राशन पर ओटीपी की मुहर: झारखंड की हाशिए की आबादी भूख और अपमान के बीच फंसी

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[dropcap]39[/dropcap] वर्षीय हमीदा लातेहार जिले के मनिका प्रखंड की रहने वाली हैं, जुलाई 2024 में हमीदा अपने दो बेटों का राशन कार्ड में नाम जुडवाने के लिए स्थानीय जन सेवा केंद्र गयीं. इनके दोनों बेटो की उम्र 15 वर्ष से कम है, राशन कार्ड में नाम जुड़ने के पश्चात अतिरिक्त राशन का अधिकार व अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सकती है।

जन सेवा केंद्र के ऑपरेटर ने हमीदा को बताया कि राज्य के राशन कार्ड प्रबंधन प्रणाली पोर्टल पर आवेदन को आगे बढ़ाने के लिए वन टाइम पासवर्ड या ओटीपी (OTP) की आवश्यकता थी।  हमीदा ने कई बार अपना फोन चेक किया लेकिन कोई ओटीपी नहीं आया। फिर ऑपरेटर ने स्क्रीन पर संदेश पढ़ा जिसमें कहा गया था कि उसका फोन नंबर उसके आधार से लिंक होना चाहिए। हमीदा उलझन में थी। कुछ महीने पहले दिसंबर 2023 में, उसने बिना ओटीपी दर्ज किए अपने सबसे बड़े बेटे का नाम राशन कार्ड में जोड़ने के लिए एक आवेदन जमा किया था।

अब क्या बदल गया?

लगभग एक साल पहले जन वितरण प्रणाली अध्ययन के लिए क्षेत्र भ्रमण के दौरान, हमने पाया की लोगो राशन कार्ड विवरण बदलने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा।

इससे पहले झारखंड राशन कार्ड प्रबंधन प्रणाली पोर्टल में राशन कार्ड विवरण में बदलाव के लिए  केवल राशन कार्ड नंबर और परिवार के मुखिया का आधार नंबर की आवश्यकता थी। अब, नाम जोड़ने, हटाने, सुधार या अपडेट को लेकर आवेदन के लिए परिवार के मुखिया के आधार से जुड़े मोबाइल नंबर पर भेजे गए ओटीपी को भी दर्ज करने की जरूरत पड़ती है।

हमीदा की तरह, लातेहार जिले के कई अन्य लोग ओटीपी की आवश्यकता से अनजान थे। बिना किसी उचित जानकारी के इस अचानक बदलाव से भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है, परिवार के मुखिया के लिए मोबाइल नंबर को आधार से लिंक कराने का अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है और आवेदन में देरी होगी।

सीमित डिजिटल साक्षरता और तकनीक तक पहुंच वाले लोगो के लिए, यह पहले से ही एक बड़ी बाधा है। यह विशेष रूप से हमीदा जैसी महिलाओं को प्रभावित करता है जो सीमित संसाधनों के साथ अपने घर का प्रबंधन करती हैं और भोजन के राशन पर निर्भर हैं।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में राशन कार्ड के प्रयोजनों के लिए घर की सबसे बड़ी महिला को घर की मुखिया के रूप में नामित करने का प्रगतिशील आदेश शामिल है। यह प्रावधान खाद्य सुरक्षा में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका को मान्यता देता है और उन्हें आवश्यक अधिकारों पर अधिक नियंत्रण प्रदान करके उन्हें सशक्त बनाने का लक्ष्य रखता है। आधार-आधारित ओटीपी प्रमाणीकरण की शुरूआत ने संरचनात्मक और प्रणालीगत बाधाओं को पैदा करके अनजाने में इस उद्देश्य को कमजोर कर दिया है जो महिलाओं को असमान रूप से प्रभावित करते हैं।

इस लेख में, हमने जानबूझकर “हक़दार” शब्द का इस्तेमाल इस बात पर जोर देने के लिए किया है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत खाद्य अधिकारों तक पहुँच राज्य द्वारा कोई उपकार या परोपकार का कार्य नहीं है, बल्कि एक कानूनी अधिकार है। व्यक्तियों को हक़दार के रूप में मान्यता देने से राज्य की जिम्मेदारी पर ध्यान केंद्रित होता है ताकि न्यायसंगत और सुलभ सेवा वितरण सुनिश्चित किया जा सके। आधार-आधारित ओटीपी प्रमाणीकरण हक़दारों को पहचानने में यह विफलता को बढ़ाती है, खासकर महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर समूहों के लिए।

डिजिटल भूलभुलैया

आधार, भारत के निवासियों के लिए एक विशिष्ट पहचान है। पिछले कुछ वर्षों में आधार अधिकांश सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों, विशेष रूप से जन वितरण प्रणाली का हक़ प्राप्त करने में अनिवार्य हो गया है। भारत में, अनुमानित 81 करोड़ लोग सब्सिडी वाले खाद्यान्न के लिए राशन की दुकानों पर निर्भर हैं। झारखंड में, लगभग 2.86 करोड़ लोग राशन की दुकानों पर निर्भर हैं।

