शिक्षा में बदलाव के लिए कुछ खिड़कियां खुली हैं

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[dropcap]सं[/dropcap]विधान के मुताबिक ‘लोकतांत्रिक गणराज्य’ बनाने के लिए बराबरी, न्याय, स्वतंत्रता और बंधुता मूलभूत मूल्य हैं। लेकिन शिक्षा व्यवस्था गैर-बराबरी और भेदभाव की बुनियाद पर खड़ी की गई है जबकि सबको समतामूलक शिक्षा मुहैय्या करना संवैधानिक तकाज़ा था। विडंबना है कि जितनी परतों में समाज बंटा हुआ था उतनी ही परतों में बंटी शिक्षा व्यवस्था खड़ी करके शिक्षा की परिवर्तनकामी धार कुंद कर दी। वैश्वीकरण के तीस सालों के दौर की नीतियों ने तो सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को ही ध्वस्त करने का काम किया ताकि शिक्षा का बाज़ारीकरण तेज़ किया जा सके। आज प्रायवेट शिक्षा, वैश्विक पूंजी के लिए कुशल लेकिन गुलाम मज़दूर तैयार कर रही है, न कि लोकतांत्रिक नागरिक।

इस संदर्भ में शिरीष खरे की यह पुस्तक नई रोशनी लेकर आई है। लेखक ने पांच राज्यों के दूरदराज के इलाकों में सरकारी स्कूलों के बेहतरीकरण के लिए शिक्षकों, पालकों, समुदायों व पंचायतों द्वारा की गई पहलकदमियों की प्रेरणादायक कहानियां दर्ज़ की हैं। ये कहानियां, बदलाव की तीन अहम संभावनाओं को उजागर करती हैं। पहला, सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सभी तबकों के बच्चों के लिए बेहतरीन करना मुमकिन है। दूसरा, बहुजन (आदिवासी, दलित, ओबीसी, मुस्लिम, विमुक्त व घुमन्तू जाति) बच्चे कभी भी ‘ड्रॉप-आऊट’ नहीं होते वरन् पूरी स्कूली व्यवस्था और माहौल के द्वारा वे ‘पुश-आऊट’ या बेदखल किए जाते हैं। तीसरा, यह मिथक है कि प्रायवेट स्कूल बेहतर होते हैं और सरकारी स्कूल घटिया। जब स्कूलों में बदलाव लाए गए तो न केवल पालकों ने बच्चों को प्रायवेट स्कूलों से निकालकर सरकारी स्कूलों में भेजा लेकिन बहुजनों के बेदखल किए गए बच्चे-बच्चियां भी स्कूल आने लगे यानी पूरे गांव या इलाके का सरकारी स्कूल पर भरोसा लौट आया।

एक और सबक। बदलाव के सब दरवाजे बंद नहीं हुए हैं, कम-से-कम खिड़कियां अधखुली हैं। चुनौती है कि हम देशव्यापी सामाजिक हस्तक्षेप के ज़रिए लाखों सरकारी स्कूलों में जहां ज़रा-सी भी गुंजाइश दिखे वहां स्थानीय जनचेतना के ज़रिए अधखुली खिड़कियों को पूरा खोल दें ताकि सबको समतामूलक गुणवत्ता की शिक्षा मिले और भारत को उसकी ऐतिहासिक गैर-बराबरी व भेदभाव से मुक्त किया जा सके।

पुस्तक से एक स्टोरी :

यहां कैसे बच्चों ने बदल दिया अपना टाइम

एक सरकारी शिक्षक ने पढ़ाने की एक नई पद्धति के सहारे बच्चों के लिए समय-सारणी से जुड़ी कुछ गतिविधियों को अमल में लाकर महज छह महीने में स्कूल की तस्वीर बदल दी है। इस दौरान यहां बच्चों की उपस्थिति एक तिहाई बढ़ गई है। यही वजह है कि महाराष्ट्र के दूरदराज के गांव का यह स्कूल इन दिनों ‘समय के सदुपयोग’ के मुद्दे पर दूर-दूर तक चर्चा के केंद्र में है। यहां के शिक्षक ने सप्ताह में दो से तीन बार अतिरिक्त सत्र आयोजित किए और ऐसी गतिविधियों को अंजाम दिया कि अधिकतर बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि जाग गई। और तो और, उनमें अपने सहपाठियों के प्रति ऐसा लगाव भी पैदा हो गया कि आज पूरे स्कूल का वातावरण मैत्रीपूर्ण नजर आता है।

