दुनिया के बेशकीमती पत्थर अलेक्जेंड्राइट के लिए आदिवासी किसानों की जमीन पर कब्जा, न मुआवजा, न नौकरी

सरकार ने मुझे कुछ दिन के लिए खदान का गार्ड बनाया, पर मेहनताना कभी नहीं दिया। फिर कुछ दिनों बाद अफसरों ने नौकरी से भी हटा दिया। आज भी खदान क्षेत्र की जमीन का पट्टा मेरे नाम पर है, फिर भी मुझे अपने खेत में खेती तो दूर पैर रखने की मनाही है। सरकार ने सालों पहले मेरी जमीन को कटीले तारों से घेर दिया गया था। सरकार उतनी ही जमीन दे दे जितनी हमसे छीनी है तो मेहरबानी होगी। साथ ही मनरेगा के तहत मुझे 60 दिन के काम की मजदूरी नहीं मिली है, सरकार उसे भी हमें दिला दे

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गरियाबंद/रायपुर: अविभाजित मध्यप्रदेश और वर्तमान छत्तीसगढ़ के एक गांव में किसानों के खेतों में बरसों पहले बेशकीमती पत्थरों के खजाने का पता चला था। तब इन जमीनों का अधिग्रहण करने के लिए किसानों को अच्छे मुआवजे और सरकारी नौकरी देने का भरोसा सरकार की ओर से दिया गया। तब इस उम्मीद से कि उनकी साधारण सी गुजर रही जिंदगी बेहतर होगी, उन्होंने अपना जमीने सरकार के हवाले कर दी, लेकिन बाद में न तो सरकारी नौकरी मिली और न ही मुआवजा। यही वजह है कि पिछले कई वर्षों से ये किसान मजदूरी करने के लिए विवश हैं। वहीं इस मामले में सरकारी पक्ष की बात करें तो संबंधित क्षेत्र को शासन स्तर पर अधिसूचित करने की कार्रवाई की जा रही है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 240 किलोमीटर दूर गरियाबंद जिले के सेंदमुड़ा गांव में आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले प्यारेलाल सिंह अपने पांच सदस्यों के परिवार के साथ मिट्टी के छोटे घर में रहते हैं।

बात आज से कोई तीस साल पहले की है, जब प्यारेलाल सिंह करीब दो एकड़ के खेत में धान उगाते थे। इस बीच इनके खेत बहुमूल्य पत्थर (अलेक्जेंड्राइट) निकला, जिसके वारे में हम आगे वताएंगे। इसकी सूचना जब स्थानीय खनन अधिकारियों को लगी तो वे मौके पर पहुंचे। प्यारेलाल के मुताबिक, ”तब बाबू लोगों (अफसरों) ने बोला था कि तुम्हारे खेत में दुनिया के सबसे कीमती पत्थरों का खजाना गढ़ा है, यह पूरी जमीन अरबों रुपए की है, जो अब सरकार के काम आएगी। यह जमीन हमें दे दो, तुम्हारी नौकरी लग जाएगी और रोजीरोटी के लिए कहीं भटकने की जरुरत भी नहीं। तुम्हें तुम्हारी ही जमीन पर गार्ड बनवा देंगे। जमीन तो अब तुम्हें वैसे भी मिलने वाली नहीं, इसलिए 12 हजार रख लो। इसके बाद सरकार ने मुझे कुछ दिन के लिए खदान का गार्ड बनाया, पर मेहनताना कभी नहीं दिया। फिर कुछ दिनों बाद अफसरों ने नौकरी से भी हटा दिया। आज भी खदान क्षेत्र की जमीन का पट्टा मेरे नाम पर है, फिर भी मुझे अपने खेत में खेती तो दूर पैर रखने की मनाही है। सरकार ने सालों पहले मेरी जमीन को कटीले तारों से घेर दिया गया था। सरकार उतनी ही जमीन दे दे जितनी हमसे छीनी है तो मेहरबानी होगी। साथ ही मनरेगा के तहत मुझे 60 दिन के काम की मजदूरी नहीं मिली है, सरकार उसे भी हमें दिला दे।” प्यारेलाल की तरह की इस गांव में अनुज गोंड़ और प्यारे सिंह की भी हालत कुछ ऐसी ही है और उन्र्हें भी सरकार से उचित मुआवजे का इंतजार है।

गरियाबंद छत्तीसगढ़ आदिवासी अलेक्जेंड्राइट
ओड़िशा से लगा गरियाबंद रत्नों के भंडार के मामले में अमीर होने के बावजूद छत्तीसगढ़ के एक अति पिछड़े जिले के रुप में जाना जाता है। फोटो : त्रिलोचन मानिकपुरी

कितना बेशकीमती है अलेक्जेंड्राइट

दरअसल, अलेक्जेंड्राइट प्रकाश की प्रकृति के अनुरुप रंग बदलने वाला एक बेशकीमती रत्न होता है, जो प्रकाश के हिसाब से कभी हरा, भूरा, बैंगनी और कभी लाल हो जाता है। वैज्ञानिक इसे ‘अलेक्जेंड्राइट प्रभाव’ कहते हैं। बताया जाता है कि सबसे पहले इन्हें नल्स गुस्टॉफ नोरडेनस्कोल्ड के वैज्ञानिक ने वर्ष 1831 में रूस के यूराल पर्वत से खोजा था। रूस के जार एलेक्जेंडर द्वितीय के नाम पर इसका नाम रखा गया। रुस में 5 कैरेट (1,000 मिलीग्राम) तक का अलेक्जेंड्राइट पाया जाता है। हालांकि, पिछले सालों में ब्राजील में भी इसी वजन का अलेक्जेंड्राइट मिल चुका है। इसके अलावा भारत, श्रीलंका, मेडागास्कर और तंजानिया में अधिकतम 3 कैरेट तक का अलेक्जेंड्राइट पाया जाता है।

