एके रॉय : दुनिया में रहे, दुनिया के तलबगार नहीं

Date:

Share post:

पैसों से सत्ता और सत्ता से पैसा वाली मौजूदा सियासत में राजनीति के इकलौते संत कामरेड एके रॉय नहीं रहे। धनबाद सेंट्रल अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांसें ली। उनका जाना एक युग का अंत सा है। उस युग का अंत जहां साइकिल से प्रचार कर कोई विधानसभा या लोकसभा का चुनाव जीत ले। पैसों के बिना सियासत के वे मिसाल रहे। कामरेड रॉय नहीं रहे, लेकिन उनके विचार हमेशा जिंदा रहेंगे। झारखंड में जिस स्वशासन और दुनिया में जिस जनवाद की वे कल्पना करते थे-वह बहुत दूर ही छोड़ चले गये। आशा से भरे होने के बाद भी वे अपने लक्ष्य को पाये बिना चले गये। एक खास मुलाकात के दौरान उनकी कही बात याद है। उनकी बात उनकी उम्मीदों के व्यापक फलक को नुमायां करती है। मार्क्सवादी चिंतक कामरेड रॉय ने कहा था- ”हम एक जयंत अभियान पर हैं। हम जीतेंगे। मजदूरों की सत्ता स्थापित होगी। जनवाद के लिए लड़ने वाले इस जयंत अभियान में बिना थके, बिना रुके चलते रहेंगे। इस संघर्ष यात्रा के दौरान विश्राम मना है। हम तब रुकेंगे, जब आगे बढ़ने का रास्ता समाप्त हो चुका होगा। ” हालांकि, कामरेड रॉय भी गंदी और लिजलिजी हो चुकी राजनीति में अपने सियासी मंजिल के वैसे पथिक साबित हुए जिनका लक्ष्य तक पहुंचे बिना अस्त हो गया।

बदलाव की राजनीति के लिए किये कई प्रयोग

झारखंड जहां गिरावट की राजनीति की प्रयोगशाला रहा, वहीं कामरेड रॉय बदलाव की राजनीति के लिए एक के बाद एक प्रयोग करते गये। उन्होंने ‘बिरसा से लेनिन तक’ का नारा दिया। इस नारे के जरिये उन्होंने बताया कि बिरसा आदिवासी स्वशासन, सामूहिकता, विकास और हरियाली के प्रतीक हैं तो लेनिन संघर्ष के प्रतीक। ‘बिरसा से लेनिन तक’ के नारे को उन्होंने लोगों को दूसरे अर्थों में समझाया और बताया कि यही नारा झारखंडियों को संघर्ष से निर्माण तक के लिए प्रेरित करेगा। संघर्ष को उन्होंने सड़ी-गली व्यवस्था को बदलने में जरूरी बताया तो निर्माण को विकास का आधार बताया। एके राय ने नेताओं के जीवन की सादगी और चारीत्रिक ऊंचाई को राजनीतिक का उच्च प्रतिमान घोषित किया। उनकी स्थापित की गयी मार्क्सवादी समन्वय समिति के विधायक रह चुके स्व. गुरुदास चटर्जी और आनंद महतो ने खुद को कामरेड राय की इस कसौटी पर मजबूती से कसा। झारखंड को लालखंड में बदल डालने का नारा देकर कामरेड राय ने झारखंड आंदोलन को वामपंथी दिशा देने में कामयाबी पायी। उन्होंने शोषण मुक्त झारखंड को ही लालखंड बताया। इन्हीं विचारों से लैस होकर उन्होंने सीपीएम नेता बिनोद बिहारी महतो और नेमरा गांव के आदिवासी युवक शिबू सोरेन संग मिलकर झारखंड आंदोलन के लिए एक जन संगठन झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया। कामरेड रॉय के सामने उनका यह संगठन उनकी इच्छा के विरुद्ध संसदीय राजनीति में उतर आया और देखते-देखते झारखंड की सियासत का बड़ा मुकाम हासिल कर लिया। मगर, संगठन अपने मूल लक्ष्य झारखंड को शोषण मुक्त बनाने के अपने केंद्रीय एजेंडे से दूर खिसकता गया। बावजूद इसके एके राय ने उम्मीद नहीं छोड़ी। उन्होंने लाल और हरा झंडा की मैत्री का नारा दिया। लाल को उन्होंने संघर्ष और हरा को विकास का प्रतीक बताया।

