ईन्यूज़रूम: बात CBI inquiry पर अटकी है। क्या आपको लगता है कि सीबीआई जांच ज़रूरी थी और इसी वजह से protest लंबा खिंचा? सरकार कह रही है कि 98% demands पूरी हो चुकी हैं। फिर विरोध जारी रहने की वजह क्या है?
नेहा बोरा: इसमें दो चीज़ें हैं। पहली बात, JPSC-CGL को रद्द करने की मांग नहीं की गई है। उसमें एक तकनीकी पहलू है, क्योंकि भर्तियां हो चुकी हैं। लेकिन इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि paper के mismanagement के बाद जिन छात्रों के साथ अन्याय हुआ, उनके न्याय की मांग गलत है।
दूसरी बात CBI inquiry की है। अब ये भी सबकी मांग नहीं है। मैं जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम गई थी। वहां अलग-अलग समूहों में छात्र बैठे हैं और उनमें से सब लोग ये नहीं कह रहे हैं कि सीबीआई से जांच कराई जाए।
सीबीआई को लेकर एक और सवाल है। अगर हम जेपीएससी की बात करें, तो जेपीएससी-1 और जेपीएससी-2 में जो बड़ा भ्रष्टाचार सामने आया था, उसकी जांच भी सीबीआई कर रही थी। आज तक उसका कोई नतीजा नहीं निकला। इतने सालों बाद भी वह जांच, एक तरह से, चल ही रही है। अगर पहले की जांच का ही कोई नतीजा नहीं निकला, तो उसी एजेंसी से एक और जेपीएससी जांच कराने का क्या तुक बनता है?
और दूसरी बात, सीबीआई पिछले कुछ सालों में जिस तरह बदली है, उसे भी देखना होगा। 2024 में NEET paper leak की जांच भी सीबीआई को सौंपी गई थी। जिन लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए थी, उनके खिलाफ 90 दिनों के अंदर chargesheet दाखिल नहीं हुई और अदालत ने उन्हें तकनीकी आधार पर छोड़ दिया।
आप समझिए, इस तरह की संस्थाओं से उम्मीद होती है कि वे जल्द से जल्द जांच पूरी करके अपनी रिपोर्ट या चार्जशीट पेश करें। अगर वो इस तरह काम करेंगी तो हम उन पर भरोसा कैसे जता पाएंगे?
और आपने जो पूछा, उसका एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू और है। कल जिस तरह छात्रों पर बार-बार लाठीचार्ज हुआ, water cannon चलाए गए, हमारे दर्जनों साथी सदर अस्पताल में भर्ती हुए—रात में उन्हें इतनी चोटें लगी थीं। इस तरह का राज्य दमन बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है।
अगर आप INDIA alliance का हिस्सा होते हुए खुद को BJP के मुकाबले एक बेहतर विकल्प के रूप में खड़ा करना चाहते हैं, तो आपको राजनीति में भी वही करना होगा। आप लगातार ये नहीं कह सकते कि बीजेपी को मत जिताइए, हम भाजपा से अलग हैं, हम छात्रों के पक्ष में हैं और उसी समय छात्रों के साथ वही सलूक करें जो बीजेपी कर रही है। दोनों चीज़ें साथ में नहीं हो सकतीं।
इसलिए झामुमो की झारखंड सरकार की तरफ से छात्रों पर इस तरह का बर्बर दमन कतई बर्दाश्त नहीं है। ये बिल्कुल शर्मनाक है। झारखंड सरकार को जल्द से जल्द इन मुद्दों को सुलझाकर छात्रों की जितनी भी मांगें हैं, उन्हें मानने की तरफ बढ़ना चाहिए—उनके ऊपर लाठी चलाने के बजाय।
हेमंत सोरेन की चुप्पी पर क्यों उठ रहे सवाल
ईन्यूज़रूम: हेमंत सोरेन की अभी तक छात्रों से मुलाकात नहीं हुई है। राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर बयान दिया है। क्या आपको लगता है कि हेमंत सोरेन को अब तक छात्रों से मिलकर बात कर लेनी चाहिए थी?
