क्षत्रिय प्रतिरोध की राजनीति और भविष्य के विकल्प

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[dropcap]आ[/dropcap]म चुनाव 2024 की शुरुआत 19 अप्रैल से हो चुकी है और पहले ही दौर के मतदान ने विशेषज्ञों को ये कहने पर मजबूर कर दिया कि ये मुद्दा विहीन और उत्साहहीन चुनाव है।

हालांकि दरबारी मीडिया और सरकारी विशेषज्ञों ने भाजपा को भारी बहुत दिखाने के लिए पूरी मशक्कत शुरू कर दी थी लेकिन पहले दौर के मतदान से राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से भाजपा के लिए कोई बहुत खुश कर देने वाली खबर नहीं है। भाजपा ने राजपूत प्रतिरोध को हल्के में लिया और नतीजा ये हुआ कि गुजरात में चाहे पुरुषोत्तम रुपाला के बयान से चाहे कुछ हुआ हो या नहीं, उत्तर प्रदेश में राजपूतों की खुली बगावत पार्टी के सपनों पर पानी फेर सकती है। असल मे ये बगावत केवल राजपूतों मे ही नही हुए अपितु जाट, त्यागी और अन्य कई समाजों की भी भाजपा को लेकर ऐसी ही खबर आ रही है। नतीजा यह हुआ कि मेरठ से भाजपा प्रत्याशी अरुण गोविल, जो रामायण धारावाहिक में राम का पात्र बने थे और भगवान राम की तस्वीर लगाये प्रचार कर रहे थे, आखिर में ये बात भी कह गए कि उनकी पत्नी ‘ठकुराइन’ है। सोशल मीडिया पर राजपूतों के असंतोष को लेकर व्यापक खबरें आ रही हैं। विपक्षी दल भी इस घटनाक्रम को गंभीरता से देख रहे हैं और बहुत सी पार्टियों के ट्विटर हैंडल लगातार उनके नेताओं के बयान दिखा रहे हैं। अभी भी राजपूत नेताओ का एक बहुत बड़ा वर्ग भाजपा से इसलिए नाराज दिख रहा है क्योंकि बहुत से बड़े नेताओ के टिकट कट गए। ऐसा लग रहा है कि राजपूत विरोध केवल भाजपा का अंदरूनी मामला हो गया है। नेता कह रहे हैं कि वे भाजपा मे शुरू से ही साथ है और वो चाहते हैं कि भाजपा का हाई कमांड’ उनकी ‘बात’ सुने। बहुत से नेता ये भी कह रहे हैं कि राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ का पार्टी के अंदर सम्मान नहीं हो रहा है और इसलिए वह भाजपा का विरोध कर रहे हैं। अंदर अंदर ये भी नारे हैं मोदी तेरी खैर नहीं योगी तुझसे बैर नहीं। इन सबके बीच जनरल वीके सिंह जो पिछली लोक सभा मे गाजियाबाद से जीते थे और जीत का अंतर प्रधानमंत्री के वाराणसी के मार्जिन से अधिक था, का भाजपा ने टिकट काट दिया। कुछ दिन पूर्व ही जनरल सिंह को उत्तराखंड भेजा गया था जहां पूर्व सैनिकों ने उनसे मिलने का प्रयास किया और रोके जाने पर जमकर विरोध भी किया था। जनरल सिंह ने अपमान के घूट को चुपचाप पी लिया और राजनीति से ही अलग होने की घोषणा कर दी।

