यह स्कूल था कभी आवारा पशुओं का ठिकाना

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शिलटे (पालघर):  इस स्कूल की तस्वीर देखिए। क्या आप पूरे स्कूल परिसर की सुंदर तस्वीर देख यह कल्पना कर सकेंगे कि यह जगह कभी अवारा पशुओं का ठिकाना हुआ करती थी। यहां के शिक्षक जब सुबह स्कूल खोलते थे तो उनका पहला काम हुआ करता था दरवाजे और आसपास से गाय के गोबर को साफ करना।

लेकिन, अब स्थिति ठीक उलट है। आज यही स्कूल स्वच्छता के सभी मानकों पर खरा है। राज्य के कई बड़े अधिकारी और दूरदराज से शिक्षकों के समूह यहां स्कूल की सुंदरता और कलाकृतियों का निरीक्षण करने आते हैं। सब यही पूछते हैं कि यह सब किया कैसे?

”श्रमदान और सामूहिक भागीदारिता से”- यहां के प्रधानाध्यापक अशोक किणी इसका उत्तर अक्सर एक पंक्ति में देते हैं। इनका मानना है कि श्रमदान से स्कूल को सुंदर बनाने का प्रयास तो काफी लंबे समय से चल रहा है, मगर मूल्यवर्धन नाम के एक कार्यक्रम के कारण यह काम और अधिक व्यवस्थित, व्यापक और संगठित तरीके से किया जा रहा है। विशेषकर, स्वच्छता के मामले में स्कूल के साथ समुदाय पहले से अधिक सजग और संवेदनशील हो रहा है।

बात हो रही है जिला मुख्यालय पालघर से करीब 20 किलोमीटर दूर जिला परिषद शाला शिलटे की। शिलटे मलहार कोली आदिवासी बहुल गांव है। इस समुदाय के अधिकतर लोग मुख्यत: मजदूरी करते हैं। शिलटे करीब साढ़े छह सौ की आबादी वाला गांव हैं।

शिलटे श्रमदान स्कूल ठाने शिक्षक शिक्षिका सहभागिता
प्रधानाध्यापक अशोक हरिचंद किंणी के साथ स्कूल के बच्चे

यहां के स्कूल में पहली से चौथी तक कुल 47 बच्चे पढ़ रहे हैं। वर्ष 1953 में स्थापित मराठी माध्यम के इस स्कूल का कायापलट यहां के प्रधानाध्यापक के साथ शिक्षिका स्वजल म्हात्रे ने किया है।

छह दशक पुराने इस स्कूल की विशेषता है कि आज स्कूल भवन के खिड़की, दरवाजे, कुर्सी, टेबल, परिसर की ऊंची दीवारे, पक्के रास्ते, कूड़दान, झालीदार क्यारियों, सैकड़ों पेड़-पौधे, गमले से लेकर खेल-मैदान और छोटे बच्चों के झूले तक सब श्रमदान और सहभागिता की बदौलत है। यही नहीं, पीने के पानी के लिए मोटर-पंप, पक्का पियाऊ, लड़की-लड़कों के अलावा विकलांग बच्चों के लिए विशेष शौचालय, विशाल मंच, भव्य बगीचे से लेकर डिजीटल स्कूल भी श्रमदान और सहभागिता का ही परिणाम है।

यह सब करने के लिए बड़े पैमाने पर श्रम और साधनों की जरुरत तो थी ही, लाखों रुपए भी जुटाना था। बतौर शिक्षिका स्वजल म्हात्रे बताती हैं कि इतना सब कुछ कर पाना बहुत मुश्किल काम था, जिसे प्रधानाध्यापक की अगुवाई में बच्चों, पालकों, समुदाय के सदस्यों, ग्राम पंचायत जैसी संस्थाओं, स्वयं सेवा संगठनों और निजी कंपनियों के आपसी सहयोग ने आसान बना दिया।

शिलटे श्रमदान स्कूल ठाने शिक्षक शिक्षिका सहभागिता
पूरे परिसर साफ, सुंदर और आकर्षक है

इस तरह मूल्यवर्धन बना मददगार

स्कूल को सुंदर व साधन-सम्पन्न बनाने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण उसकी देखभाल करना और यथास्थिति को कायम रखना था। केंद्र प्रमुख लूसी रॉड्रिक्स के अनुसार इसके लिए यहां के शिक्षक मूल्यवर्धन का सहारा लेते हैं। वे बताती हैं, ”मूल्यवर्धन के कारण वे स्कूल के लिए और अधिक समय देने लगे हैं। कई बार शिक्षक-शिक्षिका स्कूल लगने से पहले और स्कूल बंद होने के बाद मूल्यवर्धन के सत्र में बच्चों के साथ या तो मैदान साफ करते हैं, या फिर कचरा फेंकने जैसे काम किए जाते हैं।”