नेहा बोरा: बहुत देर हुई है। उनको अब तक मिलकर बात कर लेनी चाहिए थी। और राहुल गांधी ने कल जिस तरह इसकी निंदा की है, वह भी महत्वपूर्ण है।
मैं झारखंड में CPI(ML) का काम देखती रही हूं। सीपीआई (एमएल) भी छात्रों के साथ खड़ी है। कल अरूप जी ने भी विधानसभा में ये मुद्दा उठाया और मंत्री को जवाब देना पड़ा।
तो ये दोनों चीज़ें—जो आप लोगों का रुख है और राहुल गांधी का रुख—छात्रों के समर्थन में दिख रहा है। कांग्रेस का भी रुख छात्रों के समर्थन में दिख रहा है। तो इस बीच हेमंत सोरेन क्यों छूट जा रहे हैं?
अब जिनकी सरकार है और जिनसे सवाल पूछे जा रहे हैं, उनके लिए मुश्किल स्थिति हो गई है। यही बात है।
वरना अगर आप सच में इस जद्दोजहद में शामिल हैं कि हिंदुस्तान की जम्हूरियत, हिंदुस्तान का लोकतंत्र और हिंदुस्तान का संविधान बचाएंगे, तो इस जद्दोजहद में आपको सिर्फ चुनाव में बीजेपी का विरोध नहीं करना है।
सिर्फ बीजेपी का विरोध नहीं, बेहतर मिसाल भी देनी होगी
ईन्यूज़रूम: यानी गैर-बीजेपी सरकारों को भी बीजेपी से बेहतर उदाहरण पेश करना होगा?
नेहा बोरा: बिल्कुल। अलग-अलग राज्यों में जो गैर-बीजेपी सरकारें हैं, उनको उदाहरण दिखाना होगा कि BJP सरकार क्या नहीं कर रही है और क्यों BJP को सत्ता से बेदखल करने की जरूरत है।
फिलहाल JMM की सरकार इस चीज़ में नाकाम हो रही है। सीधा उदाहरण है—नेतृत्व करने के बजाय वह वही चीज़ें दोहरा रही है।
झारखंड में JPSC को लेकर, उसके गठन से लेकर अभी चौदहवीं तक, लगातार इस तरह की गड़बड़ियां रही हैं। झारखंड में युवाओं की बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था के ढहते हुए ढांचे के लिए भाजपा भी बराबर जिम्मेदार है, क्योंकि वही लंबे समय तक सत्ता में रही है।
लेकिन इसके बावजूद अगर झारखंड की सरकार वही चीज़ें दोहराती है, वही चीज़ें उसकी सत्ता में भी होती हैं, तो उसे भी बेदखल किया जा सकता है—जैसे BJP को बेदखल किया गया।
राहुल गांधी में बदलाव दिखता है, लेकिन उम्मीद सवालों से परे नहीं
ईन्यूज़रूम: आपकी राहुल गांधी से मुलाकात हुई है। एक नेता के तौर पर आपको राहुल गांधी कैसे दिखते हैं? क्या आपको उनमें वही बदलाव दिखता है, जो किसान आंदोलन के समय दिखा था? क्या आप उनमें राजनीतिक भविष्य देखती हैं?
नेहा बोरा: देखिए, जब तक वो हमारे मुद्दों के साथ हैं, हमारे साथ बोलते हैं, तब तक देखेंगे।
और जब उनको ये महसूस होगा कि हमें ये सब करने की जरूरत नहीं है, हम लोगों से और जन आंदोलनों से परे हैं, तो वो खुद अप्रासंगिक हो जाएंगे—हम सबके लिए और इस देश के लिए।
सत्ता चाहे जिसकी हो, सवाल तो पूछे जाएंगे
ईन्यूज़रूम: यानी अगर राहुल गांधी में ये बदलाव आया, तो आप उनसे भी सवाल करेंगी?
