वक्त बदला, शहर बदले, रिश्ता नहीं

गिरिडीह से चीन तक, पत्रकारिता से राजनीति तक—दो दशक में शहर और भूमिकाएं बदलती रहीं, लेकिन सुदिव्य सोनू के साथ मेरा रिश्ता बना रहा

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वक्त रात के 12 बजे का था। साल 2015। यह भारत की टाइमिंग नहीं थी, यह चीन की टाइमिंग थी।

उस वक्त मैं गहरी नींद में था। नींद में ही फोन उठाया।

दूसरी तरफ से सईद अख्तर की आवाज आई—“भैया, आपसे बात करना चाह रहे हैं।”

उधर से सुदिव्य सोनू की आवाज आई—“कैसे हैं?”

मैंने जवाब दिया—“अच्छा हूं।”

फिर जब उन्हें पता चला कि वुशी—चीन का वह शहर, जहां मैं उस वक्त China Daily में काम कर रहा था—में रात के 12 बज चुके हैं और मुझे सुबह 8.30 में ऑफिस पहुंच जाना है, तो वह सॉरी बोलने लगे। भारत में उस वक्त रात के 9.30 बज रहे थे।

हजारों किलोमीटर की दूरी और दो अलग टाइम जोन के बावजूद बातचीत में वही अपनापन था, जो गिरिडीह में बैठकर हुआ करता था।

2010 से जब मैं गिरिडीह से बाहर रहने लगा था, सुदिव्य से इसी तरह फोन पर बात और कभी-कभार मुलाकात होती थी। 2012 में जयपुर में भी उनसे मुलाकात हुई थी, जब वह गिरिडीह के कई लोगों के साथ वहां आए थे।

हम लोगों ने तीन मौकों पर साथ सफर भी किया—2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान, 2019 में जगरनाथ महतो के नामांकन के लिए बोकारो जाते हुए और फिर डॉक्टर दीपक बगैड़िया के बेटे अभिषेक की शादी में बारात के साथ कोलकाता आते हुए।

लेकिन हमारी कहानी सिर्फ इन मुलाकातों और यात्राओं की नहीं थी।

शिबू सोरेन कोर्ट केस से शुरू हुई पहचान

गुरुजी का गिरिडीह कोर्ट में लगातार आना होता था और वहीं हमारी मुलाकात होती रही।

2002 में जब मैं पत्रकारिता में आया और द टेलीग्राफ के लिए काम करना शुरू किया, तो मेरी पोस्टिंग मेरे गृह-नगर गिरिडीह में हुई। तभी से सुदिव्य से मेरी जान-पहचान थी। अगले दो वर्षों में यह पहचान और बढ़ी। 2004 तक हम एक-दूसरे को काफी करीब से जानने लगे थे और कई चीजों को साथ-साथ देखा था।

फिर 2009 में उन्होंने पहली बार विधायक का चुनाव लड़ा। उस समय उनकी पहचान इतनी बड़ी नहीं हो पाई थी और वह 10,000 से भी कम वोट ला पाए थे।

2014 के चुनाव में भी वह चुनाव में थे। उस वक्त मैं गिरिडीह छोड़ चुका था और जयपुर में काम कर रहा था। इसलिए उस समय मेरे पास सिर्फ इतनी जानकारी थी कि वह करीब 10,000 वोटों से हार गए।

2019 में मैं गिरिडीह में था और मैंने उनकी कोशिशों को करीब से देखा। वह सुबह मॉर्निंग वॉक के लिए निकलते और इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों से मिलते। मैंने यह भी देखा कि किस तरह उन्होंने अपनी पहचान सोरेन परिवार के बेहद करीब बनाई थी।

उस चुनाव के दौरान मैंने अपनी रिपोर्ट के जरिए यह दिखाने की कोशिश भी की कि वह सोरेन परिवार के कितने नजदीक पहुंच चुके थे।

फिर वह चुनाव जीत गए।

एक दिन उनका फोन आया। मैं उठा नहीं पाया। करीब 10-15 मिनट बाद जब मैंने कॉल बैक किया तो उन्होंने बताया—“टेलीग्राफ की पुरानी रिपोर्टर, जो अब कांग्रेस की विधायक हैं, वह मेरे साथ हैं। सोचा आपसे बात करा दूं।”

