रांची/कोलकाता: झारखंड में 23 फरवरी को हुए 48 नगर निकायों के चुनाव के परिणाम अब सामने आ चुके हैं। इन नतीजों से एक अहम राजनीतिक संकेत मिला है—राज्य के शहरी इलाकों में भी भाजपा की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है। खासकर बड़े नगर निगमों के परिणामों ने यह दिखाया कि मुकाबला अब एकतरफा नहीं रहा।
नौ बड़े नगर निगमों में हुए मेयर चुनाव में भाजपा समर्थित उम्मीदवार सिर्फ तीन जगह ही जीत दर्ज कर सके। तीन जगह निर्दलीय उम्मीदवार जीते, दो जगह झामुमो समर्थित और एक जगह कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार ने बाजी मारी। यह भी महत्वपूर्ण है कि भाजपा के खिलाफ कोई औपचारिक गठबंधन चुनाव नहीं लड़ रहा था, बल्कि गठबंधन की पार्टियां अलग-अलग मैदान में थीं। इसके बावजूद भाजपा को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली।
रांची से गिरिडीह तक: बड़े शहरों में भाजपा को झटके
रांची में भाजपा को सफलता जरूर मिली, लेकिन वहां का गणित दिलचस्प रहा। कांग्रेस ने मेयर पद पर अपना उम्मीदवार उतारा था और झामुमो ने भी अलग से प्रत्याशी खड़ा किया। झामुमो उम्मीदवार को मिले वोट भाजपा समर्थित रोशनी खलखो की जीत के अंतर से ज्यादा थे। यानी अगर विपक्ष एकजुट होता, तो नतीजा अलग हो सकता था। इसके बावजूद यह साफ दिखा कि वोटों के बिखराव के बावजूद भाजपा को बड़ी बढ़त नहीं मिल पाई।
गिरिडीह नगर निगम में झामुमो की प्रमिला मेहरा ने भाजपा समर्थित उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराया। यहां भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता बाबूलाल मरांडी ने खुद कैंप किया था और पार्टी ने डॉक्टर शैलेन्द्र चौधरी को पूरा समर्थन दिया था। लेकिन झामुमो की मजबूत जमीनी पकड़ ने भाजपा की रणनीति पर भारी पड़ी।
राजधनवार (गिरिडीह) में अध्यक्ष पद पर सीपीआई(एमएल) के विनय संध्या लिया की जीत ने भी सबका ध्यान खींचा। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व सांसद रवींद्र राय ने वीडियो जारी कर अपील की थी, लेकिन इसके बावजूद भाजपा समर्थित खेमे को सफलता नहीं मिली।
देवघर में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पूरी ताकत लगाई थी, फिर भी मेयर पद पर भाजपा को जीत नहीं मिली। यहां रवि रावत मेयर चुने गए और उनकी मां वार्ड पार्षद बनीं। इससे साफ हुआ कि वार्ड स्तर से लेकर मेयर पद तक भाजपा अपने प्रतिद्वंद्वियों को रोकने में सफल नहीं रही।
मानगो, मेदिनीनगर और अन्य शहरों का संदेश
मानगो (जमशेदपुर) में पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता, जो कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार थीं, ने मेयर पद पर जीत दर्ज की। यह खास इसलिए माना जा रहा है क्योंकि विधानसभा चुनाव में बन्ना गुप्ता को हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन एक साल के भीतर उनके परिवार की वापसी हो गई।
भाजपा को रांची के अलावा मेदिनीनगर और आदित्यपुर में सफलता मिली। लेकिन हजारीबाग, धनबाद जैसे बड़े शहरों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। मधुपुर, जुगसलाई, बेरमो, रामगढ़ और चास जैसे इलाकों में भी भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को जीत नहीं मिल सकी।
शहरी वोटर का बदलता रुझान?
राज्य में भाजपा पहले ही दो बार विधानसभा चुनाव हार चुकी है और सत्ता से बाहर है। हालिया लोकसभा चुनाव में भी उसकी सीटें कम हुईं। अब शहरी निकाय चुनाव के नतीजे यह संकेत दे रहे हैं कि शहरों में भी पार्टी की पकड़ कमजोर हो रही है।
चुनाव के बाद यह चर्चा भी रही कि भाजपा ने कई जगह नए और कम अनुभवी चेहरों को टिकट दिया। कई पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी और बगावत ने भी नुकसान पहुंचाया। वहीं झामुमो ने अपेक्षाकृत मजबूत और स्थानीय स्तर पर सक्रिय उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिसका फायदा उसे मिला।
भाजपा ने चुनाव प्रचार में राष्ट्रीय मुद्दों, राष्ट्रवाद और ‘जय श्री राम’ जैसे नारों पर ज्यादा जोर दिया, जबकि स्थानीय समस्याओं—पानी, सड़क, सफाई और नगर सेवाओं—पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। विश्लेषकों का मानना है कि शहरी मतदाताओं ने इस बार स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी।
बैलट पेपर से चुनाव और बड़ी भागीदारी
इस बार चुनाव ईवीएम की बजाय बैलट पेपर से कराए गए। लंबे समय बाद बैलट पेपर से मतदान हुआ, जिससे कुछ जगह मतगणना में देरी जरूर हुई, लेकिन ज्यादातर उम्मीदवार इस प्रक्रिया से संतुष्ट नजर आए।
करीब 44 लाख मतदाता इस चुनाव में शामिल हुए, जिनमें 21 लाख से ज्यादा महिलाएं थीं। 48 शहरी निकायों में कुल 1087 पदों के लिए मतदान हुआ। महिलाओं की बड़ी भागीदारी भी इन चुनावों की एक अहम विशेषता रही।
कुल मिलाकर, झारखंड के शहरी निकाय चुनावों ने यह संकेत दिया है कि राज्य की राजनीति में मुकाबला अब और ज्यादा खुला हो गया है। भाजपा के लिए यह नतीजे चेतावनी की तरह हैं, जबकि झामुमो, कांग्रेस और निर्दलीयों के लिए यह मनोबल बढ़ाने वाला परिणाम माना जा रहा है। आने वाले समय में इसका असर राज्य की बड़ी राजनीतिक लड़ाइयों पर भी दिख सकता है।


