्योग ने मुझे आकर्षित किया क्योंकि यह मेरा पारिवारिक व्यवसाय था। लेकिन मैं महिलाओं के एथनिक वियर उद्योग में काम नहीं करना चाहता था। पुरुषों का एथनिक पहनावा में, मैं अपनी छाप छोड़ना चाहता था। तो, मेरा लक्ष्य निर्धारित था। और सुल्तान कुर्ते को लॉन्च करने के लिए मैंने जो रणनीति चुनी, उससे मेरे व्यवसाय को सही गति मिली,” अरशद याद करते हुये बताते हैं।

“केवल पाँच लाख रुपये की पूंजी के साथ, मेंने एथनिक वियर उद्योग में निवेश किया। हमने 2001 में बहुत छोटी शुरुआत की थी। और जब तक लॉकडाउन नहीं हुआ, मुझे ज़कारिया स्ट्रीट (रवींद्र सारणी) में हमारी दुकान के बाहर सुल्तान कुर्ते बेचते हुए देखा जा सकता था। मेरा काम अधिकतम ग्राहकों तक पहुंचना था और मुझे कोलकाता की सड़कों पर अपने उत्पाद बेचने में कोई झिझक नहीं थी,” वह कहते हैं।

क्या उन्होने कभी सोचा था कि सुल्तान मान्यवर का मुकाबला कर सकेगा?

“मान्यवर और सुल्तान के ग्राहक अलग-अलग हैं। वे अमीरों की ज़रूरतें पूरी करते हैं और हम मध्यम वर्ग की ज़रूरतें पूरी करते हैं। इसलिए, हमें ज्यादा प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ा। जहां से मान्यवर अपनी रेंज शुरू करता है वह मूल्य सीमा हमारे द्वारा पेश किए गए परिधानों की सबसे महंगी रेंज की कीमत है, ”एमडी ने एक ईमानदार उत्तर दिया।

वह आगे कहते हैं, “देखिए, हमारा एक ही दृष्टिकोण है – किफायती मूल्य पर सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले परिधान पेश करना। और वह हमारे ब्रांड के लिए एक पहचान बनाने में कामयाब रहा है।”

इसके अलावा, तथ्य यह है कि दो दशक बाद हमारा व्यापार न केवल बंगाल में, बल्कि पूरे भारत में और यहां तक ​​कि सीमाओं से परे भी फैल गया है।

उन्होंने गर्व से उल्लेख किया, “जहां तक ​​कुर्ता के उत्पादन का सवाल है, सुल्तान भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे बड़ा कुर्ता उत्पादक कंपनी है।”

कुर्ता चुनने का कोई विशेष कारण? “मुझे शेरवानी और कुर्ता पसंद है। और वे काफी महंगे हैं। मैं जानता था कि इसके लिए एक बाज़ार है और बस उन्हें किफायती बनाने की ज़रूरत है। और मैंने बिलकुल यही किया।”

“बंगाल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है और यहां के पुरुष, किसी भी धर्म के हों, कुर्ता पहनना पसंद करते हैं। और यह पहनावे के प्रति प्रेम और पैसे की कीमत है जिसने सुल्तान को कुर्तों का राजा बना दिया। इसलिए, मैं बिल्कुल स्पष्ट कर दूं, हमारी बिक्री सिर्फ रमज़ान में ही नहीं बल्कि पूजा के दौरान भी चरम पर होती है,” अरशद बताते हैं।

जैसे-जैसे ब्रांड बढ़ता गया, सुल्तान ने शेरवानी और चार अन्य वस्तुओं को केवल 863 रुपये में बेचना शुरू कर दिया। 99 रुपये के कुर्ते की पेशकश के बाद यह कुर्तों के राजा द्वारा पेश किया गया एक और हॉट केक था।

सुल्तान की सफलता उसके आकर्षक और अलग तरह के विज्ञापनों में भी निहित है, जिसका विचार जेवियरियन ने ही दिया था।

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सुल्तान के वायरल विज्ञापनों में से एक

शमीम की ताकत यह है कि सफलता का स्वाद चखने के बाद भी वह जमीन से जुड़े रहे और आज भी उतनी ही मेहनत करते हैं। उन्हें मर्सिडीज बेंज कार खरीदने के तुरंत बाद की एक घटना याद आती है।

“एक बार मैं ज़कारिया स्ट्रीट में अपनी पुरानी दुकान के पास फेरी लगा रहा था, तभी मैंने देखा कि एक आदमी दूर से मुझे देख रहा था। मैंने शुरू में उसे चोर समझा और अपना सामान बेचते समय उस पर नजर रखी। कुछ घंटों बाद, वह आदमी मेरे पास आया और पूछा कि क्या मेरा कोई भाई है, जो मर्सिडीज चलाता है। मैंने उसे यह कहकर चौंका दिया कि दोनों लोग एक जैसे हैं और मैं ही महंगी कार भी चलाता हूं।’