तत्कालीन मध्यप्रदेश के राज्य खनिज विभाग के सेवानिवृत्त क्षैत्रीय प्रमुख अधिकारी एन. के. चंद्राकर बताते हैं, ”80 के दशक के आखिरी सालों में शासन स्तर पर यह पता चला कि वहां (सेंदमुड़ा में) अलेक्जेंड्राइट है। 1993 में इस पूरे क्षेत्र को पुलिस कस्टडी में लिया गया था और तब मध्य प्रदेश राज्य खनिज विभाग को सौंप दिया गया था। उसी वर्ष विभाग की देखरेख में एक सर्वे भी किया गया था, लेकिन सरकारी अनुमति नहीं मिलने से उत्खनन नहीं किया जा सका।” आधिकारिक तौर पर तब विभाग ने बताया था कि उस खेत से 1918 बोरी मिट्टी खोदी गई थी और 307 ग्राम अलैक्जेंड्राइट निकाला गया था। दूसरी तरफ, ग्रामीणों का मानना है कि बताई गई मात्रा से कई गुना ज्यादा मिट्ठी खेत से निकाली गई थी। इस तरह खेत को खदान बना दिया गया था।

वहीं, गरियाबंद जिले में देवभोग जनपद के उपाध्यक्ष देशबंधु नायक उत्खनन की अवैध गतिविधियों के बारे में बताते हैं, ”विभाग के अधीन होने के बावजूद पांच वर्षों तक (1993 से 1998 तक) यहां ओडिश के खनन माफिया की ओर से अवैध खनन होता रहा। हालांकि, बाद में गांव वालों के विरोध करने पर यह बंद हो गया। गांव वाले ही खदान की रक्षा कर रहे हैं, सरकार ने तो यहां से गार्ड तक हटा लिए हैं।”

बता दें कि छत्तीसगढ़ का गरियाबंद जिला बहुमूल्य रत्नों के भंडार के रुप में जाना जाता है। यहां के पायलीखंड क्षेत्र में हीरे की खदानें भी हैं। किंतु, सरकार जहां इन रत्नों की अच्छी तरह से सुरक्षा नहीं कर पा रही है वहीं अन्य राज्यों के रत्न तस्कर और माफिया इस इलाके में अवैध उत्खनन करके इन रत्नों को हासिल कर रहे हैंथ गरियाबंद के पुलिस अधीक्षक भोजराम पटेल के मुताबिक पिछले एक वर्ष में गरियांबंद जिले में हीरा तस्करों से लगभग एक करोड़ रुपए के 612 नग हीरे बरामद हो चुके हैं।

गरियाबंद छत्तीसगढ़ आदिवासी अलेक्जेंड्राइट
प्यारेलाल का खेत जहां अस्सी के दशक के आखिरी सालों में शासन स्तर पर यह पता चला कि यहां अलैक्जेंड्राइट का बहुमूल्य रत्न है। फोटो: त्रिलोचन मानिकपुरी

फिर दिलाई जा रही मुआवजा देने की आस

इस बारे में छत्तीसगढ़ राज्य खनिज संसाधन विभाग के अपर सचिव संजय कनकने बताते हैं, संबंधित क्षेत्र को शासन स्तर पर अधिसूचित करने की कार्रवाई की जा रही है। इसके लिए गरियाबंद जिले के खनिज विभाग ने देवबंद के तहसीलदार को नक्शा व खसरा बनाने के लिए पत्र जारी किया गया है। जब एक बार यह कार्य हो जाएगा तो किसानों के लिए मुआवजे के निर्धारण की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी।

छत्तीसगढ़ के गर्भ में बेशुमार रत्न

सोना और हीरा: बीते साल सारंगढ़ जिले के सोनखान में सोने की खदान की नीलामी के कारण छत्तीसगढ़ चर्चा में रहा, लेकिन प्रदेश हीरे, पारदर्शी पन्ना, रक्तमणि, तुरमली, गुलाबी स्फटिक, मणिक और नीलम जैसे बेशकीमती रत्नों का गढ़ है। यहां गरियाबंद जिले के अलावा बस्तर संभाग के तोकपाल, भेजरीपदर और जशपुर जिले के फरसाबहार सहित आठ जगहों पर हीरे पाए जाते हैं।

पारदर्शी पन्ना: पारदर्शी पन्ना प्रदेश के चार जिलों में पाया जाता है। ये हैं गरियाबंद के देवभोग, सरगुजा के सफा, बीजापुर के भोपालपट्टनम और जशपुर के कुनकुरी तथा वनखेता।

माणिक और नीलम: बीजापुर जिले के भोपालपट्टनम में पचास टन माणिक और नीलम का भंडार है। इसके अलावा ये रत्न सुकमा के सोन कुकानार और गरियाबंद के कोंदूबाय गांव में भी मिलते हैं।

रत्नमणि: बीजापुर के कुचपूर, सरगुजा के बिशनपुर और गरियाबंद के गोहेकेरा तथा लाटापारा में मिलते हैं।

तुरमली: लाल, नीले और काले रंग के ये अनोखे चमकीले पत्थर गरियाबंद जिले के सेंदुमेंड़ा, लाटापारा और कोदोमाली में मिलते हैं।

गुलाबी स्फिटिक : धमरी और रायगढ़ जिले के ज्यादातर इलाकों में पाए जाते हैं।

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