नेहा बोरा: क्यों नहीं करेंगे? जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब क्या हमने सवाल नहीं किए थे? तब भी बहुत सवाल किए थे और तब भी बहुत दमन झेला था।
अभी भी अगर ऐसा होगा तो बिल्कुल सवाल करेंगे। हम किसी पार्टी के प्रवक्ता तो हैं नहीं।
हमारा काम है कि जमीन से जो आवाज़ आ रही है, जो मुद्दे उठ रहे हैं और जिन्हें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, उन मुद्दों के प्रति हमारी निष्ठा और ईमानदारी रहे।
पार्टियां बदल सकती हैं, जो सत्ता में है वो बदल सकता है। मैं खुद एक पार्टी की सदस्य हूं, लेकिन हमने हर दौर में सत्ता पक्ष के सामने सवाल उठाए हैं और हर सत्ता पक्ष का दमन झेला है।
क्योंकि हमारी निष्ठा सत्ता के प्रति नहीं, जनता के प्रति है।
हाशिए के लोगों को नेतृत्व तक लाने की आइसा की कोशिश
ईन्यूज़रूम: आइसा को 30 साल हो गए हैं। महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने में आइसा की भूमिका को आप कैसे देखती हैं?
नेहा बोरा: एक छात्र संगठन होने के नाते, हमारी मूल राजनीतिक समझ में से एक बात ये है कि समाज के जो हिस्से हाशिए पर हैं, उनको नेतृत्व के लिए तैयार किया जाए। उनको राजनीतिक प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वे नेतृत्व संभाल सकें।
क्योंकि मुझसे पहले जो लोग थे, उन्होंने ये काम ईमानदारी से किया। इसलिए आइसा से हमेशा महिला नेतृत्व और हाशिए पर मौजूद लैंगिक पहचानों से आने वाली लीडरशिप आती रही है। हाशिए पर मौजूद धार्मिक समुदायों से आने वाले लोग भी नेतृत्व में रहे हैं।
और इसलिए मैं इस संगठन का हिस्सा हूं और किसी और संगठन का नहीं।
दक्षिणपंथी माहौल से बाहर आने की अपनी जद्दोजहद
ईन्यूज़रूम: आपने कई जगह कहा है कि आपका पारिवारिक माहौल right-wing mentality वाला था। उस सोच से बाहर आने और आज की आपकी जिंदगी तक पहुंचने में आइसा और left politics का कितना बड़ा योगदान रहा?
नेहा बोरा: मुझे लगता है कि मेरी family की राजनीतिक समझ के साथ मेरी जो जद्दोजहद रही है, वो इस देश के न जाने कितने लाखों-करोड़ों छात्रों और युवाओं की अपने परिवार के साथ जद्दोजहद है।
हर पीढ़ी का एक coming of age होता है। जब आप ये समझने की कोशिश कर रहे होते हैं कि एक व्यक्ति के तौर पर आपकी दुनिया और खुद के बारे में क्या समझ है, तब आप अपने पुराने विचारों पर सवाल करते हैं।
ये अपने family के खिलाफ कोई rebellion नहीं है। ये अपनी ही पुरानी समझ को सवालों के घेरे में लाने की प्रक्रिया है।
जो चीज़ें हम अभी तक सच समझते आए हैं, जब आप उनको एक critical lens से देखते हैं, सवाल करते हैं, तो कभी-कभार आपको लगता है कि पहले हम चीज़ों को जिस तरह सोचते और समझते थे, अब वैसे नहीं देखते।
इसलिए ये जद्दोजहद चलती है। और हर generation में चलती है।
और क्योंकि मैं बंगाल में हूं, तो इसके बारे में बोलूंगी। मेरी ये जद्दोजहद university में शुरू नहीं हुई थी। मेरी जद्दोजहद school में शुरू हुई थी।
मैं सिलीगुड़ी में पढ़ती थी। वहीं मेरी पढ़ाई हुई—दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं। वहां मेरे शिक्षक थे। मेरी अंग्रेजी की शिक्षिका श्रीमंती मैम, श्रीमंती गुप्ता, अर्थशास्त्र के शिक्षक खुर्रम सर—इन सब शिक्षकों ने मुझे उस तरफ धकेला।