आज सुल्तान के पूरे कोलकाता में कम से कम चौदह शोरूम हैं। इससे अरशद को छुट्टी नहीं मिलती। मुख्य लेन-देन, बातचीत और उत्पाद प्रबंधन वही करते हैं।

विनम्रता की यह भावना उस व्यक्ति में अभी भी मौजूद है, जिसने एक ऐसा ब्रांड स्थापित किया जो इन ढाई दशकों में पुरुषों के लिए परिधानों के मामले में एक जाना पहचाना नाम बन गया है। रमज़ान के दौरान, वह अपने कार्यालय परिसर में अपने सहयोगियों के साथ अपना रोज़ा खोलते हैं। वह अपने साथ बैठे लोगों को अपना टिफिन शेयर करना नहीं भूलते।

जीवन के कई रंग देखने वाले 52 वर्षीय अरशद कहते हैं, “मैं अगले तीन वर्षों तक व्यवसाय की देखभाल करूंगा, उसके बाद, मैं समाज को वापस देना चाहूंगा। मैं शिक्षा क्षेत्र में काम करूंगा और यह सुनिश्चित करूंगा कि कम से कम जहां मैं रहता हूं, उस क्षेत्र में कोई भी बच्चा भूखा न सोए।”

 

ये लेख इंग्लिश में प्रकाशित खबर का अनुवाद है।

Can Rs 99 Change Your Life? The Rise of Sultan, the Kurta King

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Kolkata: They say that a lion before making the final leap takes a step back. In ways similar to it, this youngster in early 2000 chose not to start on with his business sale despite having his stock and shop in place. He chose to strike at the right time with the right strategy.

As Ramadan arrived, back in 2001, he placed ads and banners with an unbelievable offer – Kurtas for only 99 and that too with a one-year guarantee. A tempting deal that not many would want to miss. The unique marketing strategy gave the now-famous-ethnic brand for men the push that its founder had anticipated – a record-breaking sale that saw buyers queued to buy kurtas for Rs 99. Within an hour the stock ended. The crowd went into a frenzy to catch hold of its kurta, glasses broke, police had to be called to reign control and then as they say – the rest is history.

The man behind it was Arshad Shamim, the Managing Director of Sultan – The King of Kurtas. Born in a family that dealt in ethnic wear, especially for women, Shamim aspired to grow beyond Chittpur, the hub for ethnic wear manufacturers in Kolkata.

The journey of this commerce graduate from St Xaviers’ College is nothing but magical. However,  magic is not easy. It took a lot of patience, perseverance and strategising to achieve the result. And, that’s exactly what Shamim excelled in.

“I always wanted to be a businessman. The apparel industry appealed to me as it was my family business. But I didn’t want to venture into the women’s ethnic wear industry. Men’s ethnic wear was where I wanted to make a mark. So, my goal was set. And the strategy that I chose to launch Sultan Kurtas gave my business the right push,” reminisces Shamim.

With a capital of rupees of only five lakhs, he chose to invest in the ethnic wear industry. “We started very small, in 2001. And till lockdown happened, I could have been spotted hawking for Sultan Kurtas outside our shop at Zakaria Street (Rabindra Sarani). My job was to reach out to the maximum customers and I had no qualms selling my products on the streets of Kolkata,” he says.

Did he ever think that the Sultan could compete with Manyavar?

“Well, the clientele of Manyavar and Sultan is different. They cater to the rich and we cater to the needs of the middle class. So, we didn’t face much competition. The price range from where Manyavar begins its range is the price for the most expensive range of apparel we have on offer,” the MD gave an honest reply.

He adds, “See, we have one vision – offer the best quality apparel at an affordable price. And that has managed to create a mark for our brand.”

Also, the fact that two-decades later when the business has not just expanded in Bengal, but across India and even beyond the borders.

“As far as production of Kurta is concerned, Sultan is the largest kurta producer in the Indian subcontinent,” he proudly mentioned.

Any specific reason to choose kurtas? “I have a liking for sherwanis and kurtas. And they are pretty expensive. I knew that there was a market for it and all that needed to be done was to make them affordable. And that’s exactly what I did.”

“Bengal is culturally rich and men here like to wear kurtas, irrespective of one’s religion. And it’s love for ethnic wear and value for money that made Sultan become the King of Kurtas. So, let me be very clear, it’s not just in Ramadan that our sales witness a peak but also during the Pujas,” Shamim points out.

As the brand grew, Sultan also began to sell Sherwani and four other items together for just Rs 863. It was another hot cake offered by the King of Kurtas after its Rs 99 kurta offer.

Sultan’s success also lies in its appealing and maverick advertisements, which got ideated by the Xavierian itself.

Sultan Kurta Arshad Shamim ethnic wear apparel fashion
One of the viral advertisements by the Sultan

Shamim’s strength lies in the fact that even after tasting success, he has remained grounded and works as hard even today. He recalls an incident soon after he had purchased a Mercedes Benz car.

