अम्बेडकरवाद: विचार धारा और संघर्ष में जानिए बाबा साहब अम्बेडकर से जुड़े 13 ख़ास लोगों के बारे

Date:

Share post:

देहरादून: लेखक और विचारक विद्या भूषण रावत की नई किताब अम्बेडकरवाद: विचारधारा और संघर्ष का विमोचन देहरादून के दून लाइब्रेरी और शोध संस्थान में किया गया जिसमें शहर के बुद्धिजीवियों, सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। इस अवसर पर डी ए वी कालेज देहरादून के प्रोफेसर डॉक्टर राजेश पाल ने विद्या भूषण रावत के साथ ‘आज का भारत: अम्बेडकर और मार्क्स’ नामक विषय पर एक संवाद भी आयोजित किया। पुस्तक विमोचन मे डॉक्टर राजेश पाल के अलावा प्रोफेसर के एस रंधावा, साहित्यकार डॉक्टर जितेंद्र भारती, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य इकाई के महासचिव काम्रैड समर भण्डारी, सुरेन्द्र सिंह सजवाण, सी पी आई एम, सामाजिक कार्यकर्ता बीजू नेगी, डाक्टर चंद्रशेखर तिवारी और निकोलस हॉफलैन्ड भी शामिल थे।

इस अवसर पर लेखक का परिचय देते हुए डॉक्टर राजेश पाल ने बताया कि 1991 में अंग्रेजी के प्रमुख साहित्यकार डॉक्टर मुल्क राज आनंद की सलाह पर दिल्ली गए और उनके साथ दो वर्षों तक रहे। उसके बाद वह स्वतंत्र रूप से काम करने लगे और मानवाधिकारों के लिए समर्पित बुद्धिजीवियों जैसे जस्टिस वी एम तारकुंडे, डॉक्टर आर एम पाल आदि के संपर्क मे आए। इसी दौर में वह बाबा साहब अम्बेडकर की विचारधारा से बहुत प्रभावित हुए और फिर वह भगवान दास, एन जी उके, एल आर बाली, वी टी राजशेकर आदि जैसे नामी गिरामी अम्बेडकरवादियों की संपर्क मे आए और देश भर मे अस्मिताओं के आंदोलनों को समझने के प्रयास किए।1994 से ही उन्होंने उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जनपद के स्वच्छकार समाज के लोगों के साथ उनके अधिकारों के लिए काम करना शुरू किया और वहा पर एक केंद्र की स्थापना की जिसके जरिए स्वच्छकार समाज की लड़कियों को सफाई पेशे से दूर शिक्षा विशेषकर कंप्युटर आदि से परिचय करवाना था और उनमे बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों का संचार करवाना था।

अभी तक वह 25 से अधिक पुस्तक लिख चुके हैं। हिन्दी मे यह उनकी 6 पुस्तक है। उनका लेखन और चिंतन का क्षेत्र बहुत व्यापक है। इस वर्ष उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकों के आने की संभावना है। Netaji Subhas Chandra Bose: INA and India’s Freedom Movement, एक बहुत ही शोध पूर्ण कार्य है जो नेताजी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेताओ के साथ उनके संबंधी के अलावा उनकी वैचारिकी को बहुत मजबूती से रखती है। आशा है की अगले तीन महीनों में यह पुस्तक उपलब्ध होगी। दूसरी पुस्तक, Conversation on Social Justice, Dravidian Identity and Periyar है जो तमिलनाडु के द्रविड़ियन आंदोलनों के एक बेहद महत्वपूर्ण चिंतक, विचारक एस वी राजदुर्राई के साथ एक लंबा साक्षात्कार है। अपने किस्म की यह पहली पुस्तक होगी जिसमे पेरियार के आंदोलन और बाबा साहब अंबेडकर के साथ उनके रिश्तों पर व्यापक चर्चा की गई है।