Left की तरफ नहीं, बल्कि right से दूर धकेला।
और शायद क्योंकि मैं बंगाल में थी, मैंने चारू मजूमदार का नाम सुना, नक्सलबाड़ी सुना, शहीदों के नाम सुने, टैगोर सुना, खुदीराम बोस सुना। अगर मैं कहीं और होती तो शायद ये सब नहीं सुनती।
मैंने ये बातें सुनीं, अपने दोस्तों से भी सुनीं। भले ही left की तरफ मैंने school में एक कदम नहीं बढ़ाया हो, लेकिन right से दूर एक कदम मैंने जरूर बढ़ाया।
मुझे लगता है, ये चीज़ मैंने यहीं से सीखी।
दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं में जब आपकी जद्दोजहद तेज होती है और जिन लोगों से आप घिरे होते हैं, वो कहीं न कहीं ये तय करते हैं कि आप आगे क्या करेंगे और क्या देखेंगे।
तो मुझे लगता है, सिलीगुड़ी और बंगाल का योगदान रहा है मुझे left की तरफ कदम बढ़ाने और right से दूर जाने में।
सिलीगुड़ी और बंगाल ने कैसे बदली राजनीतिक सोच
ईन्यूज़रूम: आपने अभी coming of age की बात की। हम सबने इस protest को closely watch किया है। System से fight बहुत बड़ी और लंबी होती है। क्या आपको लगता है कि इस movement ने young लोगों में वो patience और fight का जज़्बा पैदा किया है, जो इसे आगे ले जा सके?
नेहा बोरा: मुझे नहीं लगता कि मैं इतनी जल्दबाजी में बोलूंगी कि हां, सब सही हो गया है।
लेकिन मुझे लगता है, लड़ने के लिए एक सपना जरूरी होता है। और उस सपने के लिए आप लड़ सकते हैं, उसके लिए संघर्ष कर सकते हैं—इस चीज़ का भरोसा भी जरूरी होता है।
एक बेहतर दुनिया का सपना तो हम सब लेकर चलते हैं। कहीं न कहीं वो सपना broad हो सकता है, उसकी भाषा और rich हो सकती है, लेकिन एक बेहतर दुनिया में हम जिएं—ये तो सबका सपना है, है ना?
लेकिन इस बेहतर दुनिया को बनाने में जो संघर्ष लगता है, उसमें आपका योगदान रह सकता है—इस चीज़ का भरोसा इस आंदोलन ने युवाओं को दिया है।
अब इस भरोसे को बनाए रखना हम सबका काम है। छात्र संगठनों का काम है। जो लोग राजनीतिक हैं, जो जानते हैं, लिखते-पढ़ते हैं, विश्वविद्यालय में रहने-पढ़ने वाले लोगों का काम है कि ये भरोसा, जो युवाओं को आज मिला है, उसे जिंदा रखें।
आज उन्हें लगभग लगता है कि अगर वे जद्दोजहद में लगे रहें तो उस सपने को छू सकते हैं। उस सपने के प्रति समर्पण और राजनीतिक प्रतिबद्धता को जिंदा रखना और ये भरोसा जिंदा रखना कि हम संघर्ष में शामिल हो सकते हैं, हम उस दुनिया को बदल सकते हैं जिसने हमारा जीना मुश्किल कर दिया है—ये दोनों चीज़ें बनाए रखना हमारा काम है।
युवाओं का भी काम है कि इस पर बराबर खाद-पानी डालते रहें। मौसम के साथ कितना खाद-पानी देना है, इसका हिसाब लगाते रहना—ये एक राजनीतिक प्रक्रिया है।
इस राजनीतिक प्रक्रिया में हमें लंबे समय तक रहना है। इस आंदोलन को खाद-पानी देते रहना है।
और क्यों नहीं होगा ऐसा? लंबे समय के इतिहास में, पूरी दुनिया में युवाओं ने अपने देशों की ताकतों, सत्ता और राजनीति को बदला है। हिंदुस्तान में भी यकीनन होगा।
उमर खालिद के नाम को गाली नहीं, सवाल की तरह देखना होगा
ईन्यूज़रूम: आपने जिस तरह की ink attack का सामना किया और क्योंकि आप उमर खालिद को support करती हैं, क्या future में भी आपका stand उनके साथ वैसा ही रहेगा? आज उमर खालिद का birthday भी है। आप उनके बारे में कुछ कहना चाहेंगी?