“Once I was hawking near our old shop in Zakaria Street when I spotted a man observing me from a distance. I initially took him to be a thief and kept my eye on him as I sold my goods. A few hours later, the man came up to me and asked if I had a brother, who drove a Mercedes. I shocked him by saying that both people are the same, and it is me who drives the expensive car as well.”

Today Sultan has at least fourteen showrooms across Kolkata. Still, it doesn’t make Shamim take a break. Even till date, the main dealing, negotiations, and product handling is done by him.

This sense of humility still exists in the man, who set up a brand that in these two-and-a-half decades has become a name to reckon with when it comes to ethnic wear for men. During Ramadan, he breaks his fast with his colleagues in his office premises. He doesn’t forget to offer his tiffin to those sitting with him.

The 52-year-old man who has witnessed several shades of life, adds, “I will look after the business for three more years, thereafter, I would like to give society back. I will work in the education sector and will ensure that at least where I reside, in that area, no child sleeps hungry.”

ইসলামোফোবিয়ার বিরুদ্ধে সংহতি প্রকাশ করে, কলকাতার পণ্ডিত আন্তঃধর্মীয় বোঝাপড়ার পক্ষে

কলকাতা: যখন ভারতে ঘৃণামুলক বক্তব্য এবং ইসলামফোবিক সমালোচনাগুলি শীর্ষে রয়েছে, তখন তাদের মোকাবেলা করার সেরা উপায় কী হবে? এর উত্তর দিতে, 150 জনেরও বেশি পণ্ডিত, লেখক,শিক্ষাবিদ, গবেষক, প্রাক্তন আমলা, সমাজকর্মী এবং সমাজের বিভিন্ন শ্রেণির সদস্যরা 15 মার্চ পালিত আন্তর্জাতিক ইসলামোফোবিয়া দিবসের একটি অনুষ্ঠানে একত্রিত হন।

এই সমাবেশে উপস্থিত ছিলেন  অধ্যাপক ইপ্সিতা হালদার, লেখক বিশ্বেন্দু নন্দ, গবেষক ও সমাজকর্মী অধ্যাপক রাজেশ্বর সিনহা, সাংবাদিক ও লেখক সৌভজিৎ বাগচী এবং আহম্মদ হাসান ইমরান। সঞ্চালক ও গবেষক সাবির আহমেদের সমন্বয়ে গঠিত প্যানেলে আলোচনায়  শুধু দেখা যায়নি, উঠে এসেছে  ইসলামোফোবিয়ার সাম্প্রতিক উত্থান। শুধু বাংলার রাজনৈতিক ক্ষেত্রেই নয়, স্কুল-কলেজেও কিভাবে তুলে ধরা যায় এবং সম্ভবত কীভাবে এই  ক্রমবর্ধমান অসহিষ্ণুতার অবসান ঘটাতে পারা যায় সেটাও।

বিশিষ্ট সাংবাদিক এবং লেখক সৌভোজিৎ বাগচী বলেন “আমাদের বুঝতে হবে যে ভারতের শরণার্থী সমস্যা সমাধানের জন্য সিএএ প্রয়োগ করা হয়নি। যদি সেটাই হয়ে থাকে, তাহলে ২০১৯ সালের ডিসেম্বরে পাস হওয়া সত্ত্বেও কেন এই আইনটি সাধারণ নির্বাচনের মাত্র চার সপ্তাহ আগে কার্যকর করা হয়েছে? নির্বাচন শেষ হয়ে গেলে, এটিকে আবার ট্যাঁকে তুলে রাখা হবে এবং আবার পরবর্তী নির্বাচনে আবার বের করে আনা হবে ঝোলা থেকে” । তিনি আরও যুক্ত করেন যে সিএএ  বাস্তবায়নের পুরো বিষয়টি উত্তর ও মধ্য ভারতের ভোটারদের মেরুকরণের একমাত্র এজেন্ডা নিয়ে করা হয়েছে।

তবে সহ-প্যানেলিস্ট অধ্যাপক রাজ্যেশ্বর সিনহা ভিন্ন মত পোষণ করেছেন।তিনি বলেন  “যখন নতুন ভারতের বর্তমান রাজনৈতিক পরিস্থিতি একটি নির্দিষ্ট অংশের মানুষকে পিছনে ঠেলে দিচ্ছে তখন  অন্য একটি অংশের মানুষকে দাবি করতে দেখা যাচ্ছে যে সবকিছুই তাদের। এবং সময়ের সাথে সাথে তাদের এই কণ্ঠস্বর আরও জোরে হবে। আর যদি সময়ের সাথে সাথে সিএএ এবং এনআরসি নিয়ে আরও গোলমাল করতে দেখা যায় তবে, সময়ের প্রয়োজন কী?”

