ये केवल एक मिनट बारह सेकेंड का वीडियो है

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सके पहले फ्रेम में सात पुलिसवाले दिख रहे हैं। सात से ज़्यादा भी हो सकते हैं। सभी पुलिसवालों के हाथ में बंदूकें हैं। सबने बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखे हैं। तरह-तरह की आवाज़ें आ रही हैं। तड़-तड़ गोलियों के चलने की आवाज़ें भी आ रही हैं। कैमरे का फ्रेम थोड़ा चौड़ा होता है। अब सात से अधिक पुलिस वाले दिखाई देते हैं। गोली की आवाज़ तेज़ हो जाती है। एक पुलिसवाला हवा में गोली चला रहा है।एक के हाथ की बंदूक नीचे है। एक पुलिसवाला सीने की ऊंचाई के बराबर गोली चला रहा है। दूसरी तरफ से दो तीन पुलिस वाले भागे आ रहे हैं। उनके आगे एक आदमी भागा आ रहा है। वह ढलान से उतरता हुए तेज़ भागा आ रहा है लेकिन सामने से पुलिस वाले भी तेज़ी से उसकी तरफ बढ़े जा रहे हैं। अब वीडियो के फ्रेम में कई पुलिस वाले दिखाई देते हैं। एक पुलिस वाला उस आदमी पर बंदूक ताने दिखता है। एक लाठी उठाए दिखता है। कुछ और पुलिस वालों के हाथ में लाठियां हैं। भागने वाले आदमी के हाथ में भी लाठी दिख रही है। गोलियों के चलने की आवाज़ आती जा रही है। निहत्था भागता आया आदमी नीचे गिरा दिखता है। यहां तक वीडियो के 9 सेकेंड हो चुके हैं। सिर्फ 9 सेकेंड में आप इतना कुछ होते देखते हैं। जितना कुछ ख़ुद को दिन रात महान और सहिष्णु बताने वाले इस मुल्क को आप कई हज़ार साल में नहीं देख पाते हैं।

अब अगले छह सेकेंड में जो दिखता है वह भयावह नहीं है। आपके लिए जो क्रूरता और बर्बरता है, वह किसी के लिए संवैधानिक कर्तव्य हो सकता है। संविधान जिसने सबको बराबर माना है। वीडियो के 9 से 15 सेकेंड के बीच कई पुलिस वाले उस गिरे हुए और मरे हुए आदमी पर टूट पड़ते हैं। लाठियों से मार रहे हैं। गोलियों के चलने की भी आवाज़ें आ रही हैं। लोगों की आवाज़ें भी आ रही हैं। सब कुछ मिटा देने की इस कार्यवाही में एक कैमरा है जो इस पूरे प्रसंग को मिटने से बचा रहा है। सभी गतिविधियों को रिकार्ड कर रहा है। वही कैमरा ज़रा और खुलता है या कहिए कुछ पुलिस वाले कैमरे के सामने से हट जाते हैं।

एक लड़का सा दिखाई देता है। वह वर्दी में नहीं है ।उसके कंधे से बेल्ट के सहारे एक बैग लटका है। गर्दन में उसने सफेद और लाल रंग का गमछा लपेटा है। यह गमछा असम की पहचान है। इस लड़के के हाथ में एक कैमरा भी है। यहां तक वीडियो के 26 सेकेंड हो गए हैं। मैंने पॉज़ कर दिया था ताकि पुलिस और उस लड़के की बर्बरता को एक एक फ्रेम में देख सकूं। बिना वर्दी वाला वह लड़का लाश की तरफ तेज़ी से दौड़ता हुआ जाता है और मरे हुए उस आदमी की छाती पर कूद जाता है। काफी ऊंचाई से कूदता है। मैंने ओलिंपिक में इसी तरह किसी को कूदते देखा था। नाम याद नहीं। किसे देखा था। कूदने के बाद वह लड़का तेज़ी से कैमरे की तरफ़ मुड़ता है। तभी एक सिपाही उस मरे हुए आदमी पर ज़ोर से डंडे मारता है। मरा हुआ आदमी कोई प्रतिकार नहीं करता है। मरा हुआ आदमी मरे हुए आदमी पर वार करता है। कैमरे वाला लड़का ख़ुद को संभालता है और इस बार गर्दन पर कूदता है। थोड़ा आगे आता है और फिर से मुड़ कर मरे हुए व्यक्ति की तरफ पहुंचता है और इस बार मुक्के से उसकी छाती पर मारता है। एक बार और मुक्के से मारता है। एक पुलिसवाला उसे ऐसा करने से रोकता है। वहां से हटाता है। यहां तक वीडियो के 35 सेकेंड हो चुके हैं ।