भाजपा ने इस प्रश्न को गंभीरता से नहीं लिया और उसका कारण है गुजरात मे राजपूत समुदाय को राजनैतिक तौर पर पूर्णतह हासिए पर चला जाना। राजपूतों की न केवल जमीने गई अपितु नई उभरती हुई शक्तियों पटेल, जैन, मारवाड़ी, ब्राह्मण और बनियों के पास न केवल आर्थिक शक्ति बढ़ गई अपितु हिन्दुत्व के उभार ने पटेलों की राजनीतिक शक्ति को असीमित तोर पर बढ़ाया हालांकि कुछ समय के लिए पटेल भाजपा से अलग हुए लेकिन पुनः भाजपा की और चले गए। गुजरात मे राजपूतों को भाजपा मे रहने के अलावा कुछ नहीं सूझा क्योंकि माधव सिंह सोलंकी ने 1980 जो खाम (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) बनाया था उसे गुजरात की ब्राह्मण बनिया लाबी ने पूरी तर से ध्वस्त कर दिया। क्योंकि खाम केवल जातियो का राजनैतिक गठबंधन था और सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर इन सभी समुदायों के सात आने का कोई प्रयास नहीं किया गया इसलिए सभी बड़ी जातियों को हिन्दुत्व का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पसंद आ गया क्योंकि उसमे मुख्य खलनायक मुसलमान थे। इन जातियों को क्या पता कि बाद मे यही हिन्दुत्व उनकी अपनी राजनीति कतं कर देगा। आज राजपूत सड़क पर हैं, उनकी महिलाये चिल्ला रही हैं लेकिन भाजपा चुपचाप है। ये गुजरात मे गैर राजपूतों को और पैसे के दम पर अपनी शक्ति दिखा रही है। गुजरात मॉडल पूंजीपति बनियों का मॉडल है जो हमारे लोकतंत्र को पैसे के दम पर ठेंगा दिखा रहा है। सूरत से भाजपा प्रत्याशी की निर्विरोध जीत ये दरसाता है कि गुजरात मे पूंजीवाद और ब्रह्मणवाद ने हिन्दुत्व को एक ‘नया मॉडल दिया है जिसने अन्य समुदायों के नेतृत्व को या तो पूरी तौर पर उन पर आश्रित कर दिया है या उन्हे हसिए पर खदेड़ दिया है।

क्या भाजपा से राजपूतों का मोह भंग हो गया है या वे भाजपा से अभी भी ‘उम्मीद’ लगाये बैठे हैं

गुजरात मे केन्द्रीय मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला के बयान के बाद राजपूत समाज अभी भी सड़कों पर है हालांकि रुपाला ने माफी मांग ली है लेकिन राजपूतों मे आक्रोश व्याप्त है और वे रूपला का टिकट काटने की माँग कर रहे हैं जिसे अभी तक भाजपा ने खारिज कर दिया है। गुजरात के राजकोट मे 14 अप्रेल को हुई विशाल रैली मे राजपूत समाज ने अपनी ताकत दिखाई और इसके बाद से ही उनके असंतोष को अन्य दलों द्वारा नोटिस किया गया। ऐसा कहा जा रहा है कि इस रैली मे पाँच लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। अभी गुजरात में एक मित्र से बात हो रही थी तो वह यह बता रहा था कि भाजपा की कम से कम 4 से 5 सीटें फंस चुकी हैं और कुछ स्थानों पर पार्टी ने उम्मीदवार भी बदले हैं। हालांकि गुजरात के राजपूतों का मुख्य गुस्सा पुरुषोत्तम रुपाला पर हैं लेकिन अभी भी अधिकांश भाजपा से ही इस समस्या का समाधान चाहते हैं। मतलब ये, कि यदि रुपाला का टिकट काट दिया जाए तो पार्टी को राजपूत वोट मिल जाएगा। इसके चलते समुदाय की हालत ‘राजनैतिक’ रूप से असहाय दिखाई दे रही है क्योंकि भाजपा नेताओ को मैनेज करने मे जुट गई है और इस संदर्भ मे राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी सिंह से भी लगातार बयान दिलाए जा रहे हैं। साफ है कि गुजरात के राजपूत अभी भी अपनी दिशा तय नहीं कर पाए हैं। राजपूत नेतृत्व की अक्षमता के कारण गुजरात हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बन गए और उन्होंने दूसरी खेती वाली जातियों का भरोषा खो दिया जिसे माधव सिंह सोलंकी ने बड़ी मजबूती से बनाया था। साफ है सोलंकी के खाम (क्षत्रिय, हरिजन आदिवासी, मुसलमान) वाले मजबूत आंदोलन को ब्राह्मण बनिया जैन पटीदार समुदायों ने मिलकर ऐसा खत्म कर दिया कि दूर दूर तक उसका नाम लेने वाला कोई नहीं है। उसके ऊपर हिन्दुत्व के अजेंडे ने बहुत सावधानी से दलित पिछड़ो को बिना नाराज किए उनके आरक्षण को समाप्त कर दिया।

राजपूत प्रतिरोध क्षत्रिय भाजपा लोक सभा चुनाव आम
पिछले साल कैथल के क्षत्रिय महाकुंभ में उमड़ा था राजपूतों का सैलाब (फाइल फोटो) | साभार: पंजाब केसरी