তিনি আরও সংযোজন করেন যে “আমাদের এমন কর্মসূচী সংগঠিত করতে হবে যা আমাদেরকে ছোট ছোট স্তরে জনসাধারণের কাছে পৌঁছানোর সুযোগ দেবে ও সংলাপ এবং আলোচনা শুরু করবে যা বিভিন্ন সম্প্রদায়ের মধ্যে যে ক্রমাগত বিস্তৃত বিভাজন সেটা কম করবে,” ।

ইসলামোফোবিয়া ইন্টারফেইথ ইফতার বুদ্ধিজীবী কলকাতা সিএএ এনআরসি

আলোচনার সময়,লেখক  বিশ্বেন্দু নন্দ এই সত্যটি তুলে ধরেছিলেন যে ইসলামোফোবিয়া ভারতে নতুন কিছু নয়। “আমরা আজ যে ইসলামোফোবিয়া দেখতে পাচ্ছি তা হল প্রথম ক্রুসেডের সময় বপন করা ঘৃণার অবশিষ্টাংশ।”

তরুণদের মধ্যে ইসলামোফোবিয়া তৈরি করতে কীভাবে যোগাযোগের বিভিন্ন মাধ্যম কীভাবে ব্যবহার করা হচ্ছে তা ব্যাখ্যা করতে গিয়ে শ্রদ্ধা ওয়াকার মামলার কথা উল্লেখ করেন, আল্টনিউজ-এর প্রতীক সিনহা। তিনি বলেন “আমরা এমন এক যুগে আছি,  একটি শিশু যখন টিভি চ্যানেল চালু করার পর যে চ্যানেলেই যায়, সেখানে কেবল একটি খবরই শোনা যায় যে, কীভাবে একজন মুসলিম ব্যক্তির হাতে শ্রদ্ধাকে হত্যা করা হয়েছিল ।এই প্রেক্ষাপটেই, বর্তমান ভারতের যোগাযোগ বা সংবাদ প্রচারের সমস্ত মাধ্যম  আপোস করে যাচ্ছে। যার ফলে, বর্তমান ভারতীয় বাচ্চাদের মধ্যে একশ্রেণীর বাচ্চার এই তির্যক ধারণা নিয়ে বড় হওয়ার সম্ভাবনা রয়েছে যে, মুসলমানদের বিশ্বাস করা যায় না বা তারা খারাপ।” তিনি আরও ব্যাখ্যা করেছিলেন যে কীভাবে ক্ষমতাসীন দল এবং তাদের কর্মীরা একটি নির্দিষ্ট জনগোষ্ঠীকে বদনাম করার জন্য সমস্ত ধরণের মিডিয়া এবং তথ্যের উত্স ব্যবহার করছে এবং ফলস্বরূপ মুসলমানদের টার্গেট করার জন্য, কারও দ্বারা সংঘটিত অপরাধের প্রতিটি সম্ভাব্য ঘটনাকে অস্ত্র হিসেবে ব্যাবহার করছে। তিনি আরও যোগ করে বলেন, “যে গোষ্ঠীগুলি এই ধরনের প্রচারের বিরোধিতা করে তাদের পক্ষে সঠিক উৎস  এবং মিডিয়া প্ল্যাটফর্ম গঠন করা বা পরিচালনা করা কতটা গুরুত্বপূর্ণ।”

ইভেন্টটি যৌথভাবে মাইনোরিটি  কাউন্সিল অফ বেঙ্গল (MCB) এবং KYN দ্বারা সংগঠিত হয়েছিল, এটি  একটি সামাজিক উদ্যোগ যার লক্ষ্য আন্তঃধর্মীয় কথোপকথন এবং সামাজিক সম্প্রীতি প্রচার করা, সারা বছর জুড়ে বিভিন্ন কর্মসূচীর মাধ্যমে। যার মধ্যে রয়েছে আশেপাশের স্থান ঘুরতে যাওয়া, আলোচনা এবং অন্যান্য বিভিন্নধরনের কার্যক্রম।

প্রতি বছর ন্যায় নো ইয়োর নেবার (KYN) দ্বারা আয়োজিত  “দোস্তি-কি-ইফতারী” দিয়ে কর্মসূচীর ইতি টানা হয়।

সবশেষে আলিয়া বিশ্ববিদ্যালয়ের সহকারী অধ্যাপক ডঃ মোহাম্মদ রেয়াজ KYN এর একজন সক্রিয়  সদস্য, সকল অংশগ্রহণকারীদের ধন্যবাদ জ্ঞাপন করেন।

 

এটি ইংরেজিতে প্রকাশিত প্রতিবেদন। অনুবাদ করেছেন শাহ নূর আখতার।

इस्लामोफोबिया के खिलाफ एकजुटता के लिए, कोलकाता के विद्वान का अंतरधार्मिक समझ की वकालत

