ऐ बिहार तेरे अंजाम पे रोना आया

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[dropcap]बि[/dropcap]हार में बाढ़ के कुछ दृश्य इस गौरवमयी राज्य की त्रासदी बताते हैं। पहला दृश्य पटना में छाती तक भरे पानी में फंसे रिक्शाचालक का है। काफी मेहनत के बाद भी रिक्शा नहीं निकाल पाने के कारण उसके रोने की बेबसी किसी भी इंसान को परेशान कर देगी।

लेकिन दूसरा दृश्य काफी हैरान करता है। तीन दिनों तक अपने घर में फंसे उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को एनआरडीएफ की टीम ने बचाकर निकाला। पटना डीएम के साथ सुशील मोदी सड़क किनारे बेबस खड़े दिखाई दिए। हाफ पैंट में। साथ में परिवार और पांच सात बैग में रखा कुछ जरूरी सामान। ऐसा दृश्य, मानो किसी स्टैंड में बस का इंतजार करता कोई सामान्य यात्री परेशान खड़ा हो।

तीसरा दृश्य तो आपको शर्म से पानी-पानी कर देगा। पाटलीपुत्र से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव किसी टूटे तटबंध को देखने गए। कुछ लोगों ने उन्हें चार टायर जोड़कर बनी कथित नाव पर चढ़ा दिया। वह चढ़कर चाव से वीडियो बनवाने लगे। इसी बीच कथित नाव उलट गई। ग्रामीणों ने उनकी जान बचा ली।

चौथा दृश्य मीडियाकर्मियों से उलझते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का है। पटना में बाढ़ का संकट क्यों है, इसके जवाब में वह मीडिया से ही पूछ रहे हैं कि मुंबई में ऐसा क्यों होता है। नाराज सीएम यहाँ तक कह गए कि मुझे आपलोगों की कोई जरूरत नहीं है।

नीतीश जी स्वघोषित सुशासन बाबू हैं। लेकिन फिलहाल तो बिहार में कुशासन दिखता है। वह बिहार को विशेष दर्जा दिलाने की मांग भूल चुके हैं। विधानसभा चुनाव में मोदी जी ने सवा लाख करोड़ के स्पेशल पैकेज का वादा किया था। इसके लिए भी बिहार से कोई आवाज उठती नहीं दिखती। ऐसे में बिहार के अंजाम पर सिर्फ रोया ही जा सकता है। हम-आप क्या कर लेंगे?

इन चारों दृश्यों से एक भयावह कोलाज बनता है। एक मेहनतकश रिक्शा वाला बीच सड़क पर खुद को बचाए, या अपनी रोजी के साधन रिक्शा को?

रिक्शा वाले की विवशता समझी जा सकती है। लेकिन डिप्टी सीएम सुशील मोदी की ऐसी क्या विवशता थी, जो तीन दिन घर में फंसे रह जाएं? उन्हें क्या अपने घर के माल-असबाब की चिंता थी, जिसे छोड़कर निकलना मुश्किल था?

बिहार में बाढ़ के इस भयावह दौर में तो डिप्टी सीएम का एक-एक मिनट का वक्त उपयोग में आना चाहिए था। उन्हें आम बाढ़-पीड़ित की तरह घर में दुबके रहने के बजाय राज्य के वरीय अधिकारियों के साथ लगातार बैठक करके हर जरूरी काम पर नजर रखनी चाहिए थी। वह केंद्र सरकार, वायुसेना और एनडीआरएफ के साथ बेहतर तालमेल के जरिए बिहार का काफी भला कर सकते थे। इसके बजाय एक दयनीय बाढ़-पीड़ित की भूमिका में आकर उन्होंने बिहार की नकारात्मक छवि बना दी।

ऐसा ही कुछ रामकृपाल यादव के मामले में देखा जा सकता है। टायर नाव की सवारी और वीडियो बनवाकर वह किसका भला कर रहे थे? एक सांसद को यह समझ नहीं कि ऐसे जान जोखिम में न डालें? उन्हें एक सांसद की भूमिका मालूम होती, तो क्षेत्र में राहत पहुंचाने के कुछ बड़े उपाय कर सकते थे। उनके आग्रह पर राज्य और केंद्र सरकार से कुछ मदद अवश्य मिल सकती थी। बड़ी कंपनियों के सीएसआर और देश की स्वयंसेवी संस्थाओं से अपील करके कुछ जुटा ही सकते थे। इसके बजाय जान जोखिम में डालना यही बताता है कि उनके पास अपनी भूमिका को लेकर कोई सोच नहीं है।

जाहिर है कि नीतीश कुमार ने मुंबई की बाढ़ पर पूछकर बिहार की जगहंसाई कराई। वह 15 साल से बिहार की सत्ता में हैं। पटना के नाले तक साफ़ न होना कुशासन का ही प्रतीक है। फिर, लोकतंत्र में मीडिया की जरूरत न होने की बात भी उन्हें हल्का करती है।

नीतीश जी स्वघोषित सुशासन बाबू हैं। लेकिन फिलहाल तो बिहार में कुशासन दिखता है। वह बिहार को विशेष दर्जा दिलाने की मांग भूल चुके हैं। विधानसभा चुनाव में मोदी जी ने सवा लाख करोड़ के स्पेशल पैकेज का वादा किया था। इसके लिए भी बिहार से कोई आवाज उठती नहीं दिखती। ऐसे में बिहार के अंजाम पर सिर्फ रोया ही जा सकता है। हम-आप क्या कर लेंगे?

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