गुजरात और राजस्थान के ठीक अलग, उत्तर प्रदेश में राजपूत नेताओं ने अपनी पंचायत करके भाजपा नेताओं को वोट न देने का सीधा ऐलान कर दिया। सहारनपुर, कैराना, बिजनौर और मुजफ्फरनगर से उन्होंने विपक्षी उम्मीदवारों को समर्थन कर दिया। उसके नेताओं ने कहा है कि वे सभी उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाकों में भी जाएंगे और समाज को भाजपा के खिलाफ वोट करने को कहेंगे। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने पिछले चुनावों में बहुत राजपूत नेताओं को टिकट दिए थे और वे सभी चुनावों मे जीत भी गए थे। भाजपा ने ब्राह्मण, बनिए और राजपूतों को खूब टिकट बांटे। सभी नेता आग उगल उगल कर बाते कर रहे थे। अब जनरल वीके सिंह हो या योगी आदित्यनाथ, उन्होंने राजपूतों के लिए क्या किया ये पता नहीं लेकिन आज भी अधिकांश राजपूतों का ‘दुख’ इस बात को लेकर है कि भाजपा मे उनके बड़े’ नेताओ का सम्मान नहीं करते या राजपूत नेताओ को पार्टी मे किनारे किया जा रहा है। सहारनपुर से कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद, कैराना से समाजवादी पार्टी की इकरा हसन और मुजफ्फरनगर से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हरेन्द्र मालिक को राजपूतों ने सीधे समर्थन देकर अपनी ताकत का एहसास करवा दिया। नतीजे चाहे जो भी हो लेकिन प्रथम चरण के मतदान के बाद भाजपा का नेतृत्व अब संघ के साथ हरकत मे है। राजपूत मुस्लिम समीकरण भाजपा और हिन्दुत्व के लिए भविष्य मे भी बहुत बड़ा खतरा हो सकता है और इसलिए उसे तोड़ने के लिए ही अलग अलग तरीके से मुस्लिम विरोधी बयानों लगातार आने शुरू हुए हैं और कोशिश की जा रही है कि चुनाव दोबारा से हिन्दू मुसलमान के फ्रेम मे हो ताकि भाजपा उसका लाभ ले सके। अलीगढ़ मे चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने योगी आदित्यनाथ कि भूरि भूरि प्रशंसा की और कहा कि उनके नेतृत्व मे उत्तर प्रदेश दिन दूनी रात चौगनी प्रगति कर रहा है। उन्होंने योगी को बुलडोज़र से जोड़ने की आलोचना की और कहा उत्तर प्रदेश मे बहुत अधिक काम हुआ है। नरेंद्र मोदी के हृदय परिवर्तन का कारण और कुछ नही अपितु उनके लॉयल वोट बैंक को वापस लाने के लिए है। राजपूतों मे ये बात जा चुकी है कि मोदी-शाह की गुजराती जोड़ी उनके सभी बड़े नेताओ का राजनैतिक करिअर खत्म कर देना चाहती है ताकि उन्हे कोई चुनौती ही न रहे। उत्तर प्रदेश के एक चुनाव क्षेत्र मे मोदी द्वारा योगी आदित्यनाथ का अपमान सभी ने देखा और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जब पूर्वाञ्चल एक्स्प्रेस हाई वे मे भारतीय वायुसेना के विमानों की लैन्डिंग का एक कार्यक्रम हुआ तो मोदी ने योगी को अपने साथ गाड़ी मे नहीं बैठाया। लोगों ने देखा कि मोदी अपने लाव लक्सर के साथ जनता का अभिवादन कर रहे थे और योगी उनसे पचास मीटर पीछे पैदल चल रहे थे। देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के अपमान को सभी देख रहे थे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की पार्टी में आज क्या स्थिति है, सब जानते हैं।