कोलकाता: ऐसे समय में जब भारत में नफरत फैलाने वाले भाषण और इस्लामोफोबिक टिप्पणियां अपने चरम पर हैं, उनका मुकाबला करने का सबसे अच्छा तरीका क्या होगा? इसका उत्तर देने के लिए, 150 से अधिक विद्वान, लेखक, शिक्षाविद, शिक्षक, शोधकर्ता, पूर्व नौकरशाह, सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक समाज के सदस्य 15 मार्च को मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय इस्लामोफोबिया दिवस मनाने के लिए एक कार्यक्रम में एकत्र हुए।

बंद कमरे में हुई सभा में प्रोफेसर एप्सिता हलदर, विश्वेन्दु नंदा-लेखक, शोधकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता, प्रोफेसर राज्येश्वर सिन्हा, पत्रकार और लेखक सौवोजीत बागची और अहमद हसन इमरान और शोधकर्ता साबिर अहमद, जिन्होंने चर्चा का संचालन किया, को न केवल देखा गया। न केवल बंगाल के राजनीतिक क्षेत्र में, बल्कि स्कूलों और कॉलेजों में भी इस्लामोफोबिया के हालिया उदय पर प्रकाश डाला गया है और संभवतः बढ़ती असहिष्णुता को कैसे समाप्त किया जा सकता है।

“हमें यह समझने की जरूरत है कि सीएए भारत की शरणार्थी समस्या को हल करने के लिए लागू नहीं किया गया था। अगर यही इरादा था, तो दिसंबर 2019 में पारित होने के बावजूद यह कानून आम चुनाव से सिर्फ चार हफ्ते पहले क्यों लागू किया गया है। एक बार चुनाव ख़त्म हो जाने के बाद, इसे फिर से ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा और अगले चुनाव में इसे फिर से सामने लाया जाएगा,” सौवोजीत बागची ने प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सीएए कार्यान्वयन की पूरी कवायद उत्तर और मध्य भारत के मतदाताओं के ध्रुवीकरण के एकमात्र एजेंडे के साथ की गई है।

हालाँकि, सह-पैनलिस्ट प्रोफेसर राज्येश्वर सिन्हा ने अलग रुख अपनाया। “नए भारत का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य एक खास वर्ग को पीछे धकेल रहा है जबकि एक अन्य वर्ग यह दावा करता नजर आ रहा है कि सब कुछ उनका है। और समय के साथ ये चीख और तेज़ होती जाएगी. समय के साथ सीएए और एनआरसी का शोर और ज्यादा बढ़ता नजर आएगा. तो, समय की क्या ज़रूरत है?”

उन्होंने कहा, “हमें ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने की ज़रूरत है जो हमें सूक्ष्म स्तर पर जनता तक पहुंचने, संवाद और बातचीत शुरू करने की अनुमति देंगे जो समुदायों के बीच लगातार बढ़ते विभाजन को कम करेंगे।”

इस्लामोफोबिया इंटरफेथ इफ्तार बुद्धिजीवी कोलकाता सीएए एनआरसी
दोस्ती-की-इफ्तारी कार्यक्रम में एक वक्ता

चर्चा के दौरान बिस्वेंदु नंदा ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला कि इस्लामोफोबिया भारत के लिए कोई नई बात नहीं है। “आज हम जो इस्लामोफ़ोबिया देख रहे हैं वह पहले धर्मयुद्ध के दौरान बोई गई नफरत का अवशेष है।”

यह समझाते हुए कि युवाओं में इस्लामोफोबिया पैदा करने के लिए संचार के विभिन्न माध्यमों का उपयोग कैसे किया जा रहा है। श्रद्धा वाकर मामले का उल्लेख करते हुए, AltNews के प्रतीक सिन्हा ने बताया, “हम एक ऐसे युग में हैं, जब कोई बच्चा टीवी चैनल खोलता है तो वह जहां भी जाता है, केवल एक ही खबर चलती है कि कैसे श्रद्धा को एक मुस्लिम व्यक्ति ने मार डाला है।” . इस तथ्य को देखते हुए कि वर्तमान भारत में संचार या समाचार प्रसार के सभी साधनों से समझौता किया जा रहा है, इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि वर्तमान भारत के बच्चे इस विकृत धारणा के साथ बड़े होंगे कि मुसलमानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है या वे दुष्ट हैं।” उन्होंने बताया कि कैसे सत्तारूढ़ दल और उनके कैडर एक विशेष समुदाय को बदनाम करने के लिए सभी प्रकार के मीडिया और सूचना के स्रोतों का उपयोग कर रहे हैं और परिणामस्वरूप मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए किसी के द्वारा किए गए अपराधों के हर संभावित उदाहरण को हथियार बना रहे हैं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला, “यह उन समूहों के लिए महत्वपूर्ण है जो इस तरह के आख्यानों का विरोध करते हैं या तो सूचना और मीडिया प्लेटफॉर्म के अपने स्वयं के स्रोत बनाने या बनाने में योगदान करते हैं।”

सत्र के बाद ‘दोस्ती-की-इफ्तारी’ आयोजित की गई – एक अंतरधार्मिक इफ्तार सभा जिसे नो योर नेबर द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है।