शिक्षक के कौशल और उनकी लगातार कोशिशों का ही नतीजा है कि बच्चों में आत्मविश्वास तो बढ़ ही रहा है, वे अपनी दिनचर्या के कई काम समय पर पूरे कर रहे हैं। बात हो रही है औरंगाबाद जिले से करीब 50 किलोमीटर दूर के शासकीय प्राथमिक शाला बनशेंद्रा की। वर्ष 1914 में स्थापित इस मराठी माध्यम की शाला में कुल 143 बच्चे और प्रधानाध्यापक सहित छह शिक्षक हैं। शिक्षक योगेश रिंदे के मुताबिक, इस प्रयोग का नतीजा यह हुआ कि आज 80 प्रतिशत से अधिक बच्चे अपना होमवर्क पूरा करके कक्षा में आते हैं, जबकि पिछले सत्र में 40 प्रतिशत बच्चे ही होमवर्क करते थे। इसी तरह, पिछले सत्र में 19 बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया था। पर, इस सत्र में अब तक किसी बच्चे ने स्कूल नहीं छोड़ा है।

उनकी मानें तो बच्चों में पढ़ाई की गुणवत्ता पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है और वे एक-दूसरे से भी काफी कुछ सीख रहे हैं। फिर, घर और खेत के कामों में भी समय देने से उनकी इस आदत को बनाए रखने के लिए उन्हें शिक्षक के साथ ही परिजनों का भी सहयोग मिल रहा है। योगेश की मानें तो इस परिवर्तन के पीछे की वजह यह है कि उन्होंने पढ़ाने के पारंपरिक तौर-तरीके से अलग कुछ विशेष तरह की गतिविधियां कराईं। इसमें उन्होंने बच्चों को उनकी सुविधा से खुद उनकी समय-सारणी बनवाने में मदद की। इसलिए, ज्यादातर बच्चे अच्छी तरह से अपनी-अपनी समय-सारणियों का पालन कर पा रहे हैं। खास तौर से चौथी और पांचवीं के बड़े बच्चे अधिक अनुशासित हुए हैं।

उम्मीद की पाठशाला
शिरीष खरे
अगोरा प्रकाशन, बनारस
पृष्ठ: 136
मूल्य: 150 रुपए

पहले बच्चे थे सिरदर्द

बता दें कि करीब ढाई हजार की जनसंख्या के इस गांव में अधिकतर मजदूर और किसान परिवार हैं। लिहाजा, इन बच्चों के परिजन खेतों में मजदूरी करने जाते हैं। स्कूल में आयोजित इन सत्रों से पहले वे अपने कामों में हाथ बटाने के लिए कई बार बच्चों की जरूरत से ज्यादा मदद लेते थे। इसके लिए वे बच्चों को अक्सर अपने साथ या तो खेत ले जाते थे, या फिर उन्हें घर पर रखवाली के लिए छोड़ते थे। कुछ लड़के गाय, भैंस और बकरियां चराने गांव से बाहर निकल जाते थे, जबकि कुछ लड़कियां घर पर या तो खाना बनाने में मां की मदद करतीं, या फिर अपने छोटे भाइयों को संभालने जैसे कामों में पूरा समय बितातीं। ऐसे में ज्यादातर बच्चों का स्कूल से कोई विशेष लगाव नहीं था। ऐसे बच्चे कभी-कभार स्कूल आते भी थे तो देरी से और आमतौर पर होमवर्क नहीं करते थे, इसलिए शिक्षकों को कक्षा में दुबारा पढ़ाना पढ़ता था।