क्या राजपूतों के ‘विद्रोह’ का कुछ असर पड़ेगा

भाजपा के कई नेता ये बताना चाह रहे थे कि राजपूतों के संख्या बहुत कम है इसलिए उनके विरोध का असर नहीं होगा। हालांकि गुजरात मे राजपूत नेतृत्व पहले ही बिखर चुका था लेकिन दूसरे राज्यों मे वे पहले से ही अलर्ट हो गए। असल मे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ पर अक्सर ठाकुरवादी होने के आरोप लगे लेकिन ये सभी नेरेटिव बनाने की कवायद होती है। जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे तो उनपर भी ऐसे ही आरोप लगे थे। बस बनियों और ब्राह्मणों पर ऐसे आरोप नहीं लगते। अभी उत्तर प्रदेश मे ही देवरिया, गोरखपुर, बस्ती, संतकबीरनगर और अन्य स्थानों पर भाजपा ने केवल ब्राह्मणों को टिकट दिया है लेकिन किसी ने भी एक शब्द नहीं कहा। गाज़ियाबाद मे कांग्रेस ने एक ब्राह्मण और भाजपा ने एक बनिया को टिकट दिया है जिस सीट पर राजपूतों की संख्या 5 लाख से अधिक है। राजनाथ सिंह भी किसी समय यहाँ से चुनाव लड़े थे लेकिन अब उनका चुनाव क्षेत्र लखनऊ है जहा शहरी क्षेत्र मे उन्हे अपने राजपूत होने से बहुत लाभ नहीं मिलता इसलिए अब वह समाज की चिंताओ को दूर से ही नमस्कार कर देते हैं। इस बार लखनऊ से राजनाथ की रह आसान नही होगी। उत्तर प्रदेश मे राजपूत समाज अपने आप को दलित और पिछड़े वर्ग के साथ जोड़ रहा है। वैसे राजस्थान और मध्य प्रदेश मे राजपूतों का एक बहुत बड़ा राजनैतिक वर्ग बामसेफ के साथ जुड़ा है और न केवल जात-धर्म की बात हो रही अपितु बुद्ध धर्म का रास्ता भी सोचा जा रहा है। राजपूतों की समझ आ चुका है कि उनका इस्तेमाल किया गया। यही बात आज हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश मे जाट समाज भी कह रहा है। ये सभी बिरदारिया केवल अपने आप तक सीमित नहीं है अपितु एक दूसरे के साथ सहयोग भी कर रही हैं। सहारनपुर के जनपद नानौता मे हुई पंचायत के बाद ही इमरान मसूद, इकरा हसन, हरेंद्र मलिक को समर्थन देने की बात हुई। आज ऐसी पंचायाते पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे हो रही हैं जिसका इंडिया गठबंधन को लाभ मिलेगा। कई स्थानों मे बसपा को भी लाभ हो सकता है क्योंकि टिकट वितरण के मामले मे सुश्री मायावती ने अधिक राजनैतिक परिपक्वता का परिचय दिया है लेकिन बसपा नेरटिव की लड़ाई मे पीछे रह गई लगती है फिर भी उसका कैडर उसकी सबसे बड़ी ताकत है। राजपूतों के प्रभाव क्षेत्र मे बुंदेलखंड, और मध्य प्रदेश के बहुत से क्षेत्र आते हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल के कुछ क्षेत्रों मे उनका प्रभाव है। क्योंकि समुदाय पिछले कुछ चुनावों से भाजपा के साथ जुड़ गया था लेकिन अगर उसने विद्रोह किया है तो भाजपा को इसका नुकसान झेलना पड़ेगा। राजपूत अब हर जिले मे स्थानीयता के अनुसार अपनी रणनीति बना रहे हैं और उसे अनुसार वोट करेंगे।

कांग्रेस से कैसे दूर हुए राजपूत

असल मे राजपूतों के लिए कांग्रेस सबसे महत्वपूर्ण पार्टी थी और उनके बड़े नेता हमेशा सामाजिक न्याय और समाजवादी विचारधारा से जुड़े रहे। जनता पार्टी की असफलता के बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व मे कांग्रेस जब पुनः केंद्र की सत्ता मे आई तो श्रीमती इंदिरा गांधी ने एक नया प्रयोग किया। उत्तर प्रदेश मे विश्वनाथ प्रताप सिंह, बिहार मे चंद्र शेखर सिंह, मध्य प्रदेश मे अर्जुन सिंह, हिमाचल मे वीरभद्र सिंह को मुख्य मंत्री बनाया गया। इधर गुजरात मे माधव सिंह सोलंकी जो कोली समाज से थे, उन्हें मुख्य मंत्री बनाया।