यह कार्यक्रम माइनॉरिटी काउंसिल ऑफ बंगाल (एमसीबी) और केवाईएन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था, जो एक सामाजिक पहल है जिसका उद्देश्य अंतरधार्मिक संवाद और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना है जो पूरे वर्ष कई कार्यक्रम आयोजित करता है, जिसमें पड़ोस की सैर, चर्चाएं और ऐसी अन्य गतिविधियां शामिल हैं।

अंत में सहायक प्रोफेसर मोहम्मद रेयाज़ और नो योर नेबर के सदस्य ने सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद ज्ञापन दिया।

 

ये इंग्लिश में प्रकाशित लेख का अनुवाद है

2019 में हरियाणा के सभी सीटों से जीतने वाली भाजपा ने आधे पे उम्मीदवार बदले, आसान नहीं राह

[dropcap]व[/dropcap]र्तमान परिस्थितियों में सिरसा से अशोक तंवर की जीत की संभावनाएं लोकसभा चुनाव 2024 में कमज़ोर ही है। कांग्रेस से निष्कासित होने के बाद अशोक तंवर तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी से होते हुए कुछ समय पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं। कांग्रेस की टिकट पर एक बार पहले 2009 में सिरसा से चुनाव जीते थे। 48 वर्षीय अशोक तवंर ने अपनी राजनीति की शुरुआत कांग्रेस में छात्र संगठन के सदस्य के रूप में शुरू की थी, हरियाणा प्रदेश के कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल में कोई विशेष उपलब्धि कांग्रेस को नहीं मिली। सिरसा अनुसूचित जाती के लिए आरक्षित सीट है। कहा जा रहा है की भाजपा की वर्तमान सांसद सुनीता दुग्गल कुछ खास कार्य इस क्षेत्र में करने में असफल ही रही और मतदाताओं की नाराजगी से बचने के लिए भाजपा ने अपना प्रत्याशी बदल दिया।

हिसार से भाजपा ने  सिरसा के रानियां से वर्तमान  निर्दलीय विधायक रणजीत सिंह चौटाला को मैदान में उतारा है। उन्हें कल ही भाजपा में शामिल किया गया था। रणजीत सिंह चौटाला देवी लाल के पुत्र व् जजपा के पूर्व उपमुख़्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के दादा के छोटे भाई हैं। 1987 में रणजीत चौटाला सिरसा के रोड़ी हल्का से विधयक बने थे। 1990 में हरियाणा से राज्य सभा के लिए चुने गए थे। 78 वर्षीय रणजीत चौटाला जनता दल इंडियन लोकदल कांग्रेस में रह चुके हैं। माना जा रहा है के हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की हरियाणा  में बिछायी राजनीतिक विसात के रणजीत सिंह एक अहम मोहरे हैं। हिसार लोकसभा सीट जाट बहुल मानी जाती है और लोगों में चर्चा है के भाजपा में चल रही गुटबाजी के परिणाम में रणजीत सिंह को पूर्व वित् मंत्री कै अभिमन्यु व् भजन लाल परिवार  से कुलदीप बिश्नोई को उनकी राजनितिक हैसियत दिखने के लिए हिसार लोकसभा सीट पर लाया गया है। हाल ही में हिसार के भाजपा के सांसद ब्रिजेन्दर सिंह ने भगवा ब्रिगेड छोड़ कर कांग्रेस में शामिल होने की पहल की थी।

भिवानी महेन्दरगढ़ की सीट पर भाजपा ने निवर्तमान सांसद  धर्मवीर सिंह को फिर से उतरा है। हालाँकि काफी समय से अटकलें चल रही थी की सांसद धर्मवीर सिंह अपने बेटे को राजनीती में स्थापित करने की जुगत के चलते नयी संभावनाओं को भी समानांतर तौर पर तलाश रहे थे। इसी क्षेत्र से पूर्व में सांसद रही सुधा यादव को भाजपा द्वारा पार्टी के पार्लियमेंटरी बोर्ड व् केंद्रीय चुनाव समिति का सदस्य नियुक किया गया था। हरियाणा सरकार में वर्तमान कृषि मंत्री जय प्रकाश दलाल भी इसी क्षेत्र आते हैं। पहले किसान आंदोलन के समय सांसद धर्मवीर को पुरे क्षेत्र में काफी विरोध का सामना करना पड़ा था। यह क्षेत्र सिंचाई  व् पानी की कमी से झूझ रहा है। राजपूत व् अहीर समुदाय के परंपरागत वोट भाजपा के पक्ष में जाने का लाभ यहाँ पिछली लोकसभा चुनावों में जीत को सुनिश्चित करता रहा। लेकिन अबकी बार चुनौती अग्निवीर जैसी योजनओं ने इस क्षेत्र में कड़ी कर दी हैं।