केंद्र सरकार का दावा है कि आधार को जन वितरण प्रणाली से जोड़ने से लक्ष्य निर्धारण में सुधार होगा, लीकेज और भ्रष्टाचार कम होगा, जिससे कार्यक्रम की दक्षता में सुधार होगा। 2015 से, आधार को योजनाओं के एंड-टू-एंड कम्प्यूटरीकरण, विभिन्न प्रक्रियाओं के स्वचालन और राशन कार्डों के ऑनलाइन डेटाबेस को बनाए रखने के साथ जन वितरण प्रणाली के साथ एकीकृत किया गया है।

अक्टूबर 2024 में प्रकाशित झारखंड के पीडीएस नियंत्रण आदेश में राशन कार्ड में बदलाव करने के लिए आधार से जुड़े ओटीपी को दर्ज करने के अतिरिक्त चरण का उल्लेख है, लेकिन यह नहीं बताया गया है कि इसकी आवश्यकता क्यों है।

जन सेवा केंद्र (सीएससी) संचालकों और कुछ प्रखंड अधिकारियों सहित हितधारकों के साथ चर्चा में पाया गया कि अधिकांश लोग इस बदलाव से अनजान थे. एक राज्य के अधिकारी ने आधार आधारित ओटिपी को सुरक्षा बढ़ाने के रूप में बताया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि राशन कार्ड में बदलाव या विलोपन करने के लिए वास्तविक आवेदन हैं।

राशन कार्ड में बदलाव करना महत्वपूर्ण है और समय-समय पर इसकी आवश्यकता होती है क्योंकि परिवार में जन्म, शादी और मृत्यु के साथ नाम जोड़ना या हटाना पड़ता है। ऐसी प्रक्रियाएं सरल और पारदर्शी होनी चाहिए, जिसमें लोगो की बेहतर पहुंच और निश्चित समय में अपडेट की सुविधा हो.

लातेहार जिले के सरयू ब्लॉक के चोरहा पंचायत की एक महिला ने बताया कि वह अपनी सास की मौत के बाद घर के मुखिया के तौर पर अपना नाम अपडेट करवाने के लिए पिछले कुछ महीनों से कोशिश कर रही थी।

उन्होंने ने कहा “मैं ब्लॉक ऑफिस, यहां तक ​​कि जिला और वहां के एक केंद्र में कई बार जा चुकी हूं, लेकिन मेरा काम नहीं हो पा रहा है।” “मैंने अब तो हार मान ली है।”

यदि आधार पूर्व से मोबाइल नंबर से लिंक नहीं है तो समस्याओं का समाधान मुश्किल हो जाता है। हमें कई ऐसे मामले भी मिले जहां ग्रामीण क्षेत्रों में आधार मोबाइल नंबर से लिंक नहीं था। ये बाधाएं उन लोगों के आर्थिक बोझ को और बढ़ा देती हैं जो पहले से ही अनिश्चित जीवन जी रहे हैं।

कार्ड धारकों को अक्सर प्रखंड या जिला मुख्यालय की यात्रा करनी पड़ती है, क्योंकि आस-पास गाँव या पंचायतों में आधार केंद्र उपलब्ध नहीं हैं, जिससे परिवहन व्यय के साथ-साथ उस दिन की मजदूरी का नुकसान भी होता है।

यदि आधार केंद्र हो या केंद्र में बहुत भीड़ होने की वजह से, कई हकदार बिचौलियों की मदद लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है जो आधार को मोबाइल नंबर से लिंक करने या राशन कार्ड विवरण अपडेट करने जैसे सरल कार्यों को पूरा करने के लिए अत्यधिक शुल्क लेते हैं। उदाहरण के लिए, बरहेट के एक गाँव में कई लोगों  ने उन सेवाओं के लिए 500 रुपये से लेकर 1,600 रुपये तक दिए , जो हकदारों को आम तौर पर मुफ़्त या न्यूनतम मूल्य पर होने थे ।

महिलाओं की निजी मोबाइल फोन तक सीमित पहुँच है, जो एक बड़ी चुनौती है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 (2019-21) के अनुसार, भारत में 8.5% और झारखंड में 10% घरों में मोबाइल फोन नहीं है। एक बड़ा लैंगिक अंतर भी है: राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा 2023 व्यापक वार्षिक मॉड्यूलर सर्वेक्षण के अनुसार, 10 में से सात गैर-मोबाइल उपयोगकर्ता महिलाएं हैं, यह सर्वे मोबाइल फोन और इंटरनेट उपयोग की व्यक्तिगत और घरेलू विशेषताओं को एकत्रित करता है। यह अंतर शिक्षा और उम्र और अन्य कारकों जैसे स्मार्टफोन का स्वामित्व होना और इंटरनेट का उपयोग करने के साथ बढ़ता है।