माधव सिंह सोलंकी ने खाम (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी, मुस्लिम) अलायंस बनाया जिसने कांग्रेस को गुजरात में अभूतपूर्व बहुमत मिला था। पार्टी का वोट प्रतिशत 55% से ऊपर था और कुल 182 सीटों मे से पार्टी को 149 सीटें मिली। श्रीमती गांधी ने वही खाम प्रयोग उत्तर भारत मे भी किया लेकिन बिना कोई शोर किये। राजनीति मे समीकरण सफल होते है लेकिन बहुत समय तक वही टिक पाएंगे जिनका वैचारिक आधार मजबूत होगा। चुनावों के बाद ही गुजरात मे आरक्षण विरोधी आंदोलन शुरू हो गया और यहीं से गुजरात की ब्राह्मण बनिया जैन और पटीदार आदि जातियों ने खाम के खात्मे की तैयारी भी कर ली लेकिन उसके लिए अभी भी पिछड़े वर्ग और दलित आदिवासियों को तोड़ना जरूरी थे। नरेंद्र मोदी का गुजरात मॉडल मात्र बिजनस मॉडल नहीं था। ये वो मॉडल भी है जो जातियों के अंतर्विरोध को समझा और खाम जैसे ताकतवर आंदोलन को ध्वस्त कर दिया। खाम के खात्मे के बाद मोदी ने पटेल समाज की सत्ता पर चोट की लेकिन सभी बाते आसानी से नहीं हो सकती और इसलिए पटेल लोग अन्तः भाजपा के पास आ गए। आरक्षण विरोधी शक्तियों को अब दलित पिछड़े आदिवासियों की आवश्यकता थी इसलिए अब चुनावी हिन्दू बनाकर उनके गुस्से को मुसलमान विरोधी आंदोलन का हिस्सा बना दिया। आज गुजरात मे खाम का नामलेवा भी नहीं है और इसका कारण है कि कोई वैचारिकी और सांस्कृतिक मिलन के ऐसी सफलताए मात्र राजनीतिक तिकड़मबाजी ही मानी जाती है और जब भी लोगों को संस्कृतिक विकल्प दिखेगा वे उस तरफ दौड़ पड़ते हैं। हिन्दुत्व की लड़ाई मे परम्पराओ की महानता का वर्णन है और राजनीति मे भगवान और धर्म की एंट्री है इसलिए वो आसान नजर आती यही क्योंकि जब आप बिना काम किये पूरी बेशर्मी के साथ चुनाव जीत सकते हैं तो आपको लोगों का काम करने की आवश्यकता नहीं है। जब नेता और भगवान आपकी सफलता की गारंटी हैं तो लोगों को जनता के सवाल उठाने की फुरसत कहा।