योगेश के मुताबिक इन गतिविधियों को कराने के करीब तीन महीने बाद तक सिर्फ एक चौथाई बच्चे ही समय पर स्कूल आते थे और अपना होमवर्क पूरा करते थे। दूसरी तरफ, ज्यादातर बच्चे पढ़ाई में पीछे रहने की वजह से हीनभावना का शिकार थे। वे कहते हैं, ‘बच्चे अव्यवस्थित रहते थे। वजह, हमारे बच्चों ने खेलकूद या घर, स्कूल और खेत के कामों को करने के लिए समय प्रबंधन की कोई योजना नहीं बनाई थी। इसलिए, वे कोई भी काम अच्छी तरह से नहीं कर पाते थे। कई बार बहुत सारे काम वे खुद नहीं कर पाते थे। इसलिए, हमें उन्हें अलग-अलग बताना पड़ता था। इससे हमारा काम और मुश्किल हो जाता था। फिर, हमारी कक्षा के बच्चे भावनात्मक रूप से एक नहीं थे।’

स्कूल सरकारी उम्मीद की पाठशाला
उम्मीद की पाठशाला का कवर पेज

राजू की दिनचर्या से लिया सबक

योगेश के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन गई थी और वे बच्चों को अच्छी तरह से पढ़ाने के लिए इस तस्वीर को हर हालत में बदलना चाहते थे। उसके बाद, योगेश ने कक्षा चौथी की पुस्तिका में ‘राजू की दिनचर्या’ और ‘मेरी दैनिक समय-सारणी’ जैसे पाठ पढ़े तो विचार किया कि राजू की तरह यदि उनकी कक्षा के बच्चे भी खुद अपने समय का सही उपयोग करना सीख गए तो उनके स्कूल की स्थिति बदली जा सकती है। फिर, उन्होंने इन पाठों को पढ़ाने की बजाय बच्चों के साथ एक मंनोरंतक गतिविधि कराई। पहले योगेश ने बच्चों को पुस्तिका से राजू नाम के बच्चे की समय-सारणी दिखाई। फिर उन्होंने बच्चों से राजू की दिनचर्या से जुड़े कुछ प्रश्न पूछें। फिर, बच्चों की जोड़ियां बनाकर इन प्रश्नों पर चर्चा करने के लिए कहा कि क्या राजू अपने समय का सही उपयोग करता है? क्या उसकी समय-सारणी में कुछ सुधार की जरूरत है?

फिर, चर्चा के बाद हर जोड़ी से राजू की नई समय-सारणी बनाने के लिए कहा। इसमें बच्चों ने खुद बताया कि यदि राजू टीवी कम देखे तो उसे खेलने के लिए पर्याप्त समय मिल सकता है। बच्चों ने ही बताया कि राजू को खेल और पढ़ाई के लिए कब-कब और कितना-कितना समय देना चाहिए। इसी तरह, उन्होंने यह भी बताया कि यदि राजू को चित्र बनाने की कला सीखनी है तो उसे चित्र बनाने में कितना समय देना चाहिए। उसके बाद, बच्चों ने खुद अपनी समय-सारणी बनाईं और एक-दूसरे की समय-सारणियों को मूल्यांकन करके उनमें आवश्यक सुधार लाने के लिए सुझाव दिए।

योगेश के अनुसार, ‘करीब एक महीने बाद कुछ बच्चों में शुरुआती बदलाव दिखने लगे।’ जाहिर है बच्चों ने अपनी समय-सारणी खुद अपने हाथों से तैयार की थीं। इसलिए, इसका पालन करना उनके लिए अधिक आसान था। योगेश की मानें तो अपनी कक्षा में ‘राजू की दिनचर्या’ और ‘मेरी दैनिक समय-सारणी’ जैसी गतिविधियों को कराने से पहले उन्होंने खुद अपने लिए समय-सारणी बनाई थी और करीब एक सप्ताह तक अपनी बनाई समय-सारणी के हिसाब से अपनी दिनचर्या तैयार की थी। वे कहते हैं, ‘जब मेरे दिन के सारे महत्त्वपूर्ण काम समय पर अच्छी तरह से होने लगे तो मुझे आत्मविश्वास आया कि इस तरह की गतिविधियां बच्चों पर भी लागू कराई जा सकती हैं।’

