बांग्लादेश का तख्तापलट: रोजगारविहीन विकास के साइड इफेक्ट्स?

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[dropcap]ज[/dropcap]ब सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीडीपी) बढ़ रहा हो, विकास दर भी अच्छी हो, पर हाथों को काम नहीं मिल रहा हो तो रोजगार के बिना या उम्मीद से कम रोजगार मिलने पर युवाओं की आकांक्षाएं धूमिल होने लगती हैं। रोजगारविहीन विकास समतामूलक नहीं रह जाता और असमानता की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। फिर भी नीति-निर्माता ऐसे विकास के जाल में फंसे हुए हैं। कारण, उनकी नजर तात्कालिक विकास की संतुष्टि और उस विकास के राजनीतिक फल पर होती है। यह और बात है कि ऐसी संतुष्टि अक्सर अस्थायी होती है।

बांग्लादेश में उथल-पुथल का मूल कारण ‘बांग्ला मुक्ति सैनिकों’ की तीसरी और चौथी पीढ़ी के लिए 30 प्रतिशत सरकारी नौकरियां आरक्षित करने का निर्णय था। सरकारी नौकरियां मिलने की संभावनाएं कम हो जाएंगी, ऐसा सोचते हुए आंदोलन में बड़ी संख्या में  युवा दिखाई दिए। बांग्लादेश एक छोटा-सा देश है और यह भी सच है कि हर देश की राजनीतिक स्थिति अलग-अलग होती है। लेकिन, आर्थिक अवलोकन कई बार देश और परिस्थितियों से बंधे नहीं होते। बेरोजगारी-वृद्धि ऐसा शब्द है जो रोजगारविहीन विकास की दिशा में उथल-पुथल का कारण बन सकता है, जैसा कि वहां देखा गया-

बांग्लादेश की जीडीपी विकास दर छह से सात प्रतिशत से ऊपर है और प्रति व्यक्ति आय के मामले में बांग्लादेश भारत से आगे है। लेकिन, इससे रोजगारविहीन विकास की चुनौती खत्म नहीं हो जाती है, क्योंकि 7 प्रतिशत की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर के बावजू बांग्लादेश में वार्षिक रोजगार-वृद्धि दर केवल 0.9 प्रतिशत थी।

यह तस्वीर नीति-नियंताओं को भी दिखी होगी, फिर भी नेताओं लगा होगा कि वे युवाओं की आंखों में धूल झोंकते रहेंगे। लेकिन, कई बार युवाओं को जब विश्वास हो जाता है कि उन्हें केवल भाषणों की सब्जी और भाषणों का भात ही मिल रहा है तो अराजकता गाढ़ी होने लगती है और कभी-कभी हिंसक रूप से सामने आती है।

दुर्भाग्य से भारत जैसे देशों में भी अर्थशास्त्री इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि वे रोजगारविहीन विकास की स्थिति को कैसे नकार सकते हैं? कब तक वे फर्जी आंकड़े दिखाकर वास्तविकता से आंखें मूंद सकते हैं? ऐसे ही एक विद्वान ने हाल ही में यह कहकर आलोचकों को चुप कराने की कोशिश की कि रोजगारविहीन विकास आदि सब अफवाहें हैं। तो एक आर्थिक सलाहकार ने दावा किया कि मोदी सरकार के दौरान रोजगार सृजन की दर ‘ऐतिहासिक’ थी वह भी बगैर किसी आंकड़े के।

दरअसल, किसी को आश्चर्य होता है कि हमारे देश में नेट और यूपीएससी जैसी परीक्षाओं के लिए इतनी भीड़ क्यों है और मध्यम वर्ग, शिक्षित आदि युवाओं को ऐसा क्या लगता है कि उन्हें गलत काम करके इन परीक्षाओं को पास करना होगा। लेकिन, अन्य पहलुओं पर भी गौर किया जाना चाहिए।

‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ के आंकड़ों के मुताबिक जून 2024 में भारत में बेरोजगारी 9.2 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
उत्तर-प्रदेश में पुलिस कांस्टेबलों के 60,000 पदों के लिए 50 लाख आवेदक जैसी स्थिति इस बात का भी संकेत है कि युवा नौकरियों के लिए किस तरह से होड़ कर रहे हैं। यही अनुपात हर राज्य में देखा जा सकता है।

‘अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन’ भी युवा बेरोजगारी के आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित करता है जिसने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि कोविड-काल के बाद बेरोजगारी बढ़ेगी और यह एक तरह से ‘टाइम बम’ होगा।

इसके अपरिहार्य परिणाम भी देखने को मिले। जैसे कि केन्या की संसद में बजट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जाना। केन्या में युवाओं के विरोध प्रदर्शन को पुलिस बल द्वारा कुचल दिया गया। लेकिन, केन्या या कई अन्य देशों में इस ‘बेरोजगार विकास’ के कारण बेरोजगार युवाओं का मानसिक संतुलन गिर रहा है।

‘अरब स्प्रिंग’ आंदोलन (2010) जिसने सीरिया और अन्य देशों को हमेशा के लिए अस्थिरता की स्थिति में छोड़ दिया या ’25 जनवरी की क्रांति’ जिसने 2011 में मिस्र में शासन को उखाड़ फेंका, कई अफ्रीकी या एशियाई देशों में जन विद्रोह… हालांकि, इन सबके राजनीतिक कारण अलग-अलग हैं, पर आर्थिक कारण ‘रोजगारविहीन विकास है।

लिहाजा, रोजगारविहीन विकास न केवल कई देशों, विशेषकर निम्न और मध्यम आय वर्ग के देशों के लिए आर्थिक चिंता का विषय है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए भी एक चुनौती है।

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