नालन्दा विश्वविद्यालय का उद्घाटन और अमर्त्य सेन की अनदेखी

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पंकज मोहन

[dropcap]ची[/dropcap]नी कहावत है:  飲水思源 इन सुइ, स युवैन, अर्थात जब पानी पीते हो, तो तालाब या कुआं बनाने वालों के बारे में कृतज्ञतापूर्वक सोचो।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने नालन्दा विश्वविद्यालय का उद्घाटन किया। उद्घाटन भाषण में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या विदेश मंत्री ने भारतीय इतिहास में नालंदा या राजगीर के महत्व के बारे में जो कुछ कहा, बहुत अच्छा कहा। मोदीजी ने जिस परिसर का उद्घाटन और लोकार्पण किया उसका टेन्डर मेरे हस्ताक्षर से जनवरी 2017 में नागार्जुन कंस्ट्रक्शन को दिया गया था और कैम्पस निर्माण के श्री गणेश के अवसर पर नागार्जुन कम्पनी द्वारा आयोजित भूमि पूजन का जजमान मैं ही था। उस अवसर पर तत्कालीन कुलाधिपति डॉक्टर विजय भटकर भी साथ बैठे थे। नालंदा विश्वविद्यालय कैम्पस निर्माण के शुभारंभ (भूमि पूजन) के अवसर पर मैंने किसी राजनेता को आमंत्रित नहीं किया।

विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने नालंदा विश्वविद्यालय निर्माण के इतिहास की जो डोक्युमेंटरी दिखाया, जिसमें राष्ट्रपति कलाम और प्रधानमंत्री मोदी का ही उल्लेख था। किसी ने 2014 में नालंदा विश्वविद्यालय के अन्तरिम परिसर का उद्घाटन कर अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया के शुभारंभ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली राजनेत्री श्रीमती स्वराज का स्मरण नहीं किया।

विश्वविद्यालय के निर्माण का विजन प्रदान करने वाले  प्रथम कुलाधिपति प्रोफेसर अमर्त्य सेन, शासी समिति के सदस्य और प्रथम कुलपति डॉक्टर गोपा सभरवाल की भी उपेक्षा हुयी। किसी ने द्वितीय कुलाधिपति श्री जार्ज यो या तृतीय कुलाधिपति डॉक्टर विजय भटकर का भी उल्लेख नहीं किया।

प्रोफेसर अमर्त्य सेन और शासी समिति के उनके विद्वान सहयोगियों ने विश्वविद्यालय के भावी स्वरूप का रोडमैप तो बनाया ही, 2014 में प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने इंडोनेशिया में व्याख्यान के मानदेय के रूप में प्राप्त बीस लाख रुपये के दान द्वारा अभावग्रस्त छात्रों के लिये छात्रवृत्ति कोष बनवाया।

अमर्त्य सेन की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के कारण आस्ट्रेलिया सरकार, चीन की सरकार और स्विट्जरलैंड के एक एनआरआई व्यवसायी ने एक-एक मिलियन अमेरीकी डालर (कुल मिलाकर अठारह करोड़ रुपये) का दान दिया। थाईलैंड ने साठ लाख रुपये का अनुदान दिया।

सिंगापुर के प्रमुख व्यवसायियों का एक दल प्रोफेसर अमर्त्य सेन और शासी समिति के सदस्य श्री जार्ज यो, जो सिंगापुर के विदेश मंत्री थे, के अनुरोध पर नालंदा आया था। वे विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के लिये करीब दस मिलियन अमरीकी डालर, अर्थात साठ करोड रुपये का अनुदान देने के लिये प्रतिबद्ध थे। जब मोदी सरकार ने अमर्त्य सेन को पहले कुलाधिपति पद से हटाया और फिर शासी समिति से भी बेदखल कर दिया, जॉर्ज यो ने भी नालंदा से नाता तोड़ लिया और सिंगापुर के उद्योगपति भी अनुदान के वादे से मुकर गए।

