भारत के प्रधानमंत्री: राजनीति में आलोचनात्मक लेखा-जोखा करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण

पुस्तक देश के हर प्रधानमंत्री से जुड़ी रचनात्मक और सकारात्मक सोच पर तो रोशनी डालती ही है, यह उनके कामकाज को समालोचनात्मक तरीके से भी सामने रखती है, जहां आपको देश के सर्वोच्च पद पर आसीन रहे हर प्रधानमंत्री की कहानी में उनके लिए कोई-न-कोई सबक जरूर मिलेगा

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भारत के प्रधानमंत्री: देश, दशा, दिशा- प्रसिद्ध भारतीय पत्रकार रशीद किदवई द्वारा हिन्दी में लिखी गई यह पहली पुस्तक है, जो हाल ही में ‘राजकमल प्रकाशन’ से प्रकाशित हुई है। रशीद जी ने इसमें जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेन्द्र मोदी तक भारत के 15 प्रधानमंत्रियों के कार्यों की विवेचनाएं की हैं। इसमें हर एक प्रधानमंत्री के बारे में बात करते हुए उन्होंने कई दिलचस्प घटनाओं का सहारा लिया है, पूरा लेखन बड़े अर्थपूर्ण, सटीक और निष्पक्ष ढंग से स्वतंत्र भारत की राजनीति के इतिहास का सार बयां कर देता है। खास बात यह है कि पूरी पुस्तक पढ़ते हुए बौद्धिक भारीपन महसूस नहीं होता और राजनीति के प्रति जिज्ञासा का भाव पैदा होता है।

पुस्तक देश के हर प्रधानमंत्री से जुड़ी रचनात्मक और सकारात्मक सोच पर तो रोशनी डालती ही है, यह उनके कामकाज को समालोचनात्मक तरीके से भी सामने रखती है, जहां आपको देश के सर्वोच्च पद पर आसीन रहे हर प्रधानमंत्री की कहानी में उनके लिए कोई-न-कोई सबक जरूर मिलेगा।

यदि बारीकी से अध्ययन किया जाए तो हर राजनेता के भीतर मानवीय दृष्टिकोण का आभास मिलता है। उदाहरण के लिए, जवाहरलाल नेहरू धैर्यवान, गंभीर और भावुक किस्म के इंसान थे। लाल बहादुर शास्त्री विनम्र, सत्यनिष्ठा और दृढ़ता की मूर्ति थे। इंदिरा गांधी स्वाभिमानी और कठोर निर्णय लेने वाली मजबूत हृदय की महिला थीं। राजीव गांधी सज्जन, सुशील और मृदुभाषी नेता थे। पी. वी. नरसिम्हा राव चुपचाप बड़े कदम उठाने वाले ऐसे बूढ़े व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत की आर्थिक दशा और दिशा ही बदल दी। एच. डी देवेगौड़ा आंचलिक नेता की छवि रखने वाले राष्ट्रीय स्तर के नेता रहे, तो इंद्र कुमार गुजराल को कठिन दौर में प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने वाली शख्सियत।

अटल बिहारी वाजपेयी सबको साथ लेने वाली नेता की छवि रखने के बावजूद अपने मन की करने वाले व्यक्ति थे। डॉ. मनमोहन सिंह कार्य तो अपनी मर्जी से करते थे, लेकिन मार्गदर्शन और हर निर्णय पर मुहर लगवाने के लिए हमेशा हाईकमान का मुंह ताकते रहते थे। नरेन्द्र मोदी ऐसे लोकप्रिय नेता हैं, जो नेहरू के विरोधी के तौर पर अपनी छवि गढ़ने के बावजूद कुछ सियासी मामलों में नेहरू का ही अनुसरण कर रहे हैं। इन सबके बीच किसान नेता चौधरी चरण सिंह की सादगी मिसाल के तौर पर पेश की जा सकती है। वहीं, वी. पी. सिंह ने पहचान की राजनीति को नया रूप दिया था।

‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ के प्रेसीडेंट समीर सरन ने पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है। सरन लिखते हैं कि भारत को आजादी मिल जाने के बाद संविधान-सभा द्वारा देश का कामकाज चलाने के लिए वेस्टमिंस्टर मॉडल चुना गया। प्रारंभिक रूप से इसके तीन कारण थे। पहला तो यह कि भारतीय गणतंत्र की स्थापना करने वाले नेतागण ब्रिटिश संसद की इस लोकतांत्रिक व्यवस्था से परिचित थे। दूसरा, वे सामूहिक जिम्मेदारी के विचार से अभिभूत थे। तीसरा, ‘समकक्षों में प्रथम’ के विचार से कांग्रेस भी सहमत थी। यह तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की मंशा के अनुरूप भी था। दरअसल, तब एक वर्षीय कार्यकाल के लिए कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ था, जिसका व्यक्तिगत स्तर पर किसी नेता की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ा था।

वह कहते हैं कि प्रधानमंत्री के लिए ‘समूह’ में समान स्थान रखने वालों का प्रतिनिधि’ की जो परिकल्पना की गई थी, वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती चली गई। दशकों बाद सामूहिक जिम्मेदारी का अर्थ प्रधानमंत्री कार्यालय की जिम्मेदारी होकर रह गया।

