बंगाल में चुनाव आयोग की भूमिका पर क्यों उठ रहे सवाल?

ऐसा पहली बार नहीं है जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता कठघरे में हो बल्कि उस पर तो केंद्रीय सत्ता की तरफदारी का आरोप एक आम बात रही है, लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनाव के संदर्भ में देखें तो इस बार वह निष्पक्षता का दिखावा तक नहीं कर रही है और लगता है कि उसे लोकलाज की चिंता भी रह नहीं गई है। अब देखें तो ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग का काम किसी तरह चुनाव करा देना भर रह गया है और ऐसे में एक आशंका यह है कि आयोग की इस शारीरिक और जुबानी हिंसा की अनदेखी करने का असर चुनाव बाद विस्फोटक न हो जाए! क्योंकि, 2 मई के चुनाव नतीजों के बाद जिस दल की भी राज्य में सरकार बनेगी उसके कार्यकर्ता चुनाव के दौरान हुई रंजिशों का बदला ले सकते हैं

Date:

Share post:

पिछले 9 अप्रैल को चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को केंद्रीय सुरक्षा बलों पर गलत बयानबाजी के आरोप में दूसरी बार नोटिस भेजा। बता दें कि ममता बनर्जी केंद्रीय सुरक्षा बलों पर बीजेपी की मदद पहुंचाने का आरोप लगाती रही हैं। इसके पहले आयोग ने 7 अप्रैल को भी एक नोटिस भेजा था, जिसमें ममता ने 3 अप्रैल को एक चुनावी सभा में अपने भाषण के दौरान बोला था कि बंगाल के अल्पसंख्यक अपने मतों का विभाजन न होने दें। चुनाव आयोग के इस नोटिस पर ममता ने अपने तीखे तेवर दिखाए और कहा, “मैं उन लोगों के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखूंगी जो बंगाल को धर्म और संप्रदाय में बांटना चाहते हैं।” उल्टा ममता ने आयोग पर यह आरोप लगाया कि वह बीजेपी की तरफ से चुनाव प्रचार कर रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ शिकायत क्यों नहीं दर्ज करता है?

वहीं, 6 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक चुनाव रैली में कहा कि यदि उन्होंने भी हिंदुओं को एकजुट करने और उन्हें बीजेपी के पक्ष में वोट देने के लिए कहा होता तो चुनाव आयोग की तरफ से उन्हें नोटिस मिल जाता। इस तरह, उन्होंने भी चुनाव के दौरान हिंदू मतों का धुर्वीकरण करने से जुड़ा बयान दे ही दिया, लेकिन आयोग ने उन्हें नोटिस नहीं भेजा। दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के अन्य नेताओं के बीच भी परस्पर आरोप-प्रत्यारोप का जो दौर चल रहा है उससे ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री के तौर पर यदि ममता बनर्जी राज्य प्रशासन का लाभ उठाना चाहती हैं तो प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी भी केंद्रीय स्तर की सभी संवैधानिक संस्थाओं की मदद से बंगाल का विधानसभा चुनाव जीतना चाहते हैं जिसमें चुनाव आयोग भी अछूता नहीं रह गया है।

देखा जाए तो जब से पश्चिम बंगाल में चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई है तब से ही चुनाव आयोग की भूमिका पर प्रश्न उठ रहे हैं। इसमें तृणमूल के अलावा कांग्रेस और वाम दल भी आयोग से लगातार शिकायतें करते हुए प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के अन्य नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग करते आ रहे हैं। इसी कड़ी में ममता बनर्जी का यह आरोप भी है कि उन्होंने आयोग को बीजेपी नेताओं की अवैधानिक गतिविधियों से जुड़ी कई शिकायतें भेजीं, लेकिन किसी तरह की कार्रवाई करनी तो दूर आयोग ने उन्हें कोई उत्तर तक नहीं दिया है।

देखा जाए तो ममता बनर्जी के जिस बयान पर उन्हें आयोग द्वारा पहला नोटिस भेजा गया था वह चार दिनों बाद 7 अप्रैल को आयोग ने संज्ञान में लिया था। मतलब यह नोटिस आयोग द्वारा 3, 4 या 5 अप्रैल को भेजने की बजाय जब भेजा तब प्रधानमंत्री मोदी ने सार्वजनिक सभा में ममता के बयान को लेकर आयोग को घेरा। इस तरह, प्रधानमंत्री ने अपने बयान से दो निशाने साधे। एक तो उन्होंने हिंदुओं को एकजुट करके बीजेपी को वोट देने का संकेत किया और दूसरा आयोग को ममता पर कार्रवाई करने के लिए भी कहा और उसके अगले दिन आयोग ने भी बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नकवी की शिकायत पर ममता को नोटिस भेज दिया।

दरअसल, विशेषकर पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की भूमिका को अलग से देखने की बजाय हमें इसे अन्य संवैधानिक संस्थाओं के केंद्रीय सत्ता के दबाव में आने और काम करने के रुप में देखना चाहिए। इसके पहले भी जब पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव आठ चरणों में कराने की घोषणा हुई थी तब भी सभी विपक्षी दलों ने आयोग पर यह आरोप लगाया था कि उसने यह पूरा कार्यक्रम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की सुविधा को ध्यान में रखते हुए बनाया है।