दूसरी ओर, उत्तर भारत में राजपूत कांग्रेस से अलग होना शुरू हुए जब विश्वनाथ प्रताप सिंह जो राजीव सरकार में वित्त मंत्री थे, के खिलाफ कांग्रेस ने एक्शन लिया। वीपी सिंह अपनी ईमानदारी और वैचारिक निष्ठा के लिए माने जाते थे और कांग्रेस उस दौर में अंबानी की पार्टी नजर आ रही थी। वीपी के उठाए प्रश्नों पर पार्टी ने उनका बहुत अपमान किया। जनता ने वो सब देखा। ये बात भी हकीकत है कि वीपी ने अपने को कभी राजपूत या क्षत्रिय नेता नहीं कहा क्योंकि उनके समर्थन में जाति से बाहर ही अधिकांश लोग थे। वीपी को कांग्रेस इन 1987 में पार्टी से निष्कासित कर दिया। कांग्रेस से जो भी लोग बाहर निकले थे या निकाले गए थे वे कभी कामयाब नहीं हुए लेकिन वी पी अकेले ऐसे थे जिन्होंने बिना कहे पार्टी के अहंकारी नेतृत्व की पोल खोल दी। ये दुर्भाग्य था कि देश की सबसे पुरानी पार्टी, वीपी को समझ नहीं पाई। उसके बाद राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनने पर वीपी ने मण्डल रिपोर्ट को लागू करने का फैसला किया तो संसद में राजीव गांधी ने उसके विरुद्ध बहुत लंबा भाषण दिया और उनके विरुद्ध चंद्रशेखर को समर्थन दे दिया। वो फैसला काँग्रेस के लिए बेहद नुकसान वर्धक शामिल हुआ। वीपी की सरकार तो गिर गई लेकिन कांग्रेस से हासिए के समुदाय अलग होते चले गए और बाबरी मस्जिद के बाद पीवी नरसिंहराव के आते आते कांग्रेस पर ब्राह्मणों को कब्जा हो चुका था लेकिन पार्टी से दलित, मुसलमान, पिछड़ा अलग हो चुका था। एक और हकीकत थी कि राजपूत भी कांग्रेस से अलग हो चुका था लेकिन उसे किसी ने ये कह कर महत्व नहीं दिया कि इनकी संख्या बहुत कम है। कांग्रेस में अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह जैसे लोग थे जो संविधान और जातियों के समावेशीकरण की बात कहते रहे। लेकिन कांग्रेस के हाई कमांड को अर्जुन सिंह बहुत ‘महत्वाकांक्षी’ लगे। जिस व्यक्ति ने पंजाब में शांति और राजनैतिक प्रक्रिया को शुरू करने के राजीव गांधी के आगे करने लिए सफलतापूर्वक काम किया उसे भी कांग्रेस की ब्राह्मण लॉबी बदनाम करने मे तुली हुई थी। अर्जुन सिंह ने हाइयर एजुकेशन मे पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की सुविधा प्रदान की लेकिन उनके सेक्यलर चरित्र से कांग्रेस मे बहुतों को परेशानी थी। यूपीए की सरकारों के समय कांग्रेस ने पूरी बेशर्मी से ब्राह्मण नेताओ को सोनिया गांधी की कोटरी मे बैठाया। धीरे धीरे कांग्रेस ऐसे लोगों की जमात बन गई जो सड़क पर संघर्ष करने को तैयार नहीं थी और जिसमे वो लोग निर्णय ले रहे थे जिनका जनता मे कोई वजूद नहीं था। अर्जुन सिंह जैसे नेता किनारे हो गए और प्रणब मुखर्जी जैसे बिना बेस के नेता बन गए। वीपी सिंह, अर्जुन सिंह से लेकर दिग्विजय सिंह ने कभी आरएसएस से कभी समझौता नहीं किया जबकि प्रणब मुखर्जी बंगाल मे पार्टी को कुछ दे नहीं पाए और बाद के दिनों मे मोदी भक्ति मे लीन हो गए और आरएसएस से भी मिल गए। उनका परिवार किस तरीके से गांधी परिवार को बदनाम कर रहा है ये सब जानते हैं। कांग्रेस को आज कमजोर करने मे ऐसे चालक नेताओ का हाथ है और आज वे सभी धीरे धीरे भाजपा की और जा चुके हैं या जा रहे हैं। पार्टी ने भी आज तक राजपूत नेताओं की तरफ कोई हाथ नहीं बढ़ाया।

क्या विकल्प है राजपूतों के समक्ष

राजपूतों के पास विकल्प क्या है? भाजपा को सुधारने का विकल्प तो उनका नहीं है क्योंकि ये उनकी पार्टी कभी थी ही नहीं। भाजपा शुद्ध रूप से पूंजी परस्त और पुरोहितवादी पार्टी है जिसे ग्राउन्ड मे मजबूत करने के लिए बाकी किसान मजदूर जातियों की जरूरत पड़ी और उसका उसने ताश के पत्तों के तरह इस्तेमाल किया और उसके बात फेंक दिया। राजपूतों का नैसर्गिक मेल केवल बहुजन समाज से हो सकता है और उसका कारण साफ है। राजपूत एक किसान जाति है और उसके अलावा उसकी उपस्थिति सेना और अर्धसैनिक बालों मे रही है। भारत के अंदर कृषक जातियों का ऐसा ही हाल है। खेत मे किसान सीमा पर जवान। सरकारी नौकरियों, न्याय पालिका, मीडिया, अकडेमिया, प्राइवेट सेक्टर मे उनका प्रतिनिधित्व बेहद कम है और इसके लिए जातिगत जनगणना के लिए उन्हे दलित पिछड़ो आदिवासियों अल्पसंख्यकों के साथ खड़े दिखना चाहिए। सांप्रदायिक शक्तियों के लिए खड़े होकर राजपूतों को सिवाय गालियों और अपमान के बाकी कुछ नहीं मिलने वाला। जिन शक्तियों के साथ वे खड़े हैं आज संपाति और संशधनों को सत्ता सहयोग से अपने नियंत्रण मे कर चुके हैं। पुराने समय मे जमींदार और सामंती शब्दों का जिनके लिए आज भी इस्तेमाल होता रहता है वे पूँजीपतियों और पुरोहितवादियों के भूमि अधिग्रहण चाहें बड़ी कॉम्पनियों के नाम पर हो या मंदिरों, मट्ठों और धर्मस्थलों के नाम पर हो, को वेल्थ क्रीऐशन कहा जाता है। किसानों को भूमिहीन कर अंबानी अदानी को करोड़ों एकड़ जमीन देने को जमींदारी नही कहा जा रहा। धर्मस्थलों के नाम पर पुरोहितों के पास इकट्ठा लाखों एकड़ जमीने, गौ शालाओ के नाम पर हड़पी हजारों एकड़ जमीन के मालिक जमींदार नहीं है क्योंकि वे तो धर्म कर्म का काम कर रहे हैं। ये बिजनस है समझ लीजिए और उनमे कौन सी जातिया है उनकी लिस्ट निकाल कर देख सकते हैं। इसलिए जातिगत जनगणना और जिस एक्स रे की बात राहुल गांधी कर रहे हैं उससे राजपूतों/क्षत्रियों को कोई अब्जेक्शन नहीं होना चाहिए।