नेहा बोरा: देखिए, पहली बात तो मेरे ऊपर स्याही इसलिए नहीं फेंकी गई क्योंकि मैं उमर खालिद की समर्थक हूं। मेरे ऊपर स्याही इसलिए फेंकी गई क्योंकि उन लोगों को बहुत बुरा लगा कि उनके Education Minister को इस्तीफा देना पड़ा और बेइज्जत करके सत्ता से बाहर किया गया। अभी भी BJP और RSS को support करने वाले लोगों में उस चीज़ की नाराज़गी है।
दूसरी बात उमर की है। ये बहुत महत्वपूर्ण और बहुत दुख की बात है। जब आप उमर का नाम लेते हैं, तो जो लोग उमर को एक गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं, वे खास तौर पर इसलिए उनका नाम लेते हैं ताकि लोग उसके बाद क्या बोला जाएगा, वो सुनना ही बंद कर दें।
उमर के नाम को एक trigger की तरह इस्तेमाल किया जाता है कि इसके बाद जो भी बोला जाएगा, आपको उसको बुरी नज़र से देखना है।
जबकि ये कितनी दुख की बात है, क्योंकि उमर जिस राजनीति से आते थे, वो असहमति का सम्मान करने वाली राजनीति थी।
वो जिन लोगों से प्रेम करते हैं, जिन लोगों के साथ संघर्ष करते हैं, उनसे जुड़ पाते थे। और जिन लोगों से बुनियादी स्तर पर असहमत थे—BJP-RSS के साथ—उनको भी आलोचना कर पाते थे, बिना अपनी असहमति को हिंसा में बदले।
उमर इन सब चीज़ों को सामने रखते थे। और इतनी दुख की बात है कि right wing आज उनको इस्तेमाल कर रहा है इन तमाम चीज़ों को देश की चेतना से गायब करने के लिए।
दूसरी बात, उमर के संघर्ष के बारे में अगर हम बात करें, तो मैं आज के युवाओं से कहना चाहूंगी—अगर आप उमर के बारे में बात कर रहे हैं, तो पढ़िए। उमर क्यों जेल में हैं? उनके मुकदमे की क्या स्थिति है?
आप पढ़िए। उमर की लड़ाई राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्र-विरोध की लड़ाई नहीं है।
उमर की लड़ाई इस चीज़ की लड़ाई है कि एक देश में, जिसमें एक मजबूत न्याय व्यवस्था स्थापित की गई, जिसमें कानून-व्यवस्था की व्यवस्था स्थापित की गई, आज UAPA जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करके उस न्यायिक प्रक्रिया को ध्वस्त किया जा रहा है।
एक आम नागरिक को जो अधिकार संविधान ने हमें, हमारे गणराज्य की बुनियाद में, दिया—कि हर इंसान को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है और न्यायपालिका उचित प्रक्रिया के बाद तय करे कि कौन दोषी होगा और कौन नहीं—उस संवैधानिक आदर्श को ध्वस्त किया जा रहा है।
और मुख्यधारा का मीडिया इस न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए doctored videos और झूठ के माध्यम से उमर का मुकदमा भी कर देता है और सज़ा भी सुना देता है। पूरी दुनिया के सामने उन्हें दोषी साबित कर देता है।
जो लोग उमर के नाम पर अपना कान बंद कर देते हैं, क्या उन्हें पता है कि उनके खिलाफ क्या आरोप हैं?
उनके खिलाफ राष्ट्र-विरोध के आरोप नहीं हैं। उनके खिलाफ ये आरोप बिल्कुल नहीं हैं कि उन्होंने ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा लगाया। ये तमाम आरोप उनके खिलाफ नहीं हैं।
आप पता करो कि उनके खिलाफ क्या आरोप है। क्या आपको पता है कि उनका मुकदमा शुरू नहीं हुआ है?
क्या आपको पता है कि जब वो अपना PhD thesis लिखते हैं, तो उसमें उस section के बारे में research करते हैं, tribal section के बारे में लिखते हैं, आदिवासियों के बारे में लिखते हैं—जो लंबे समय से इस देश में हर परिभाषा से अपने अधिकारों से वंचित रहे हैं?