यह छोटी-सी बात भी बताती थी कि राजनीति में आगे बढ़ने के बावजूद उन्होंने पुराने रिश्तों को किस तरह अपने साथ बनाए रखा था।

एक किताब, जिसने हमारी बातचीत को और गहरा किया

विधायक बनने के बाद उन्होंने मुझसे कहा—“आप बाबा (शिबू सोरेन) के ऊपर किताब लिखिए। मैं आपको सारा मटेरियल उपलब्ध कराऊंगा।”

उन्होंने मुझे कई लोगों के कॉन्टैक्ट्स भी दिए। मैंने अपनी तरफ से काम शुरू किया, कई लोगों से संपर्क किया और किताब का synopsis भी तैयार कर लिया। लेकिन बाद में पार्टी ने रांची के एक पत्रकार को यह काम सौंप दिया।

किताब तो नहीं हो पाई, लेकिन उस सिलसिले में सुदिव्य के साथ मेरी कई लंबी बातचीत हुईं।

कई बार उनके घर पर बैठकर घंटों बातचीत हुई। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर के बारे में, गुरुजी के बारे में, अपने दोस्तों के बारे में और कई दूसरी चीजों के बारे में मुझे विस्तार से बताया। उनमें से कई बातों का मैंने अपनी रिपोर्टों में भी जिक्र किया है।

शायद वह जानते थे कि किताब नहीं हो पाई, लेकिन यह भी जानते थे कि उस किताब के लिए मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी।

राजनीति से आगे की दोस्ती

2010 के बाद मैं ज्यादातर समय गिरिडीह से बाहर रहने लगा था। इसलिए पहले जैसी नियमित मुलाकातें संभव नहीं थीं। लेकिन फोन पर हमारा संपर्क बना रहा।

वह बेटी के इलाज के लिए कोलकाता आए, उस दौरान भी हमारी मुलाकात हुई।

स्थानीय या राजनीतिक कोई मामला होता तो वह फोन करते। 1932 के खतियान का मामला हो या UCC बिल का—कई मुद्दों पर वह मुझसे बात करते थे।

2022 में मेरी बहन की दुकान का उद्घाटन भी उन्होंने ही किया था।

2019 में जब कॉरपोरेशन के चुनाव में JMM अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई तो वह थोड़ा परेशान हुए थे। उन्हें चिंता थी कि छह महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में जब वह खुद मैदान में उतरेंगे, तो क्या होगा। शायद उस दौरान अलग-अलग लोगों से लिया गया उनका फीडबैक काम आया और वह पहली बार विधायक बन गए।

2024 के चुनाव के दौरान भी उनसे कई चीजों पर बात हुई। उन्होंने मेरी कई बातों और सुझावों को फॉलो भी किया। मैं फिलहाल उस बारे में ज्यादा डिटेल में नहीं जाना चाहता।

मेरे और उनके बीच के रिश्ते को अगर ठीक से समझना हो तो मैं कहूंगा कि हमारे बीच सिर्फ एक तरह का रिश्ता नहीं था। वास्तव में, तीन तरह के रिश्ते थे।

एक, मैं उनका वोटर था। उनका घर मेरे घर से करीब 500 मीटर की दूरी पर था।

दूसरा, मैं एक पत्रकार था।

और तीसरा, एक दोस्त की तरह भी उनके साथ मेरा रिश्ता था।

हमने साथ में काफी वक्त बिताया। कई दफे उनके साथ सिगरेट शेयर की। घंटों साथ बैठते और देश-दुनिया पर चर्चा करते।

सिगरेट पीने की बात भी उन्होंने एक बार मुझे बड़े सहज तरीके से बताई थी। कहा था—“मैंने अपनी पत्नी को पहली रात ही बता दिया था कि मैं सिगरेट पीता हूं, ताकि बाद में यह मुद्दा न बने हमारे बीच।”

यह बातचीत किसी नेता और पत्रकार के बीच की बातचीत नहीं थी। यह दो दोस्तों के बीच की सहज बातचीत थी।

उनके ऑफिस के लोग हों या पार्टी के लोग—लगभग सभी जानते थे कि हम दोनों के बीच अच्छे रिश्ते थे।

बाद के दिनों में जब वह मंत्री बन गए तो हमारी बातचीत और मुलाकातें कुछ कम हो गईं। मैं भी 2010 के बाद से लगातार बाहर रहने लगा था। लेकिन फोन पर संपर्क बना रहा।