स्वजल म्हात्रे ने जुलाई, 2018 को नजदीक ही माकनी में मूल्यवर्धन का प्रशिक्षण लिया था। प्रशिक्षण के दौरान वे ‘समता’ संविधान के इस मूल्य से सबसे अधिक प्रभावित हुई थीं। अपने अनुभव साक्षा करते हुए वे कहती हैं, ”मूल्यवर्धन की पुस्तिकाओं को पलटते हुए मैंने तय किया था कि मेरे स्कूल में सब एक साथ मिलकर काम करेंगे, किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होगा, और लड़के-लड़कियां जोड़ी और समूह में चर्चा करेंगे, एक-दूसरे की भावनाओं को अधिक से अधिक और अच्छी तरह से समझेंगे।”

स्वजल के मुताबिक, वे सप्ताह में मूल्यवर्धन के दो से तीन सत्र लेती हैं। अब सवाल है कि क्या मूल्यवर्धन से बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है? इस बारे में कक्षा दूसरी के कुछ बच्चे अपने अनुभव बताते हैं। तनिश भिमाड़ के मुताबिक जब उसकी मां काम से थककर घर लौटती है तो वह उन्हें पानी देता है। अस्मित सुतार स्कूल का सामान व्यवस्थित रखने में मदद करता है। पानी की टंकी भर जाने पर रितिका शेलार शिक्षिका को नल बंद करने की याद दिलाती है। रितेश हेमाड़े बगीचे में गिरे फूलों को एक जगह जमा करता है। इसी तरह, शुभम तुमड़े प्लास्टिक की चीजों का उपयोग न के बराबर करता है।

शिलटे श्रमदान स्कूल ठाने शिक्षक शिक्षिका सहभागिता
खुशी, गम और गुस्सा.. बच्चे अलग—अलग भावनाओं को समझते हैं

दूसरी के इन बच्चों ने बताया कि अब वे दुकान से खरीदकर कोई चीज नहीं खाते। इसकी बजाय वे कक्षा में एक गुल्लक रखते हैं। इस गुल्लक में सिक्के डालकर वे पैसा जमा करते हैं। फिर कुछ दिनों के बाद गुल्लक के पैसों से ही किसी के घर में खाने की ऐसी चीजे बनवाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नहीं होतीं।

चित्र और कलाकृतियों में श्रम के संदेश

दूसरी तरफ, मूल्यवर्धन की कुछ गतिविधियों से बच्चों के परिजन भी खुश हैं। शीला पटेल का एक बच्चा पहली और दूसरा चौथी में पढ़ता है। उन्होंने बताया कि साल भर से दोनों बच्चे घर में भी साफ-सफाई पर बहुत ध्यान देते हैं। हर बुधवार स्कूल में बच्चों के नाखून और बाल चेक होते हैं। इसलिए, उनके बच्चे उनसे कुछ-कुछ दिनों में नाखून काटने और बाल कटवाने की याद दिलाते हैं।

इस स्कूल में गौर करने वाली बात यह है कि यहां का परिसर ही नहीं, स्कूल के दोनों कमरे और गलियारे सुंदर चित्र और कबाड़ की चीजों से तैयार कलाकृतियों से सजाए गए हैं। इन चित्र और कलाकृतियां भी श्रमदान का संदेश देते हैं। उदाहरण के लिए, पुराने जमाने में किस तरह से पानी खींचकर निकाला जाता था, उसका भी एक मॉडल तैयार किया गया है। जागृति गिराणे नाम की एक बच्ची बताती हैं, ”सजावट की ये चीजे स्वजल मैडम ने तैयार की हैं। वे हमें भी ऐसी चीजे बनाना सिखाती हैं।”

शिलटे श्रमदान स्कूल ठाने शिक्षक शिक्षिका सहभागिता
विकलांग बच्चों को ध्यान में रखते हुए शौचालय बनाया गया

अब सहभागिता से बनेगी छत

इस स्कूल की भविष्य की क्या योजना है और इसमें मूल्यवर्धन की किस तरह से मदद ली जा सकती है? यह पूछने पर अशोक किणी बताते हैं, ”बरसात के दिनों में भवन की छत से पानी रिसता है, इसे बदलवाना हैं। फर्श भी बहुत पुराना हो गया है, तो नया फर्श तैयार कराना है, ये काम भी लोगों की मदद से होंगे।” इनका मानना है कि मूल्यवर्धन कार्यक्रम से आपसी सहयोग, दूसरों की मदद, और काम करने वाले लोगों के प्रति सम्मान की भावना बढ़ेगी।

स्वजल को पूरा भरोसा है कि लोग आगे भी उन्हें श्रम और सहयोग देंगे। इसके पीछे की पृष्ठभूमि बताती हुई वे अपना अनुभव सुनाती हैं, ”श्रम और चंदा देने के मामले में हर बार सबसे पहले हम शिक्षकों का परिवार आगे आता है। हमारे ऐसा करने पर लोगों को भी लगता है कि उन्हें भी कुछ करना चाहिए और इस तरह वे हमारी सहायता करते हैं।”

स्पष्ट है कि शिलटे के स्कूल को सुंदर बनाने और उसे साफ-सुथरा रखने के पीछे बच्चों के साथ बड़ों को भी श्रम का महत्त्व समझ आ रहा है।

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