पूरे गांव के लिए डिजाइन किया टास्क

प्रश्न है कि क्या बच्चों की समय-सारणी बनने भर से स्थिति बदली जा सकती थी? उत्तर है- नहीं। यही वजह है कि इस शिक्षक ने इस बात को ध्यान रखने के लिए एक विशेष रणनीति पर काम करना शुरु किया। वे कुछ दिनों तक सुबह स्कूल लगने के पहले और शाम को स्कूल छूटने के बाद बच्चों के परिजनों से मिलते। उन्हें शिक्षा का महत्व बताते हुए उनके बच्चों की समय-सारणियों का पालन कराने के लिए समझाने का प्रयास करते। उसके बाद, योगेश ने बच्चों और परिजनों से चर्चा करके मुख्य समस्याओं की एक सूची तैयार की। इसमें ‘बच्चों की समस्याएं’ और ‘पालकों की समस्याएं’ नाम से दो खाने बनाएं और उसे वर्गीकृत किया। इस दौरान कई तरह की बातें उभरकर आईं। जैसे कि कई बार बच्चे सुबह समय पर नहीं उठते हैं। इसलिए, न घर के काम ही कर पाते हैं और न ही समय पर स्कूल ही पहुंच पाते हैं। इसलिए, उन्हें घर और स्कूल दोनों जगह डांट झेलनी पड़ती है।

योगेश बताते हैं कि कुछ दिनों बाद उन्होंने बच्चों और परिजनों के बीच एक बैठक आयोजित की। इसमें तय हुआ कि बच्चों से परिजनों की अपेक्षाएं क्या हैं और उसके लिए बच्चे किस हद तक मदद करने के लिए तैयार हैं। इसके बावजूद, ज्यादातर बच्चों को शुरुआत में समय-सारणी का पूरी तरह से पालन करना मुश्किल हो रहा था। पर, करीब तीन महीने बाद ज्यादातर बच्चों ने खुद को समय-सारणी के अनुरूप ढाल लिया। इसका नतीजा यह है कि उनके ज्यादातर काम समय पर पूरे होने लगे। कक्षा चौथी की समृद्धि मोलिंगे बताती हैं, ‘मेरी कक्षा में बीस बच्चे हैं। इसमें अठारह बच्चे तो समय-सारणी का अच्छी तरह से पालन करते ही हैं।’

उसके बाद, शिक्षक के लिए सभी बच्चों को एक साथ पढ़ाना आसान हो गया। यदि कोई बच्चो पढ़ाई में पीछे रहता तो दूसरा बच्चा उसकी मदद करता। इससे पढ़ाई में कमजोर कई बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ने लगा। इस स्कूल में पढ़ने वाली प्रिया सोनवाने नाम की बच्ची के पिता राजेन्द्र सोनवाने चर्चा में बताते हैं कि उनकी बेटी ने दो तरह की समय-सारणी बनाई हैं। पहली समय-सारणी में उसके दिन भर की योजना होती है। दूसरी समय-सारणी में महीने भर की योजना होती है। इन समय-सारणियों में उसने स्कूल और स्कूल बाद के समय में किए जाने वाले कामों को लिखा है। आकाश घाडगे के पिता भारत घाडगे के मुताबिक, ‘आकाश अब समय पर नहाने में आनाकानी नहीं करता। वह साफ कपड़े पहनता है। सफाई का बहुत ध्यान रखता है।’

योगेश बताते हैं कि यह हमारी छह-आठ महीनों की मेहनत और उनसे लगातार संवाद करते रहने का नतीजा है कि ज्यादातर बच्चों के परिजन अब बच्चों से बहुत ज्यादा काम नहीं कराते हैं। स्कूल द्वारा बच्चों के परिजनों को विभिन्न कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाता है तब उनसे बच्चों की प्रगति के बारे में चर्चा की जाती है और इस दौरान दोनों तरफ से बाधा डालने वाली बातों को सुलझाने की कोशिश की जाती है। ज्यादातर बच्चों से बातचीत से यह स्पष्ट होता है कि पढ़ाई के मामले में उनमें किसी तरह की कोई हीनभावना नहीं है। अंत में आदित्य खैरनार नाम का बच्चा कहता है, ‘अब हम परीक्षा में पास तो हो ही सकते हैं। इसके अलावा भी बहुत कुछ कर सकते हैं!’

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