बहुजन आंदोलन और बौद्ध धर्म संस्कृति

क्षत्रिय या राजपूत समाज अब बहुजन आंदोलन से जुड़े। पुरोहितवादी संस्कृति मे उसे कमेरा समाज से दूर हटाया गया। बुद्ध के मानववादी सिद्धांत को मानकर यदि वे आगे बढ़ेंगे तो आगे भविष्य मे देश के दूसरे मेहनतकश लोगों के साथ आगे बढ़ेंगे। बहुजन समाज मे बाबा साहब के आंदोलन से जुडने पर वे अपने पूर्वजों के सपनों से जुडेने। याद रखिए, विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने को सामाजिक न्याय की शक्तियों के साथ जोड़ा तो उन्हें बहुत बदनामी मिली। उनका मज़ाक बनाया गया। उन्हें गालियां पड़ी लेकिन वह अपने बोले और किये पर कायम रहे। आज राजपूतों की समझ मे जो आ रहा है कि उनके साथ अन्याय हुआ है वो इस बात को पुष्ट कर्ता है कि वीपी सिंह ने जो किया वह कितना सही था। राजपूतों का हिस्सा कोई दलित पिछड़ो आदिवासियों ने नहीं खाया। इस बात को समझ लेंगे तो अच्छा रहेगा। अपने आंदोलन को सामाजिक न्याय से जोड़े और जातिगत हिंसा और वैमनस्य का प्रतिकार करें। सबको साथ लेकर चलने मे ही समाज की भलाई है। इस समय अपने अपने क्षेत्रों मे चुनावों का बहिष्कार न करें बल्कि अपने वोट का इस्तेमाल देश मे बदलाव की खातिर करें। वोट हर एक का निजी मामला है लेकिन इसकी शक्ति का प्रयोग करे। आज देश को बदलाव की जरूरत है इसलिए अधिक से अधिक संख्या मे वोट करें। याद रखे, वोट बॉयकोट और नोटा से कोई भी बदलाव नहीं आ सकता बल्कि वो उन्ही ताकतों को मजबूत करेगा जिसके विरुद्ध आप संगरक्ष कर रहे हो। ये भी सभी समझ जाए कि लोकतंत्र केवल एक जाति का नहीं है और यहाँ सभी को आपस मे तालमेल करके रहना है। धर्म और जाति के नाम ओर लड़ाने वालों से सावधान रहें। पूंजीवादी पाखंडवादी शक्तियों की सेवा में लगे नेता आपकी जाति के हो सकते हैं लेकिन आपके समाज के हितकारी नहीं हो सकते। सवाल पूछे कि देश के सत्ता प्रतिष्ठान, मीडिया, न्यायपालिका, सिनेमा, कला, आदि मे आप कहाँ हैं। इन सवालों पर आपके महान’ नेताओं ने क्या कहा और किया? केवल किसी के मंत्री या प्रधानमंत्री बनने से खुश होने की आवश्यकता नहीं है। आज जरूरत है ऐसे नेतृत्व की जो समाज को नफरत से बचाए और सबको साथ लेकर चले।

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  1. बहुत ही सारगर्भित समसामयिक लेखन सभी के लिये अनुकरणीय। ????????????????????????????????????????????????????????????

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