अब सारे पुलिसवाले कैमरे के फ्रेम से हट जाते हैं। इतना सब कुछ हो चुका है लेकिन रिकार्ड करने वाले कैमरे को थामने वाला हाथ नहीं कांपता है। स्थिर है। गोलियों के चलने की आवाज़ें आ रही हैं। बहुत से लोगों के हल्ला करने की भी आवाज़ पीछे से आ रही है। एक लाश पड़ी दिखाई देती है। जैसे वह गिरने से पहले सावधान मुद्रा में होने का अभ्यास कर रही हो। एक दूसरा आदमी लाश की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है। उसने जीन्स की पतलून पहनी है। पूरी बांह की कमीज़। वर्दी वाला नहीं है। रिकार्डिंग वाला है। उसके कंधे से भी एक बैग लटका है। जो कैमरा इन सबको होता हुआ रिकार्ड कर रहा है वो तेज़ी से लाश की तरफ बढ़ता हुआ लाश पर जाकर रुक जाता है। मैंने पॉज़ कर दिया है। 46 सेकेंड हो चुके हैं। प्ले कर देता हूं।

जिस व्यक्ति की मौत अब हर तरह के संदेह से परे हो चुकी है, उसने बनियान पहनी है। पुलिस के साथ भागा भागी में कुर्ता कहीं रह गया या वह बनियान में ही घर से निकला होगा। उसकी छाती पर चूड़ी बराबर गोलाई दिख रही है। जिसमें किसी ने लाल रंग भर दिया है। लगता है गोली छाती में सुराख़ बनाती हुई पार निकल गई है। ख़ून के छीटें भी दिखाई नहीं दे रहे हैं। गोली ने उतना ही सुराख़ किया है जितना उसे मारने के लिए ज़रूरी होगा। ख़ून के गोल धब्बे के अलावा बनियान एकदम साफ और सुरक्षित है। किस कंपनी का बनियान है, दूर से पता नहीं चलता है। उसकी लुंगी ऊपर तक मुड़ी है। हरे रंग की है। बायें पांव में रक्त के निशान हैं। सर के पास एक गमछा गिरा है। यहां तक वीडियो के 52 सेकेंड हो चुके हैं।

जैसे ही 54 सेकेंड होता है, अचानक वही बंदा तेज़ी गति से दौड़ता आता है और मरे हुए इंसान की छाती पर ज़ोर से कूद जाता है। इतनी ज़ोर से कूदता है कि खुद दूर जा गिरता है। वह फिर से वापस आता है और ज़ोर से उसकी छाती पर मुक्का मारता है। उसे रोकने जैसी आवाज़ें आ रही हैं। यहां तक वीडियो के 59 सेकेंड हो चुके हैं। एक पुलिस वाला लाश पर कूद कूद कर लात और मुक्का मारने वाले को हटा कर दूर ले जा रहा है। लाश अकेले में पड़ी है। 1 मिनट 12 सेकेंड हो चुका है।

इस 1 मिनट 12 सेकेंड के वीडियो को देखा जा सकता है। मुझे लगा कि मैं नहीं देख सकूंगा। आप भी देख सकते हैं। आए दिन आप इस तरह के वीडियो देखते रहते होंगे।

जिसमें लोग एक दूसरे को मार रहे हैं। पुलिस लोगों को मार रही है। आप पहले से ही मरे हुए हैं। आपको पता नहीं चलता है कि पुलिस देखने वालों को मार रही हैं। बता रही है कि इस तरह से मारे जाने की बारी किसी की भी आ सकती है।

इस देश में अदालत है। कई तरह की अदालतें हैं। कानून है। कानून की प्रक्रिया है। आप सभी ऐसा ज़रुर मानें। जैसा पुलिस कहे, वैसा ही मानिए। वर्ना 1 मिनट 12 सेकेंड से कम के वीडियो में आप निपटा दिए जाएंगे। ये विश्व गुरु भारत है।

मैंने वीडियो साझा नहीं किया है। महान फेसबुक के सामुदायिक नियमों को तोड़ना ठीक नहीं है। जब संवैधानिक नियमों को इस तरह तोड़ा जा रहा है तब फेसबुक के सामुदायिक नियमों की रक्षा में ही सबकी रक्षा है। आइये हम सब अंबेडकर जयंती मनाते हुए संविधान को छोड़ सामुदायिक नियमों का पालन करें। आमीन। जय हिन्द।

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