पारंपरिक हथियारों को बताया था आदिवासियों का श्रृंगार

झारखंड की राजनीति में कामरेड रॉय ने कई रहस्योद्घाटन किया। झारखंड नामधारी पार्टियों का झंडा हरा होने पर कोई टिप्पणी किये बिना उन्होंने सबसे पहले बताया था कि बिरसा मुंडा का झंडा हरा नहीं लाल था। उनके मुताबिक बिरसा मुंडा दो झंडे अपने आंदोलनों के दौरान इस्तेमाल करते थे। एक झंडे का रंग लाल होता तो दूसरे झंडे का रंग सफेद। लाल झंडा संघर्ष का और सफेद झंडा आदिवासी शुद्धता का प्रतीक था। बाद के दिनों में इतिहासकार डॉ अमर कुमार सिंह ने भी अपनी किताब में इसका जिक्र किया। इसी तरह जब झारखंड में पारंपरिक हथियारों (तीर-धनूष, बरछा-भाला) के साथ आंदोलनों पर रोक की सरकारी पहल शुरू हुई तो कामरेड राय उठ खड़े हुए। उन्होंने बताया था कि आदिवासियों का श्रृंगार ही पारंपरिक हथियार हैं। इसलिए अंग्रेजों के खिलाफ शहादत को चूमने वाले तिलका मांझी, सिदो-कान्हू, बिरसा मुंडा को प्रतिमाओं में पारंपरिक हथियारों के साथ दिखाया गया है। एके रॉय पहले ऐसे गैरआदिवासी नेता साबित हुए जिन्होंने आदिवासी स्वशासन की वकालत की और झारखंडियों की सांस्कृतिक विरासत और अस्मिता की हिफाजत के लिए संघर्ष को जरूरी बताया।

इसके लिए हमेशा किये जाएंगे याद 

एके रॉय अलविदा कर चले गये। वे दुनिया में रहे, पर दुनिया के तलबगार नहीं। अपनी सादगी के लिए वे जाने जाएंगे। तीन बार विधायक और तीन बार सांसद रहे, पर उन्होंने कभी पेंशन नहीं लिया। पूरा पेंशन उन्होंने प्रधानमंत्री राहत कोष में दे दिया। अविवाहित एके राय सिंदरी खाद कारखाना में इजीनियर रहे। लेकिन, मजदूरों के प्रति हमदर्दी के कारण वे मजदूरों के बने क्वार्टर में ही रहे। नौकरी छोड़कर एके राय मजदूर आंदोलन में शामिल हुए। विधायक और सांसद बने, मगर कभी निजी दो पहिया या चार पहिया वाहन नहीं खरीदा। भीड़ भरे यात्री वाहनों से झरिया, कतरास, बोकारो, चंदनकियारी आते-जाते रहे। बुजुर्गों, महिलाओं व बच्चों के लिए अपनी सीट छोड़ अक्सर खड़े ही यात्रा करते। खपड़ैल के घर में हमेशा चटाई पर सोया। भात और आलू का फरता, दाल से पेट भरा। उनके हैदराबाद के दौरे पर जाने पर पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके खपड़ैल के मकान को छत के मकान में तब्दील कर दिया तो लौटने पर वे नाराज हुए और गुस्से में एक दिन के उपवास पर रहे। सीपीएम के विधायक रहते हुए जब उन्होंने अंग्रेजी अखबार ‘दि स्टेट्समैन’ में छपे अपने लेख में झारखंड अलग राज्य के आंदोलन का समर्थन किया तो पार्टी ने ने लेख में दर्ज विचारों से पल्ला झाड़ने को कहा। वे नहीं मानें और पार्टी से निकाले गये।

धर्मनिरपेक्षता झारखंड आंदोलन की आत्मा 

एके रॉय ने झारखंड आंदोलन की आत्मा को धर्मनिरपेक्ष बताया था। इसके लिए कई उदाहरण भी पेश किया। उमराव सिंह टिकैत और शेख भिखारी की जोड़ी समेत कई मिसाल दिये। उमराव सिंह टिकैत और शेख भिखारी के नेतृत्व में हिन्दू-मुसलमानों के संयुक्त आंदोलन का जिक्र कर फासीवादी राजनीति करने वालों को तर्कों से काटा। मालूम हो कि अंग्रेजों ने उमराव सिंह टिकैत और शेख भिखारी को चुटुपाली घाटी में फांसी की सजा दे दी थी।

spot_img

Related articles

A Lost Generation? The Complex Realities Pushing 3 Million Adolescent Girls Out of School

India faces a deepening crisis as 6.5 million children, including 3 million girls, drop out. Structural gaps, poverty, and administrative hurdles now threaten the National Education Policy’s goal of universal enrolment.

The Case of Shahjada Sultan: How a 78-Year-Old’s Deletion Reveals a 60-Lakh Person Systemic Failure in Bengal

A recently published supplementary electoral roll from Metiabruz’s Part 127 offers a small but revealing snapshot of a...

Congress’ ‘Ekla Chalo’ Gamble: 63 Muslim Candidates Lead the Charge in Solo Bengal Fight

Kolkata: The Congress has fielded candidates in 284 out of 294 seats in West Bengal, nominating most of...

The Spirit of Resistance: Why Iran and Global South Nations Defy the West

Western corporate media systematically manufactures distorted images of sovereign nations to justify military intervention. By labeling leaders as villains, they create a fake moral high ground to capture vital natural resources.