रोहतक की सीट से अरविंद शर्मा को फिर से प्रत्याशी बनाया गया है। पिछली बार बहुत ही कम अंतर् से ये सीट कांग्रेस के दीपेंदर हूडा हार गए थे। अबकी बार कठिन चुनौती भाजपा को यहाँ मिलने वाली है। खिलाड़ी महिला पहलवानों के मुद्दे पर व् किसानों के आंदोलन को लेकर इस क्षेत्र में भाजपा के प्रति स्थानीय मतदातों में रोष है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंदर हूडा का यह गढ़ भी माना जाता है। पूर्व सैनिकों की पेंशन के लाभ व् कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाली को लेकर निरंतर आवाज़ें यहाँ से उठती रही है। प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थितियों की छाया भी इस क्षेत्र में विकट है। हाल ही में ईनेलो के प्रदेश अध्यक्ष नफे सिंह राठी की हत्या ने प्रदेश को हिला दिया था।

सोनपत की सीट पर भी भाजपा को अपना प्रत्याशी बदलना पढ़ा है। रमेश कौशिक की एक आपत्तिजनक सीडी कुछ ही दिन पहले  सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी। ऐसा माना जा रहा है कि सांसद रमेश कौशिक ने अपने कार्यकाल में इस क्षेत्र में पूरी गंभीरता से काम नहीं किये और स्थानीय लोगों का कौशिक के प्रति मोह भंग हो चूका था और बचा खुचा पर्चा सी दी ने आउट कर दिया। अब सोनीपत से मोहन लाल बड़ोली को मैदान में उतरा गया है। मोहन लाल कौशिक बड़ोली राससं से जुड़े रहे हैं। पहली बार 2019  में सोनीपत की राइ विधान सभा से  विधयक बने थे। सोनीपत के बहालगढ़ में कपडे की दुकान चलते रहे मोहन लाल कौशिक बड़ोली राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता रहे है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के मजबूत प्रत्याशी की चुनौती अगर यहाँ खड़ी  हो गई तो मोहन लाल कौशिक को काफी कठिनाई का समाना करना पड़ेग।

करनाल की सीट पर भाजपा को हरियाणा के मुख्यमंत्री पद से हटा कर मनोहर लाल खट्टर को उतरना पड़ा है। यह अपने आप में ही एक बड़ा संकेत राजनितिक गलियारों में उभरने लगा है की भाजपा के लिए अबकी बार हरियाणा में चुनौतियाँ कितनी गंभीर हो गयी हैं। मनोहर लाल खटटर के मुख्यमंत्री काल के लाभ को करनाल में भाजपा भुना कर सीट को अपने खाते में लाना चाहती है। यह अंदजा लगान मुश्किल नहीं की एक एक सीट भाजपा के लिए जीत सुनिश्चित करने के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो गयी है।

कुरूक्षेत्र लोकसभा सीट पर भाजपा ने 2014 और 2019 में जीत हासिल की थी। 2014 में जीत पाने वाले राज कुमार सैनी ने पार्टी के लिए हरियाणा में जातीय ध्रुवीकरण का बड़े जोर शोर से बिगुल बजाया था। बहुल संख्यक जाटों के विरुद्ध विवादित बयान राज कुमार सैनी की पहचान रहे लेकिन 2019 में भाजपा ने नायब सैनी को कुरुक्षेत्र में उतारा और फिर से जीत दर्ज की थी। नायब सैनी को अब  हरियाणा प्रदेश का नया मुख्यमंत्री बनाया गया है। अब भाजपा ने करुक्षेत्र में अपनी हांड़ी नवीन जिंदल के मार्फ़त फिर से चढ़ाई है। नवीन जिंदल कुरुक्षेत्र से कांग्रेस के 2004 व् 2009 में 2 बार संसद रहे है। अब अचानक अमृत काल में हृदय परिवर्तन होने के कारण कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए। भारतीय जनता पार्टी और प्रधान सेवक नरेंद्र मोदी, नवीन जिंदल पर कोयला चोरी में संलिप्त्ता के आरोप अपने मंचों से जोर शोर से लगाते रहे हैं। भाजपा के लिए नवीन जिंदल को कुरूक्षेत्र से तीसरी बार जितवाना महाभारत के चक्रवयूह को भेदने के सामान ही रहेगा।

अम्बाला आरक्षित सीट पर भाजपा ने पूर्व सांसद दिवंगत रतन लाल कटारिया की पत्नी बन्तो कटारिया को उतरा है। बाढ़ संभावित क्षेत्र में सहानुभूति की नाव कैसे पार पहुंचेगी यह एक अलग ही कहानी होने वाली है। किसान आंदोलन का सबसे तीव्र प्रभाव इसी लोकसभा क्षेत्र में स्थापित है। प्रदेश में वर्तमन भाजपा सरकार के पुनर्गठन से व्यथित भाजपा के बड़बोले नेता अनिल विज भी अम्बाला से ही हैं।

