एक देश बारह दुनिया: देश-देहात के संकटों की पड़ताल करती पुस्तक

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कमाठीपुरा से बाहर जीने की कल्पना छोड़ चुकी सेक्स-वर्करों के अनुभव और उनकी सोलह गलियों के भीतर का भरा-पूरा बाजार और संसार है. वहीं, कनाडी बुडरुक में सर्द हवा और लंबी दुर्गम पगडंडियों से होकर तिरमली घुमंतू परिवारों के एक जगह बस्ती बनाकर रहने के पीछे का संघर्ष है. दूसरी ओर, आष्टी में दो बड़े खंभों के बीच बंधी एक रस्सी के ओर छोर तक चल चलकर चौराहे पर जमा भीड़ के आगे तमाशा दिखाती आठ बरस की बच्ची और उसके पीछे हैरतअंगेज खेल दिखाकर अपना पेट पालने वाली पूरी सैय्यद मदारी जमात की पहचान से जुड़े तजुर्बे हैं. अंत में, उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच फंसे पारधी तथा तिरमली समुदाय के बच्चों की आवाजों और गन्ने के खेतों में मजदूरी करने वाले दलित परिवारों से जुड़े दर्दों का दस्तावेज है

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मूलत: हिन्दी भाषा के ग्रामीण पत्रकार और बतौर फ्रीलांसर ईन्यूजरूम से जुड़े शिरीष खरे की पुस्तक ‘राजपाल एंड संस, नई दिल्ली’ से प्रकाशित होकर अब बाजार में उपलब्ध हो गई है, पुस्तक का नाम है- एक देश बारह दुनिया. इसमें शिरीष ने भारत की एक ऐसी तस्वीर खींचने की कोशिश की है, जो अक्सर छिपाई जाती है, पर जिसे फ्रंट पर होनी चाहिए. म्यूट कर दी गईं आवाजों को लेखक ने यहां धैर्य और ध्यानपूर्वक सुनने की कोशिश की है.

इस पुस्तक में भारत के सात राज्यों से दूरदराज की बारह अलग-अलग जगहों के रिपोर्ताज हैं. इस दौरान लेखक ने हिन्दी के अलावा मराठी, गुजराती, कन्नड़ भाषाओं और बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान के थार तथा जनजातीय अंचलों में बोली जाने वाली बोलियों के लोगों के साथ लंबा समय बिताया है. उन्होंने अपनी यात्राओं में यातायात के सस्ते और सार्वजनिक साधनों का इस्तेमाल किया है.

शिरीष ने मध्य-प्रदेश में नरसिंहपुर जिले के एक छोटे से आदिवासी गांव मदनपुर से निकलकर अठारह वर्ष की उम्र में पहली बार भोपाल जैसे बड़े शहर को देखा था. इसके बाद उन्हें नौकरियों के कारण कुछ बड़े शहरों में रहने का मौका मिला था. इसके बावजूद, उनके रिपोर्ताज देश के अति पिछड़े क्षेत्रों से सीधे या परोक्ष तौर पर जुड़ी हुए हैं. अधिकतर ऐसे क्षेत्रों से जिनके नामों के बारे में बहुत कम सुना या जाना गया है. उन्होंने भारत के कुलीन व देश की आबादी के विशाल बहुमत के बीच बढ़ती खाई और उदासीनता के टापूओं पर रोशनी डाली है.

अपनी पुस्तक के बारे में अनुभव साझा करते हुए शिरीष बताते हैं, “भले ही इन दस वर्षों की तुलना में हमारे शहरों और दूरदराज के गांवों के बीच भौतिक अवरोध तेजी से मिट रहे हों, लेकिन सच्चाई यह है कि उतनी ही तेजी से एक सामान्य चेतना में गांव और गरीबों के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है. गांव के देश में गांव शहरों पर निर्भर हो रहे हैं और उत्पादक ग्रामीण उपभोक्ता बन रहे हैं.”

उनके मुताबिक जब सांख्यिकी आंकड़ों के विशाल ढेर में छिपे आम भारतीयों के असल चेहरे नजर नहीं आ रहे हैं, तब उन्होंने ‘एक देश, बारह दुनिया’ पुस्तक के सहारे भारत की आत्मा कहे जाने वाले गांवों के अनुभवों को साझा करने की कोशिश की है.

इस पुस्तक में महाराष्ट्र के मेलघाट नामक पहाड़ियों पर भूख का वृत्तांत है, मध्य भारत में बहने वाली नर्मदा नदी किनारे की डूब का चित्रण है, गुजरात में सूरत जैसे शहर में लूट की छूट का नजारा है, छत्तीसगढ़ में मदकूद्वीप के खंडहर की दुर्दशा का वर्णन है, आंध्र-प्रदेश की सीमा से लगे महाराष्ट्र के मराठवाड़ा अंचल के मैदानी रास्तों पर बंजारा समुदायों द्वारा खाई जा रही दर-दर की ठोकरों की पीड़ा है, मध्य-प्रदेश के खेत-खलिहानों में सूखे के चिन्ह हैं बस्तर के जंगल में रक्तरंजित संघर्ष की एक झलक है, साथ ही राजस्थान के रेगिस्तान में महिलाओं पर हिंसा से जुड़ी रोजमर्रा की सच्ची कहानियों को आपस में बांधकर एक महादेश की वास्तविकताओं को एकाकार करने का परिश्रम है.

इसके अलावा देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कमाठीपुरा से बाहर जीने की कल्पना छोड़ चुकी सेक्स-वर्करों के अनुभव और उनकी सोलह गलियों के भीतर का भरा-पूरा बाजार और संसार है. वहीं, कनाडी बुडरुक में सर्द हवा और लंबी दुर्गम पगडंडियों से होकर तिरमली घुमंतू परिवारों के एक जगह बस्ती बनाकर रहने के पीछे का संघर्ष है. दूसरी ओर, आष्टी में दो बड़े खंभों के बीच बंधी एक रस्सी के ओर छोर तक चल चलकर चौराहे पर जमा भीड़ के आगे तमाशा दिखाती आठ बरस की बच्ची और उसके पीछे हैरतअंगेज खेल दिखाकर अपना पेट पालने वाली पूरी सैय्यद मदारी जमात की पहचान से जुड़े तजुर्बे हैं. अंत में, उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच फंसे पारधी तथा तिरमली समुदाय के बच्चों की आवाजों और गन्ने के खेतों में मजदूरी करने वाले दलित परिवारों से जुड़े दर्दों का दस्तावेज है.

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