क्या आप ये सब जानते हैं?
अगर नहीं जानते हैं, तो जानिए। आप देश के युवा लोग हैं। ये देश किस दिशा में जाएगा, ये आप तय करेंगे।
आपको इतने शोर की वजह से, कुछ नाम सुनकर आपके दिमाग में जो alarms बजने लगते हैं, उनको बंद करना होगा। Right-wing ecosystem यही चाहता है कि आप सोचने-समझने की क्षमता खो दें।
अगर आपको इसे लड़ना है, तो आपको अपनी सोचने-समझने की क्षमता वापस हासिल करनी होगी।
जो तमाम चीज़ें anti-national बोल दी गई हैं, घोषित कर दी गई हैं, आपको उनके बारे में पढ़ना होगा।
उमर एक brilliant scholar थे। मेरी university से थे। उनका मुकदमा छह साल से न होना सिर्फ उनके बारे में नहीं है।
ये हमारे देश की बदलती हुई परिभाषा, न्याय व्यवस्था की परिभाषा और इस बात के बारे में है कि राज्य अपने नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करेगा।
और मैं देश के सभी युवाओं से कहना चाहूंगी कि आज इस देश में आम लोगों के साथ क्या हो रहा है, ये जानिए। आज उमर के साथ जो हो रहा है, वो हममें से किसी के साथ भी हो सकता है।
कला को सत्ता की आवाज नहीं, समाज की स्मृति बनना चाहिए
ईन्यूज़रूम: आपसे शबाना आज़मी, अरुंधति रॉय, प्रकाश राज जैसे लोग मिले हैं। उनसे मिलकर आपने क्या सीखा? क्या इन मुलाकातों ने आपके सोचने के तरीके को किसी तरह प्रभावित किया?
नेहा बोरा: असल में, मुझे ये लोग अभी जाकर नहीं मिले हैं। लोगों को लग रहा है कि वे मुझे अभी जानने लगे हैं, इसलिए शायद मैंने अभी छात्र सक्रियता शुरू की है। ऐसा नहीं है।
अरुंधति रॉय और वो जो लिखती हैं, वो मेरी राजनीतिक जिंदगी का लंबे समय से—एक दशक से ज्यादा समय से—हिस्सा रही हैं।
प्रकाश राज की राजनीतिक समझ और अलग-अलग जन आंदोलनों के साथ खड़े होने की उनकी क्षमता को मैं आज से नहीं, लंबे समय से देख रही हूं।
Exactly, गौरी लंकेश के समय से। शबाना आज़मी के जन आंदोलनों के साथ खड़े होने की क्षमता को भी मैं लंबे समय से देख रही हूं।
क्योंकि मैं रंगमंच से जुड़ी रही हूं, इसलिए मैं कला की दुनिया के बारे में बहुत जागरूक हूं।
कला का काम बहुत हद तक ये होता है कि वह समाज की चेतना को आकार दे। समाज को भाषण देने के बजाय यादें दे, कहानियां दे, जिनके पीछे समाज खुद को समझता है, अपनी पहचान तय करता है और जिनका इस्तेमाल समाज एक-दूसरे से संवाद करने के लिए करता है।
तो कला की जो ऐतिहासिक जिम्मेदारी रही है, उसको छोड़कर अगर आप ये करने लगें कि नागपुर के मुख्यालय से एक tweet आता है और आप सब उसे X पर copy-paste कर देते हैं, तो मुझे समझ नहीं आता।
जितने लोग खुद को कलाकार कह रहे हैं, अगर वे सिर्फ copy-paste का काम कर रहे हैं, तो एक ही script को अलग-अलग heroes और actresses लेकर कितनी बार recycle करेंगे?
तो एक तरफ जब आर्टिस्ट इस तरह का काम कर रहे हैं और सत्ता के सामने जनता को serve करना छोड़ चुके हैं, तो ऐसे आर्टिस्ट का होना उन तमाम लोगों को बहुत हिम्मत देता है जो रंगमंच से आते हैं या साहित्य से आते हैं। ये लोग हमेशा से इसका हिस्सा रहे हैं।