फरीदाबाद की सीट पर किशन पाल गुज्जर भाजपा के उमीदवार के तौर पर तीसरी बार अपनी किस्मत आजमाएंगे। केंद्रीय मंत्री रहे किशन पाल गुज्जर के लिए अपेक्षाकृत चुनौतियाँ कुछ कम ही दिखाई दे रही हैं। अपनी जीत के लिए वह केंद्रीय नेतृत्व को पूरी तरह आश्वस्त भी कर चुके हैं। चुनावी बांड के खुलासों की परछाई से भाजपा जिस तरह ग्रस्त हुयी है उसके प्रभाव से किशन पाल गुज्जर को भी देश में अन्य भाजपा उम्मीदवारों की तरह खुद को बचा पाने की चुनौती रहेगी यह समय ही तय करेगा।

गुरुग्राम की सीट पर भाजपा ने राव इंदरजीत पर सीट जीतने का भरोसा जताया है। गुरुग्राम लोकसभा क्षेत्र भाजपा के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला के रूप में भी सुरक्षित सीट मानी जा रही है। मेवात के साम्प्रदायिक संघर्ष व् गुरुग्राम में मुस्लिम समुदाय के द्वारा खुले में नमाज़ अदा करने को ले कर विगत में हिन्दू संगठनों के विरोध प्रदर्शन से स्थितियां बार बार तनावपूर्ण होती रही हैं। भाजपा इस सीट पर अपनी जीत के किये पूरी तरह से आश्वस्त है।

फाल्गुन की रुत कैसे कैसे राजनीति के रंग आने वाले समय में बिखरेगी ये ज्येष्ठ की तपती गर्मी में सामने आएंगे। राजनीति की लू में अबके कौन कितना झुलसेगा ये चौंकाने वाला होगा।

Uniting Against Islamophobia: Kolkata Scholars Advocate for Interfaith Understanding

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Kolkata: At a time when hate speech and Islamophobic comments are at its peak in India, what would be the best way to counter them? To answer this, over 150 scholars, authors, academics, educators, researchers, former bureaucrats, social activists and members of the civil society gathered at an event to commemorate International Day of Islamophobia, that’s observed on March 15.

In the closed-door gathering, the panel comprising professor Epsita Halder, Biswendu Nanda -writer, researcher and social activist, Professor Rajyeswar Sinha, Journalist and writer Souvojit Bagchi and Ahamed Hassan Imran and researcher Sabir Ahamed, who moderated the discussion were seen not just highlighting the recent rise of Islamophobia not just in the political space of Bengal, but also in schools and colleges and possibly how one could bring and an end to the increasing intolerance.

“We need to understand that CAA wasn’t implemented to solve India’s refugee problem. If that had been the intention, then why this law despite having been passed in December 2019 has been implemented just four-weeks ahead of the general elections. Once the election is over, it will again be put on the back burners only to be brought out again in the next elections,” highlighted Souvojit Bagchi. He maintained that the entire exercise of CAA implementation has been done with the sole agenda of polarising voters of north and central India.

However, co-panelist Professor Rajyeswar Sinha chose to differ. “The present political scenario of the new India is making a certain section push back while another section is being seen making claims that everything belongs to them. And with time this cry will be getting louder. With time CAA and NRC will be seen making more noise. So, what is the need of the hour?”

“We need to organise programmes that will allow us to reach out to the masses at a micro-level, initiate dialogues and talks that will reduce the ever-widening divide among the communities,” he added.

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Speakers at the Dosti Ki Iftar event

During the discussion Biswendu Nanda chose to highlight the fact that Islamophobia is nothing new to India. “The Islamophobia that we are witnessing today is the remnant of the hatred sown during the first crusade.”

Explaining how different means of communication are being used to create Islamophobia among youngsters. Mentioning the Shraddha Walker case, Pratik Sinha of AltNews explained, “We are in an era, when a child switches on a TV channel then everywhere he/she goes, only one news will be played that how Sharddha has been killed by a Muslim man. Given the fact that in present India all means of communication or news dissemination being compromised there is a high chance of kids of present India growing up with a skewed perception that Muslims cannot be trusted or that they are evil.” He explained how the ruling party and their cadres are using all forms of media and sources of information to vilify a particular narrative and consequently weaponize every possible instance of crimes committed by someone to target Muslims. He concluded, “It is important for groups that oppose such narratives to either form or contribute towards forming their own sources of information and media platforms.”

The session was followed by “Dosti-Ki-Iftari’ – an interfaith iftar gathering which is hosted annually by Know Your Neighbour (KYN). 

The event was jointly organised by Minority Council of Bengal (MCB) and KYN, a social initiative aimed at promoting interfaith dialogues and social harmony that organises a number of events throughout the year, including neighbourhood walks, discussions, and other such activities.

At the end, Assistant Professor Mohammed Reyaz and member of KYN gave a vote of thanks to all the participants.