प्रोफेसर अमर्त्य सेन जब विश्वविद्यालय के काम से भारत आते थे, तो उनके फ्लाइट के किराए का भुगतान  विश्वविद्यालय को नहीं करना पडता था। अटल जी ने भारत रत्न पुरस्कार देते समय उन्हें एअर इन्डिया के फर्स्ट क्लास का फ्री पास भी दिया था। कुछ अंधभक्त यह कहते हैं कि अमर्त्य सेन नालंदा विश्वविद्यालय के पैसे से भारत के फाइव-स्टार होटल में टिकते थे। वे यह भूल जाते हैं कि भारत रत्न सम्मान से नवाजे गये महापुरुष किस राज्य में जाते हैं, उन्हें राजकीय अतिथि का दर्जा मिलता है और राज्य सरकार उनके आतिथ्य के उत्तरदायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन करती है। इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि अगर वे नालंदा विश्वविद्यालय के काम से भारत ना आते और विश्व के विकसित देशों में जाकर व्याख्यान देते, तो वे प्रतिदिन दस लाख कमाते। भारत में उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय से एक पैसा नहीं लिया।

सरकार ने प्रोफेसर अमर्त्य सेन और उनके द्वारा नियुक्त कुलपति को कलंकित करने के उद्देश्य से हर तरह के हथकंडे अपनाये, नाना प्रकार की चालबाजी की, लेकिन सांच को आंच क्या? झूठ के सचमुच पांव नहीं होते। टाइम्स ऑफ इन्डिया की पत्रकार भारती जैन ने   ट्विटर पर प्रोफेसर अमर्त्य के खिलाफ कुछ आरोप लगाये। उसने लिखा कि नियुक्ति में धांधली हुई, उन्हें पांच लाख रुपये प्रति माह वेतन, बेहिसाब विदेश यात्रा, विलासितापूर्ण होटल का आतिथ्य, सीधी नियुक्तियों की शक्ति, आदि दिए गए थे। बाद में जब उसे तथ्यों से अवगत कराया गया, उसने अपने आरोपों को वापस लिया और क्षमा याचना की। उसने ट्विटर पर लिखा:

This is to acknowledge that my tweets on Prof Amartya Sen with regard to his tenure at Nalanda University were completely incorrect.

जब प्रोफेसर अमर्त्य सेन, सिगापुर के विदेश मंत्री श्री George Yeo, London School of Economics के प्रोफेसर मेघनाद देसाई, हांगकांग विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर वांग कुंग-वु, हार्वर्ड के प्रोफेसर सुगत बोस (सुभाष चंद्र बोस के भतीजा) सदृश विश्वविख्यात व्यक्ति नालंदा विश्वविद्यालय गवर्निंग बोर्ड के सदस्य नियुक्त हुये, बिहार के लोगों मे आशा बंधी कि इनके मार्गदर्शन में यह विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय ऊंचाई को छू सकेगा। “अमृत काल” में जब प्रोफेसर अमर्त्य सेन को बाहर किया गया, दूसरे सदस्यों ने भी त्यागपत्र दे दिया।

पोस्ट-अमर्त्य सेन युग की कुलपति महोदया ने सारा जीवन दक्षिण भारत के प्रांतीय विश्वविद्यालय के उस विभाग में अध्ययन और अध्यापन किया जहां उनके पिताश्री वरिष्ठ और सम्मानित प्राध्यापक थे। कुलपति महोदया ने जीवन में कभी भी किसी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिका या प्रकाशन गृह से शोधपत्र या पुस्तक प्रकाशित करने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने जेएनयू या अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के विश्वविद्यालयों से पढे लोगों को एक एक कर घास-मोथे की तरह उखाड़ फेंका। JNUite होने के बावजूद एक-दो लोग जिन्हें नहीं निकाला गया, वे संघ से जुडे हैं। युरोप-अमेरिका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से पीएचडी डिग्रीधारी प्रोफेसर की बहाली प्रोफेसर अमर्त्य सेन के समय मे हुयी थी, ने या खुद विश्वविद्यालय छोड दिया, या उन्हें हटा दिया गया। अपवाद अवश्य है, लेकिन  ऐसे लोगों का सिद्धांत होता है “तुम दिन की रात कहोगे, तो हम रात कहेंगे”।

राष्ट्रीय महत्व के विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित जेएनयू ने अपनी स्थापना के प्रथम दशक में ही अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर ली थी। मैं उस उत्थान के गिने-चुने भाग्यशाली साक्षियों में एक हूँ। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय आज बिहार के चौबीस विश्वविद्यालयों में अठारहवें पायदान पर खड़ा है

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