पुस्तक के विषय मे चर्चा करते हुए लेखक विद्या भूषण रावत ने बताया कि इस पुस्तक मे बाबा साहब अम्बेडकर के साथ काम कर चुके और अम्बेडकरी मिशन को आगे बढ़ाने वाले 13 प्रमुख लोगों के साथ उनके द्वारा समय समय पर लिए गए साक्षात्कारों को शामिल किया गया है। हिन्दी मे इस सीरीज की यह पहली पुस्तक है और आने वाले समय मे अन्य दूसरे प्रमुख लोगों के साथ लिए गए साक्षात्कारों को भी शामिल किया जाएगा। विद्या भूषण रावत बताते हैं कि अम्बेडकरी आंदोलन की समझ रखने वाले व्यक्ति समझ सकते हैं की ये लोग वाकई मे आंदोलन के सबसे बड़े योद्धा थे और बाबा साहब के परिनिर्वाण के बाद अम्बेडकरी आंदोलन को उस समय आगे ले गए जब उनके पास न कोई राजनीतिक दल था और न ही अन्य कोई संगठन और न ही कोई संसाधन। इन साक्षात्कारों को पढ़ने के बाद हम अम्बेडकरी आंदोलन के जीते जागते इतिहास से भी परिचित होते हैं और अम्बेडकरवाद के विषय मे जो भी भ्रांतिया हैं उसे दूर करते हैं।

विद्या भूषण रावत की नई किताब अम्बेडकरवाद: विचारधारा और संघर्ष बाबा साहब अम्बेडकर
विद्या भूषण रावत अपने नये किताब अम्बेडकरवाद: विचारधारा और संघर्ष के विमोचन के दौरान

इस संकलन मे शुरुआत प्रख्यात अम्बेडकरवादी भगवान दास से होती हैं। लेखक को भगवान दास जी को जानने का नजदीक से अनुभव हुआ जब वह उनसे संपर्क मे आया। ये वो दौर था जब दिल्ली मे मंडन विरोधी आंदोलन के बाद दलित आदिवासी पिछड़े नए सिरे से अपने आंदोलनों को मजबूत कर रहे थे। भगवान दास ने बाबा साहब अंबेडकर के लिखित दस्तावेजों को संकलित कर प्रकाशित करवाया। आज बाबा साहब अम्बेडकर के जो वॉल्यूम महाराष्ट्र सरकार ने प्रकाशित किए हैं वह 1980 के बाद हुआ है।

एल आर बाली ने बाबा साहब अम्बेडकर की मृत्यु के बाद दिल्ली मे अपनी सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और जालंधर आकर उनके मिशन को आगे बढ़ाने के लिए पहला प्रयास किया। उन्होंने भीम पत्रिका की स्थापना की जो पहले पञ्जाबी मे निकलती थी और फिर उर्दू और हिन्दी मे भी इसका प्रकाशन किया। बाली साहब का निधन पिछले वर्ष ही हुआ और इतने वर्षों मे उन्होंने बाबा साहब के विचारों को जन जन तक पहुचाने का काम किया।

एन जी ऊके नागपूर से आते हैं और केंद्र सरकार मे एक महत्वपूर्ण पद मे कार्यरत थे। बाबा साहब अम्बेडकर ने जिन लोगों को अच्छी शिक्षा के लिए विदेश भेजा उनमे ऊके साहब भी थी हालांकि बाद मे उन्होंने ब्रिटिश गवर्नमेंट द्वरा प्राप्त स्कालर्शिप ली और लंदन पढ़ने गए जहा से इंजीनियरिंग करने के बाद वह भारत आए। ऊके ने अंबेडकर समाज की स्थापना की और वह जीवन पर्यंत बाबा साहब के मिशन को समर्पित रहे।

सदानंद फुलजले ने दीक्षा भूमि मे बुद्ध धर्मं मे जाने के बाबा साहब के मिशन मे अपना सहयोग किया। वह उस महान घटनाक्रम के साक्षी थे जो 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर मे हुआ जिसने भारत की दिशा बदल दी। वह आर पी आई से जुड़े रहे और नागपूर के उपमहापौर भी रहे।

