कोलकाता: “देश में मीडिया खेती-किसानी से जुड़ी खबरों को महज़ 6 प्रतिशत जगह देता है, जबकि 70 प्रतिशत लोगों का रोजगार सीधे या परोक्ष रूप से कृषि से जुड़ा है।” यह बात कृषि विशेषज्ञ, पत्रकार और ककसाड़ पत्रिका के संपादक डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित समारोह में कही। उन्होंने कहा कि मुख्यधारा की पत्रकारिता में ग्रामीण भारत की समस्याओं को वह स्थान नहीं मिल रहा, जिसकी उसे जरूरत है।
भारतीय भाषा परिषद में साहित्यिक एवं शोध पत्रिका पैरोकार और भारतीय भाषा परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हिंदी पत्रकारिता द्विशताब्दी समारोह में बोलते हुए डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारिता हमारे देश और लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है। “यह बाकी तीनों स्तंभों की नकेल कसने की ताकत रखती है, जो इसकी शक्ति को दर्शाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो सुप्रीम कोर्ट के जज प्रेस क्लब में नहीं रोते।”
उन्होंने बस्तर के अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि दरभा विकासखंड जैसे पिछड़े इलाकों में, जहां झीरम कांड जैसी घटनाएं हुईं, लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए स्थानीय पत्रकारों के पास पहुंचते हैं। “जब पंचायत, जिला प्रशासन या स्थानीय नेताओं से समस्या हल नहीं होती, तब पत्रकार मदद करते हैं। साप्ताहिक अखबार या डिजिटल संस्करण में खबर छपने के बाद नौकरशाही और ब्यूरोक्रेसी में थोड़ी हलचल जरूर होती है।”
‘आज पत्रकारिता की थाली में सिर्फ अचार (राजनीति) परोसा जा रहा है’
डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में किसान तभी खबर बनता है जब वह टमाटर सड़क पर फेंक दे, दिल्ली की सीमाएं घेर ले या आत्महत्या कर ले। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि मीडिया राजनीति के पीछे जरूरत से ज्यादा भाग रहा है। “राजनीति का स्थान पत्रकारिता में भोजन की थाली में अचार जितना होना चाहिए, लेकिन आज सिर्फ अचार ही परोसा जा रहा है।”
उन्होंने खेती से युवाओं के बढ़ते मोहभंग पर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक देश में करीब ढाई करोड़ लोग खेती छोड़ चुके हैं और नई पीढ़ी खेती की ओर लौटना नहीं चाहती। “बस्तर में 10-10 एकड़ जमीन खाली पड़ी है, लेकिन युवा खेती नहीं कर रहे हैं। हम दो लाख करोड़ रुपये का तेल खरीदकर खा रहे हैं, जो एक गंभीर स्थिति है।”
साहित्य और पत्रकारिता की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के गोदान का होरी आज भी जिंदा है, लेकिन आज के साहित्य और पत्रकारिता से किसान, गांव, तालाब और पीपल का पेड़ गायब होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज का पथ-प्रदर्शक रहा है और पत्रकार समाज के अगुआ, इसलिए युवाओं को सही मार्गदर्शन देने की जिम्मेदारी दोनों पर है।
समारोह के दौरान डॉ. राजाराम त्रिपाठी को पैरोकार ग्रामीण पत्रकारिता शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया। वहीं वरिष्ठ पत्रकार गंगा प्रसाद को पैरोकार पत्रकारिता शिखर सम्मान और वयोवृद्ध पत्रकार संतन कुमार पांडेय को हिंदी पत्रकारिता में विशिष्ट योगदान के लिए पैरोकार लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड प्रदान किया गया। इस अवसर पर पैरोकार के पत्रकारिता विशेषांक का लोकार्पण भी हुआ। साथ ही भोपाल से प्रकाशित समागम तथा डॉ. त्रिपाठी के संपादन में प्रकाशित ककसाड़ पत्रिका का भी विमोचन किया गया।
आज की पत्रकारिता के सवालों के बीच इतिहास की याद
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार विश्वम्भर नेवर ने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास और उसके संघर्षों को याद करते हुए कहा कि ब्रिटिश शासन के दौरान भी पत्रकारिता सत्ता के खिलाफ खड़ी हुई थी। “ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अखबार निकाले गए, यह जानते हुए भी कि इससे नुकसान होगा, लेकिन फिर भी प्रतिवाद किया गया।” उन्होंने कहा कि उस दौर में भी ऐसे अखबार थे जो सत्ता के पक्ष में खड़े रहते थे। “उस वक्त भी गोदी मीडिया था, जैसा कि आज है।”
उन्होंने लाला लाजपत राय पर हुए पुलिस अत्याचार का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें इतनी बेरहमी से पीटा गया कि कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। वहीं आपातकाल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकारिता ने उस दौर में भी संघर्ष का रास्ता चुना। उन्होंने रामनाथ गोयनका का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का समर्थन किया और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए मजबूती से खड़े रहे।
समारोह में सदीनाम के संपादक जितेंद्र जिंतांशु, शकुन त्रिवेदी, प्राध्यापिका रेशमी पांडा मुखर्जी, श्रीपर्णा तरफदार और इ-न्यूजरूम इंडिया के संपादक शाहनवाज़ अख्तर ने भी अपने विचार रखे। पैरोकार के प्रधान संपादक अनवर हुसैन ने स्वागत भाषण में पत्रिका के 15 वर्षों के सफर पर रोशनी डाली, जबकि समूह संपादक बिमल शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अभिज्ञात ने किया।
समारोह में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने का यह अवसर केवल इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि यह सोचने का भी है कि पत्रकारिता समाज, गांव, किसान और आम आदमी की आवाज को कितनी मजबूती से सामने ला पा रही है।