हम आज भी देखते हैं कि किस तरह सरकार की सफलताओं और असफलताओं के लिए प्रधानमंत्री या प्रधानमंत्री कार्यालय को जिम्मेदारी ठहराया जाता है। पिछले वर्षों के अनुभव बताते हैं कि सरकार अपने कामकाज में संसदीय होने से ज्यादा एकपक्षीय होती जा रही है।

‘भारत-निर्माण की वस्तुपरक झांकी’ शीर्षक से पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा लिखते हैं कि एक युवा देश, लेकिन प्राचीन व समृद्ध सभ्यता के वाहक राष्ट्र भारत के इतिहास, विशेषकर आधुनिक भारत की आर्थिक यात्रा का अध्ययन एक दिलचस्प काम है। आजादी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के अध्ययन में हमें समाजवाद, उत्तर-समाजवाद, उदारीकरण व उत्तर उदारीकरण पर विशेष ध्यान देना होगा। आजादी के बाद भारत के सामने अनेक समस्याएं मौजूद थीं। कई संकट मुंह बाए खड़े थे। अब देश को एक गुलाम राष्ट्र से सेक्युलर, सोशलिस्ट व डेमोक्रेटिक रिपब्लिक अर्थात धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी व जनतांत्रिक गणराज्य बनने के पथ पर आगे बढ़ना था। अंग्रेजी के वरिष्ठ पत्रकार व कई सम्मान प्राप्त लेखक रशीद किदवई की यह महत्त्वपूर्ण पुस्तक देश की इसी अविस्मरणीय यात्रा की एक वस्तुपरक झांकी प्रस्तुत करती है।

दूसरी तरफ, आजादी के 75वें वर्ष में रशीद किदवई की यह पुस्तक पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक के विचारों और कार्यों का अपनी कसौटी पर बेबाक मूल्यांकन करती है। यह पुस्तक एक लोकतंत्र के तौर पर भारत की प्रगति तथा उसके रास्ते में खड़े अवरोधों के बारे में सोचने के सूत्र देती है। सोशल मीडिया के भ्रामक दौर में यह पुस्तक तथ्यपरक तरीके से देश के विकास की आवश्यकताओं पर शीर्षस्थ नेतृत्व की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बारे में बात करती है, जिनके चलते भारतीय लोकतंत्र प्रभावित हुआ।

एक अनुभवी पत्रकार की कलम से देश के सभी प्रधानमंत्रियों का यह निष्पक्ष आकलन भारतीय लोकतंत्र के प्रति संवेदनशील हर नागरिक के लिए आवश्यक दस्तावेज साबित हो सकता है।

‘किताब की बात’ शीर्षक से लेखक रशीद किदवई लिखते हैं कि भारतीय राजनीति खूब फल-फूल रही है। भ्रष्टाचार, वंशवाद, नफरत और निम्न स्तर के बावजूद देशवासियों को लोकतंत्र एवं व्यवस्था में पूरी आस्था और भरोसा है। जातिवाद, असहिष्णुता, झूठ और धोखे का स्वाद अनगिनत बार चखने के बाद भी हर चुनाव में समाज के तकरीबन समस्त वर्ग के लोग लंबी कतार में खड़े होकर अपने प्रिय जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दल को वोट डालकर खुद को सुखी व सुरक्षित महसूस करते हैं।

उनका यह कहना भी सही लगता है कि धर्म, सिनेमा और क्रिकेट की तरह राजनीति में भी हम भारतीयों की बेहिसाब दिलचस्पी के बावजूद समकालीन राजनीति पर अच्छी पुस्तकों की कमी है। ऐसे में रशीद किदवई की इस प्रकार की पुस्तकें लिखी जानी लोकतंत्र के कौशल को समृद्ध करने जैसी पहल लगती है। राजनीति से जुड़ी ज्यादातर पुस्तकें जीवनी और संस्मरण ही रहे हैं, इसलिए ‘भारत के प्रधानमंत्री’ जैसी पुस्तक तथ्यात्मक और आलोचनात्मक लेखा-जोखा करने की दृष्टि से भी अपनी अहमियत बताती हैं।

1 COMMENT

  1. मुलताई में कुछ बैंक, कुछ शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बिना पार्किंग के संचालित हो रहे हैं, तथा कुछ लोगों ने पार्किंग के लिए जगह बहुत कम दी है। जो वाहन पार्किंग के लिए पर्याप्त नहीं है। इससे ग्राहको को वाहन खड़े करने में बहुत परेशानी होती है। आखिर बिना पार्किंग के बैंक कैसे संचालित हो रहे हैं। ये तो नियमों का उल्लघंन हो रहा है। सड़क किनारे वाहन खड़े करने से यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। कई बार दुर्घटना तक हो जाती है। सरकारी जमीन पर वाहन खड़े हो रहे हैं । जबकि जिस भवन मे बैंक संचालित होती है उसकी स्वयं की पार्किंग होना जरूरी है। मुलताई में संचालित सभी बैंकों की पार्किंग व्यवस्था की जांच होना चाहिए।
    कुछ बेसमेंट बिना अनुमति के बने हैं। कुछ व्यावसायिक भवनों के नक्शे बिना पार्किंग दिए पास हुए हैं। कुछ लोगों ने सरकारी जमीन पर पक्का अतिक्रमण कर लिया है। जांच होना चाहिए।
    रवि खवसे, मुलताई (मध्यप्रदेश)

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