सांस्कृतिक मानदंड और आर्थिक बाधाएं पुरुषों के पास मोबाइल रखने की प्राथमिकता देती हैं, जिससे महिलाएं पुरुष परिवार के सदस्यों पर निर्भर रहती हैं। और यदि  महिलाओं के पास फोन तक पहुंच होती है, तो उनका उपयोग सीमित होता है। कई महिलाएं जो घर की मुखिया हैं, उनके आधार से या तो निष्क्रिय मोबाइल नंबर जुड़े हुए हैं या पुरुष रिश्तेदारों के मोबाइल नंबर जुड़े हुए हैं या कोई मोबाइल नंबर ही नहीं जुड़ा है।

मोबाइल फोन रखने वालों में भी, एक सक्रिय कनेक्शन को बनाए रखने की लागत, जो पिछले वर्ष लगभग 15% बढ़ गई. हमें कई आर्थिक रूप से वंचित परिवार मिले, जिनके मोबाइल नंबर अफोर्डेबल टैरिफ के कारण निष्क्रिय या बंद पड़े हैं। इससे वे सिस्टम से बाहर हो जाते हैं, क्योंकि राशन कार्ड मैनेजमेंट सिस्टम पोर्टल पर बदलाव करने के लिए एक चालू मोबाइल फोन कनेक्शन होना अब एक अनिवार्य शर्त है।

महिलाओं के पास पुरुष या अन्य लोगो पर निर्भर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, जिससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम द्वारा बढ़ावा दिए जाने वाले स्वायत्तता को नुकसान पहुँच रहा है। कुछ मामलों में, महिलाओं ने बताया कि उन्हें साधारण अपडेट के लिए बिचौलियों को बहुत ज़्यादा शुल्क देना पड़ता है।

ये अनुभव इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए बनाई गई नीति ने खाद्य अधिकारों तक पहुँच में लैंगिक अंतर को कैसे बढ़ाया है। महिलाओं की डिजिटल पहुँच और स्वायत्तता को सीमित करने वाली संरचनात्मक असमानताओं को अनदेखा करके, अनुपालन का बोझ अनजाने में उन लोगों पर डाल दिया गया है, जिन्हें इससे लाभ मिलना चाहिए था। महिलाओं की पात्रता तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए आधार एकीकरण द्वारा पेश किए गए तकनीकी सुधारों से परे, इन बाधाओं को समग्र रूप से संबोधित करने की आवश्यकता है।

समाधान की दिशा में सुझाव

भारत की जन वितरण प्रणाली के डिजिटलीकरण की कल्पना पारदर्शीता और जवाबदेही की दिशा में कदम बढ़ाने के रूप में की गई थी, लेकिन ज़मीनी हकीकत एक जटिल कहानी बयां करती है।

हालाँकि आधार-आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और ओटीपी सत्यापन जैसी तकनीकों का उद्देश्य धोखाधड़ी और चोरी को रोकना है, लेकिन वे कमज़ोर समुदाय के लिए चुनौतियों को और बढ़ा देते हैं, जिनके पास डिजिटल साक्षरता की कमी है और मोबाइल फ़ोन या इन प्रणालियों को चलाने की कनेक्टिविटी की पहुँच सिमित है।

केवल तकनीकी पहुँच की समस्याएँ ही नहीं हैं, बल्कि डिजिटल और सामाजिक समावेशन की व्यापक चिंताएँ हैं, हकदार इन प्रक्रियाओं को कैसे समझते हैं और क्या उनके पास बनाई गई प्रणाली को चलाने का कौशल है। एक बुनियादी सवाल सामने आता है: क्या राज्य इन हकदारों को पहचानता भी है और वह उनकी मदद कैसे कर रहा है?

डिजिटलीकरण के लाभों को सभी हक़दार तक पहुँचाने के लिए एक लचीला और समावेशी दृष्टिकोण आवश्यक है। डिजिटलीकरण के प्रयासों में विभिन्न हितधारकों के साथ परामर्श शामिल होना चाहिए और अधिकार धारकों को परिवर्तनों के बारे में यथासंभव स्पष्ट रूप से जानकारी दिए जाने के बाद इसे लागू किया जाना चाहिए।

साथ ही, झारखंड के खाद्य और जन वितरण विभाग को यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सहायता प्रदान करनी चाहिए कि राशन कार्ड धारक संघर्ष या कठिनाइयों का सामना किए बिना आसानी से परिवर्तनों को कर सकें। इस मामले में कई विकल्प होने चाहिए, जैसे कि ओटीपी प्राप्त करने के लिए राशन कार्ड से जुड़े मोबाइल नंबर। अगर राशन कार्ड से कोई मोबाइल नंबर लिंक नहीं है या फिर कोई मोबाइल नंबर ही नहीं है, तो एक ऑफलाइन सिस्टम होना चाहिए जो आधार-आधारित ओटीपी की मांग नहीं करता हो। मोबाइल फोन नंबर और आधार विवरण अपडेट करने की प्रक्रिया को भी सरल बनाया जाना चाहिए।

तकनिकी लाभों को देखते हुए डिजिटलीकरण का संतुलित उपयोग कर हाशिए पर पड़े समूहों की वास्तविकताओं के प्रति संवेदनशीलता के साथ जोड़ा जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अधिक सुरक्षित और पारदर्शी जन वितरण प्रणाली की खोज में कोई भी पीछे न छूट जाए।

 

लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

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