मंत्री बनने के बाद भी अगर वह मेरा फोन उस वक्त नहीं उठा पाते थे तो बाद में जरूर फोन कर लेते थे। मैसेज का जवाब देने की उनकी आदत बहुत ज्यादा नहीं थी, लेकिन फोन पर वह खूब बात करते थे। वह सुनते थे। कई बार खुद फोन करते थे।

हमारे रिश्ते में यह भरोसा हमेशा बना रहा।

उन्होंने एक बार यह वादा भी किया था कि वह eNewsroom को इम्पैनल करवाएंगे।

एक ही शहर, दो अलग रास्ते—और एक साझा राजनीतिक दुनिया

गिरिडीह के दूसरे नेताओं के साथ भी मेरे रिश्ते अच्छे रहे हैं। लेकिन सुदिव्य के साथ मेरा रिश्ता थोड़ा अलग था, क्योंकि मैं उनका वोटर भी था।

और शायद सबसे बड़ा इत्तेफाक यह है कि जब वह राजनीति में सबसे ज्यादा सक्रिय हो रहे थे और जिला अध्यक्ष बने, लगभग उसी दौर में मैं पत्रकारिता में आया। मैं उनके इलाके के पास का रहने वाला भी था।

इसलिए मुझे उनके राजनीतिक और सामाजिक जीवन को बहुत करीब से देखने का मौका मिला।

वह CPI(ML) नेता महेंद्र सिंह के भी बहुत कायल थे। जब वह विधायक नहीं बने थे, तब कहते थे कि उन्हें महेंद्र सिंह की राजनीति पसंद आती है और उन्होंने उनसे बहुत कुछ सीखा है। विनोद सिंह के बारे में भी शुरुआती दिनों में उनके बहुत अच्छे विचार थे।

राजनीति पर हमारी बातचीत हमेशा सिर्फ उनकी पार्टी या उनके चुनाव तक सीमित नहीं रहती थी। हम अलग-अलग नेताओं, विचारों और गिरिडीह की राजनीति पर बात करते थे।

मैं कभी-कभी खुद को उन दोनों के बीच एक तरह का आदमी भी मानता था।

ऐसी बहुत सारी बातें थीं, जो हमारे बीच हुईं और जो शायद बाहर कभी नहीं आईं।

और फिर आया वह आखिरी भाषण

और फिर 5 सितंबर का वह दिन आया।

वह भाषण मेरे सामने हुआ था।

जिस कार्यक्रम में वह शामिल हुए, उस स्कूल—इस्लामिया उर्दू मध्य विद्यालय—के साथ मेरा अपना भी एक रिश्ता था। उस स्कूल में मैंने तीन साल पढ़ाई की है। स्कूल के 100 साल पूरे होने के कार्यक्रम में हम दोनों साथ थे।

वहां उन्होंने अपने छोटे से भाषण में कहा—

“व्यक्ति नश्वर है, संस्थाएं और विचार अमर हैं।”

यह बात उन्होंने मेरे ही सामने कही थी।

उसके बाद अगले दिन, रविवार को मिलने का वादा था।

जो हमेशा के लिए वादा ही रह गया।

और उनसे जुड़े कई सारे वादे, भरोसे और बातचीत की यादें भी उनके साथ ही चली गईं।

आखिर में, मैं उनके बारे में इतना जानता हूं कि उन पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है।

शायद यह विडंबना ही है कि जिस किताब को लिखने का सुझाव उन्होंने मुझे खुद दिया था, वह तो नहीं लिख पाया। लेकिन उनकी और मेरी रिश्ते की यह कहानी लिखने से खुद को रोक भी नहीं पाया।

फिलहाल, उनकी और मेरी दोस्ती की इस लंबी कहानी को एक पोस्ट में समेटने की कोशिश की है।

Shahnawaz Akhtar
Shahnawaz Akhtarhttp://shahnawazakhtar.com
Shahnawaz Akhtar is a senior journalist with over two decades of reporting experience across four Indian states and China. He is the Managing Editor and founder of eNewsroom India, an independent, Kolkata-based digital media platform. His work focuses on human-interest reporting, capturing lived realities, resilience, and voices often ignored by mainstream media

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