कुमुद पवड़े नागपुर मे एक अम्बेडकरी परिवार से निकली हुई वह महिला थी जिन्होंने संस्कृत मे महारत हासिल की और संस्कृत भाषा मे टॉप करने के बाद भी उन्हे किसी कालेज मे नौकरी नहीं मिल रही थी क्योंकि वह दलित समाज से थी। बाद मे जवाहर लाल नेहरू ने उन्हे मदद की और वह मध्य प्रदेश के एक महाविद्यालय में पढ़ाने लगी। फिर और बाद मे उन्हे नागपुर और अन्य स्थानों पर पढ़ाने का व्यापक अनुभव हुआ। उनकी जीवन यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है।

इस पुस्तक मे विजय सुरवाड़े, धर्म कीर्ति, राजा ढाले, मनोहर मौली विश्वास और आनंद तेलतुमबड़े जैसे बड़े नाम भी इस संकलन मे है जिन्होंने बाबा साहब को देखा, पढ़ा और आंदोलन को आगे बढ़ाया। सुरवाड़े जी के पास बाबा साहब से संबंधित दस्तावेजों की मूल प्रतिया थी और आज भी वह अम्बेडकरी साहित्य और मिशन को पूर्णतः संपरित हैं वही राजा ढाले दलित पैंथर के संस्थापकों मे से एक थे और बेहद मजबूती से अपनी बात को रखने मे माहिर थे। उन पर एक समय मे अपनी बात को रखने के लिए सेडिशन का केस भी चला। डाक्टर धर्म कीर्ति आगरा से पढे और उन्होंने बाबा साहब की आगरा की ऐतिहासिक सभा मे भाग लिया था। मनोहर मौली विश्वास ने बंगाल मे दलित साहित्य अकादेमी की स्थापना की और आनंद टेलतुमबड़े तो अंबेडकर परिवार से संबंधित भी हैं और उनकी स्कालर्शिप का दुनिया लोहा मानती हैं।

कुल मिलकर इस संकलन मे 13 महान हस्तियों की विस्तृत साक्षात्कार हैं जो हमे उनके संघर्षों और विचारधारा से परिचित करवाते हैं और बाबा साहब को वो किस नजरिए से देखते हैं इसका भी एहसास करवाते हैं। विद्या भूषण रावत ये कहते हैं की अम्बेडकरी आंदोलन को जीवित रखने मे इन लोगों की बहुत बड़ी भूमिका है। आज के दौर मे जब हर एक राजनीतिक दल बाबा साहब का नाम लेने को मजबूर हैं तो ये भी आवश्यक है कि हम अम्बेडकरी विचारधारा को ठीक से समझे और इसे उन लोगों से अधिक कौन समझा सकता है जिन्होंने बाबा साहब को देखा और उनके नजदीक रहने का मौका मिला।

विद्या भूषण रावत की इस पुस्तक की भूमिका प्रसिद्ध लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी  ने लिखी है। इस अवसर लेखक रावत ने कहा कि इस पुस्तक को लाने मे सबसे बड़ा सहयोग साहित्यकार और प्रकाशक रामजी यादव का है जिन्होंने इसकी भाषा और वर्तनी की त्रुटियों को बारीकियों से देखा और उन्हे सुधार किया।

spot_img

Related articles

The Sound of Bulldozers and the Making of a New Bengal

BJP's demolition drives across Bengal signal the arrival of a politics where spectacle overtakes due process, and the urban poor increasingly become targets of governance shaped by exclusion, fear, and corporate expansion.

The Politics of Memory and Desire in Nalin Verma’s Sacred Unions and Other Stories

In Sacred Unions and Other Stories, Nalin Verma crafts unforgettable tales of love, memory, faith, and rural transformation, turning ordinary lives of Purvanchal into emotionally resonant literary experiences

A Seat at the Table? Why Muslims, India’s Largest Minority, Are Fading from the Saffron Project

From zero Muslim candidates to polarising rhetoric, the commentary examines why the BJP struggles to gain Muslim trust and asks whether the party has genuinely attempted inclusive politics

The Silence of the Lambs at IMS-BHU: Investigating Dr Satya’s Suicide Attempt and Toxic Overwork Culture

A junior doctor’s suicide attempt at IMS-BHU has exposed allegations of illegal long duty hours, institutional silence, mental health crisis, and growing demands for an independent police investigation into systemic exploitation