दूसरी तरफ, कोरोना प्रोटोकॉल की बात की जाए तो पिछले दिनों दिल्ली उच्च-न्यायालय ने राज्य और केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा था कि चुनाव के दौरान कोरोना लॉकडाउन की गाइडलाइन का उल्लंघन किया जा रहा है। असल में इस बार पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान यह देखा जा रहा है कि सभी दलों के नेता कोरोना प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर रहे हैं और इसमें प्रधानमंत्री मोदी तक पीछे नहीं हैं जिन पर कोरोना से लड़ने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और जो इस पूरी लड़ाई को लीड कर रहे हैं। लेकिन, प्रश्न है कि जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की ही रैली में हजारों लोगों की भीड़ को एकजुट किया जा रहा है तो चुनाव आयोग और उच्च-न्यायालयों के नोटिसों का क्या अर्थ रह जाता है। वजह यह है कि देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्ति ही जब कोरोना प्रोटोकॉल को नहीं मानेंगे तब चुनाव आयोग कुछ कार्रवाई करने की हालत में दिखेगा भी। लिहाजा, पश्चिम बंगाल के चुनाव पर ध्यान दें तो इस बार केंद्र सरकार के आगे आयोग पूरी तरह से असहाय नजर आ रहा है।

इसी तरह, यदि हम चुनावी सभाओं में नेताओं की बयानबाजी और भाषा की बात करें तो इस मामले में भी चुनाव आयोग ने जैसे आंखें बंद कर ली हैं। कारण यह है कि व्यक्तिगत मर्यादा के उल्लंघन के मामले में आयोग द्वारा प्रधानमंत्री के उन बयानों के आधार पर उन्हें नोटिस भेजा जा सकता था जिसमें वह ममता बनर्जी को ‘दीदी ओ दीदी’ कहकर एक तरह से उन्हें छेड़ या चिढ़ा रहे हैं और उनका यह कमेंट काफी विवादित भी माना जा रहा है। इसके अलावा, जिस प्रकार बीजेपी के चुनाव अभियान में ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाकर और मंदिर दर्शनों के जरिए साप्रदायिक रंग दिया जा रहा है उसे लेकर भी आयोग गंभीर नजर नहीं आ रहा है। इसीलिए बीजेपी विरोधी दलों द्वारा आयोग पर यह आरोप लगाने का मौका मिला है कि आयोग परोक्ष रुप से रणनीति के हर स्तर पर बीजेपी को चुनाव में लाभ दिलाने के लिए मदद कर रहा है।

देखा जाए तो बीजेपी के ‘जय श्री राम’ और मंदिर-दर्शन चुनावी अभियान पर तृणमूल कांग्रेस से लेकर कोई भी विपक्षी दल सीधे तौर पर विरोध या शिकायत नहीं कर पा रहा है क्योंकि उससे उस दल को आशंका है कि कहीं उसे बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता के खिलाफ बोलने पर नुकसान न उठाना पड़े। ऐसे में ही तो चुनाव आयोग की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है जब वह इस तरह की गतिविधियों के विरोध में बीजेपी को रोक सकती है। लेकिन, वह इस मामले में उल्टा पक्षपाती रवैया अपना रही है। इसका उदाहरण पिछले दिनों तब देखने को मिला जब उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनाव प्रचार के दौरान एक रैली में कहा कि बंगाल में रामनवमीं मनाने की आजादी नहीं है, यदि बीजेपी की सरकार आएगी तो बंगाल में भी रामनवमीं मनाएंगे। इस तरह से उन्होंने सीधे-सीधे चुनाव में हिंदुओं की भावनाएं भड़काने की कोशिश की, लेकिन चुनाव आयोग ने उनके बयान को नजर अंदाज कर दिया।

इतना ही नहीं मीडिया कवरेज में भी यह बात सार्वजनिक हुई थी कि नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार के दौरान कमल-छाप साड़िया बांटी गई थीं। फिर भी चुनाव आयोग ने बीजेपी के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाया था। हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं है जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता कठघरे में हो बल्कि उस पर तो केंद्रीय सत्ता की तरफदारी का आरोप एक आम बात रही है, लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनाव के संदर्भ में देखें तो इस बार वह निष्पक्षता का दिखावा तक नहीं कर रही है और लगता है कि उसे लोकलाज की चिंता भी रह नहीं गई है। अब देखें तो ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग का काम किसी तरह चुनाव करा देना भर रह गया है और ऐसे में एक आशंका यह है कि आयोग की इस शारीरिक और जुबानी हिंसा की अनदेखी करने का असर चुनाव बाद विस्फोटक न हो जाए! क्योंकि, 2 मई के चुनाव नतीजों के बाद जिस दल की भी राज्य में सरकार बनेगी उसके कार्यकर्ता चुनाव के दौरान हुई रंजिशों का बदला ले सकते हैं। इसलिए पश्चिम बंगाल के चुनाव में यदि चुनाव आयोग अपनी मजबूत भूमिका अपनाते हुए सभी अवैधानिक चुनावी गतिविधियों को नियंत्रित कर पाती तो अच्छा होता।

 

ये लेखक के निजी विचार हैं

spot_img

Related articles

A Lost Generation? The Complex Realities Pushing 3 Million Adolescent Girls Out of School

India faces a deepening crisis as 6.5 million children, including 3 million girls, drop out. Structural gaps, poverty, and administrative hurdles now threaten the National Education Policy’s goal of universal enrolment.

The Case of Shahjada Sultan: How a 78-Year-Old’s Deletion Reveals a 60-Lakh Person Systemic Failure in Bengal

A recently published supplementary electoral roll from Metiabruz’s Part 127 offers a small but revealing snapshot of a...

Congress’ ‘Ekla Chalo’ Gamble: 63 Muslim Candidates Lead the Charge in Solo Bengal Fight

Kolkata: The Congress has fielded candidates in 284 out of 294 seats in West Bengal, nominating most of...

The Spirit of Resistance: Why Iran and Global South Nations Defy the West

Western corporate media systematically manufactures distorted images of sovereign nations to justify military intervention. By labeling leaders as villains, they create a fake moral high ground to capture vital natural resources.